तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी राजनीतिक संघर्ष अब चुनाव आयोग की चौखट तक पहुंच गया है। पार्टी से अलग हुए बागी गुट ने गुरुवार को भारत निर्वाचन आयोग से मुलाकात कर खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताया और पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न तथा संगठन पर अपना अधिकार जताया। बागी नेताओं ने आयोग से मामले में जल्द निर्णय लेने की मांग की।
ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की। बैठक के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने पार्टी में किए गए संगठनात्मक बदलावों से जुड़े दस्तावेज आयोग के समक्ष प्रस्तुत किए और नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी को मान्यता देने की मांग रखी।
बैठक के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि 22 जून 2026 को विधानसभा के विशेष सत्र के बाद सभी आवश्यक दस्तावेज चुनाव आयोग को भेज दिए गए थे। उन्होंने बताया कि उसी समय आयोग से मिलने का समय भी मांगा गया था। अब आयोग ने दोनों पक्षों की बात सुनी है और उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही इस विवाद पर फैसला लिया जाएगा।
बागी गुट का दावा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद बड़ी संख्या में विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व से असंतुष्ट हो गए। उनके अनुसार, पार्टी के 80 में से लगभग 58 विधायक उनके साथ हैं और 22 जून को कोलकाता में हुई प्रतिनिधि बैठक में नए अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया।
दूसरी ओर, ममता बनर्जी का गुट भी खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बता रहा है। ऐसे में पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और बैंक खातों पर अधिकार को लेकर दोनों गुटों के बीच विवाद गहरा गया है।
अब इस पूरे मामले में चुनाव आयोग की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। आयोग दोनों पक्षों द्वारा सौंपे गए दस्तावेजों, संगठनात्मक दावों और कानूनी पहलुओं की जांच करेगा। इसके बाद यह तय किया जाएगा कि आधिकारिक रूप से किस गुट को तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने का अधिकार मिलेगा।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव आयोग का फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा असर डाल सकता है और राज्य की आगामी राजनीतिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।