बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक चले लिव-इन संबंध और दोनों पक्षों के आचरण से यदि संबंध सहमति से बने प्रतीत होते हैं, तो बाद में शादी से इनकार कर देने मात्र से दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शादी का झांसा देकर दुष्कर्म के आरोपी को ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया। यह फैसला जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने सुनाया।
मामला वर्ष 2019 का है, जब 40 वर्षीय महिला ने आईआईएम रायपुर के एमबीए कार्यक्रम में प्रवेश लिया था। इसी दौरान उसकी पहचान एक सहपाठी से हुई। महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर उसके साथ संबंध बनाए।
शिकायत के अनुसार दोनों लंबे समय तक रिश्ते में रहे। महिला का आरोप था कि जब भी वह शादी की बात करती तो आरोपी टाल देता था। अगस्त 2021 में आरोपी ने कथित तौर पर शादी से इनकार करते हुए परिवार की सहमति नहीं होने की बात कही, जिसके बाद महिला ने महिला आयोग और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने मामले में चालान पेश किया, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने दोनों के बालिग होने और संबंध आपसी सहमति से बनने के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था। इसके बाद महिला ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि समय के साथ समाज में बदलाव आया है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिलाएं अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने में सक्षम हैं। कोर्ट ने माना कि इस मामले में संबंध लंबे समय तक चले और दोनों पक्षों का व्यवहार सहमति की ओर संकेत करता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या न्यायिक चूक नहीं है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और अपील को खारिज कर दिया गया।