संविधान की सबसे विश्वसनीय आवाज हुई खामोश, पद्म भूषण डॉ. सुभाष कश्यप का 97 वर्ष की उम्र में निधन

नई दिल्ली। भारतीय संविधान, संसदीय प्रक्रिया और संवैधानिक कानून के प्रख्यात विद्वान तथा पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. सुभाष सी. कश्यप का 97 वर्ष की आयु में निधन हो गया। कार्डियो-पल्मोनरी अरेस्ट के कारण उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से देश के बौद्धिक, कानूनी और संसदीय जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

डॉ. सुभाष कश्यप को भारतीय संविधान और संसदीय परंपराओं के सबसे बड़े जानकारों में गिना जाता था। उन्होंने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में संविधान, लोकतंत्र और संसद की कार्यप्रणाली पर 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं। उनकी चर्चित कृतियों में ‘आवर पार्लियामेंट’ और ‘आवर कॉन्स्टिट्यूशन’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, जिन्हें संविधान और संसदीय व्यवस्था को समझने के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ माना जाता है।

संसद और संविधान के गहरे जानकार

10 मई 1929 को जन्मे डॉ. कश्यप ने भारतीय संसद में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वे वर्ष 1984 से 1990 तक 7वीं, 8वीं और 9वीं लोकसभा के महासचिव रहे। संसदीय प्रक्रियाओं और विधायी कार्यों में उनकी गहरी समझ के कारण उन्हें देश-विदेश में विशेष पहचान मिली।

उन्होंने जिनेवा स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर पार्लियामेंट्री डॉक्यूमेंटेशन (IPU) का भी नेतृत्व किया और संसदीय अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

राष्ट्रीय आयोग में निभाई अहम भूमिका

डॉ. कश्यप संविधान की कार्यप्रणाली की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग के सदस्य रहे। साथ ही वे आयोग की ड्राफ्टिंग एवं एडिटोरियल कमेटी के अध्यक्ष भी थे। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत बनाने और संवैधानिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पद्म भूषण से हुए थे सम्मानित

सार्वजनिक मामलों, संविधान और संसदीय अध्ययन के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया था। वे लंबे समय तक इंडियन नेशनल बार एसोसिएशन (INBA) के अध्यक्ष भी रहे।

डॉ. सुभाष कश्यप का निधन भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक विमर्श के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनके विचार, लेखन और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।

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