नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को संवैधानिक रूप से वैध ठहराते हुए चुनाव आयोग (ECI) के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जाती है और इसमें कोई कानूनी खामी नहीं पाई गई।
सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 और रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1950 के तहत SIR करने का पूरा अधिकार है।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि SIR प्रक्रिया “कानूनी दायरे के भीतर है और चुनावी व्यवस्था को मजबूत करने का काम करती है।”
याचिकाओं पर सुनवाई
SIR प्रक्रिया के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई थीं, जिनमें विशेष रूप से 2025 में बिहार में शुरू की गई वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई थी कि इससे मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा सकते हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को बरकरार रखा।
विपक्ष को झटका, EC को राहत
इस फैसले को चुनाव आयोग के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है। अदालत के निर्णय से उन राजनीतिक दलों को झटका लगा है, जिन्होंने SIR की टाइमिंग और प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। वहीं केंद्र सरकार ने भी आयोग के रुख का समर्थन किया था।
कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR, मौजूदा कानूनों की जगह नहीं लेता बल्कि चुनावी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सटीक बनाने में मदद करता है।
आगे की प्रक्रिया
चुनाव आयोग ने अब SIR के तीसरे चरण की घोषणा कर दी है, जिसके तहत 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट का व्यापक पुनरीक्षण किया जाएगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद SIR प्रक्रिया को संवैधानिक वैधता मिल गई है, जिससे चुनाव आयोग को देशभर में मतदाता सूची सुधार अभियान आगे बढ़ाने में कानूनी मजबूती मिल गई है।