नॉर्वे के अखबार में पीएम मोदी का ‘सपेरे’ वाला कार्टून, भारत में मचा सियासी और कूटनीतिक बवाल

नई दिल्ली |  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। नॉर्वे के प्रमुख अखबार Aftenposten में प्रकाशित एक विवादित कार्टून को लेकर भारत समेत सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कार्टून में पीएम मोदी को ‘स्नेक चार्मर’ यानी सपेरे के रूप में दिखाया गया है, जिसे कई लोगों ने नस्लभेदी और औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित बताया है।

कार्टून में पीएम मोदी के हाथ में बीन जैसी पाइप दिखाई गई है, जबकि सामने पेट्रोल स्टेशन की पाइप को सांप के रूप में दर्शाया गया है। यह चित्र एक ओपिनियन आर्टिकल के साथ प्रकाशित हुआ, जिसका शीर्षक था — *“एक चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला आदमी”*।

कार्टून सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे भारत की पुरानी और अपमानजनक छवि से जोड़ते हुए कड़ी आलोचना की। कई यूजर्स ने कहा कि पश्चिमी मीडिया अब भी भारत को “सपेरों का देश” जैसी रूढ़िवादी सोच से देखता है। वहीं कुछ लोगों ने इसे यूरोप की औपनिवेशिक मानसिकता का उदाहरण बताया।

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने भी इस कार्टून पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह भारत के प्रति नस्लवादी सोच को दर्शाता है और नॉर्वे की पत्रकारिता की सतही समझ को उजागर करता है। सिब्बल ने लिखा कि 140 करोड़ की आबादी वाले भारत की जटिलताओं को समझे बिना इस तरह की टिप्पणी करना दुर्भाग्यपूर्ण है।

अमेरिकी विश्लेषक कार्ल व्लेल्स ने भी अखबार की आलोचना करते हुए कहा कि यह पत्रकारिता नहीं बल्कि “औपनिवेशिक दौर का नस्लवाद” है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को लेकर पश्चिमी देशों के कुछ वर्ग असहज हैं।

दरअसल, विवाद की शुरुआत नॉर्वे में आयोजित एक प्रेस कार्यक्रम से हुई थी, जहां पत्रकार हेले लिंग ने पीएम मोदी से भारत में मानवाधिकार और प्रेस स्वतंत्रता को लेकर सवाल पूछा था। प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त बयान तो दिया, लेकिन मीडिया के सवाल नहीं लिए। इसके बाद पत्रकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर नाराजगी जताई थी।

इस मुद्दे पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सवालों से बचना भारत की छवि को नुकसान पहुंचाता है। राहुल गांधी के बयान के बाद कहानी में नया मोड़ तब आया, जब पत्रकार हेले लिंग ने उन्हें इंटरव्यू के लिए आमंत्रित कर दिया।

47 वर्षों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री के नॉर्वे दौरे को जहां कूटनीतिक रूप से अहम माना जा रहा था, वहीं अब यह दौरा उपलब्धियों से ज्यादा विवादों को लेकर चर्चा में है।

शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *