राजस्थान | राजस्थान के उदयपुर में पूजा मेघवाल नाम की दलित दुल्हन की बिंदोली यात्रा विवादों का केंद्र बन गई। स्थानीय कुछ लोगों ने कथित तौर पर पूजा को घोड़ी पर सवार होने से रोक दिया, क्योंकि वह दलित समुदाय से थीं। बिंदोली राजस्थान की पारंपरिक रस्म है, जिसमें शादी से पहले दूल्हा या दुल्हन को घोड़ी पर बैठाकर गांव या शहर में घुमाया जाता है।
इस घटना के आठ दिन बाद, पूजा मेघवाल ने एक प्रतीकात्मक बिंदोली यात्रा निकाली। इस यात्रा में वह सफेद घोड़ी पर सवार थीं और उनके चारों ओर नीले और फिरोजी रंग की पताका लहरा रही थी। उनके सिर के ऊपर लाल और गोल्डन कलर की छतरी थी, और हाथों में उन्होंने ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की तस्वीर रखी थी।
टाउन हॉल से कलेक्ट्रेट तक इस यात्रा में भारी संख्या में लोग शामिल हुए। अधिकांश लोगों ने सफेद कपड़े पहने थे, गले में नीले स्कार्फ और हाथों में नीले झंडे या पोस्टर लिए हुए थे। इन पोस्टरों पर डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीरें और ‘जय भीम’ लिखा हुआ था।
पूजा के पिता भैरूलाल मेघवाल ने कहा, “हम यह दिखाना चाहते थे कि हम भी इंसान हैं और भारत के नागरिक हैं। आज़ादी के 80 साल बाद भी कुछ लोगों की मानसिकता में छुआछूत और जातिगत भेदभाव अभी भी मौजूद है। यहां के ऊंची जाति के लोग नहीं चाहते कि हम घोड़ी पर बैठें। यही वजह है कि हमने प्रशासन को मेमोरेंडम दिया।”
यात्रा का नेतृत्व ‘भीम आर्मी’ ने किया, जिसमें अन्य सामाजिक संगठन भी शामिल हुए। उदयपुर वाइस प्रेसिडेंट रोशन मेघवाल ने कहा, “सावित्रीबाई फुले ने महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी के अधिकार दिलाए। अगर ऐसा है तो दलित महिलाओं को घोड़ी पर बैठने से क्यों रोका जा रहा है?”
घटना के समय पूजा की बिंदोली यात्रा पर हमला भी हुआ, जिसमें कई लोग घायल हुए। पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज की है।
यह घटना दिखाती है कि भारत में आज़ादी के 80 साल बाद भी जातिगत भेदभाव और छुआछूत की मानसिकता कितनी जड़ें जमा चुकी है, और लोगों को अपने अधिकारों और सम्मान के लिए अभी भी संघर्ष करना पड़ता है।