डिजिटल युग में भी जिंदा है 230 साल पुरानी लिथोग्राफी, खैरागढ़ में पत्थरों पर गढ़ी जा रही कला

खैरागढ़  |  जहां आज प्रिंटिंग का काम कंप्यूटर, डिजिटल मशीनों और एआई तकनीक से कुछ ही समय में पूरा हो जाता है, वहीं छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ में 230 साल पुरानी लिथोग्राफी कला आज भी जीवंत है। राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में विद्यार्थी आज भी जर्मनी से लाए गए विशेष लाइमस्टोन और ब्रिटिशकालीन प्रेस के माध्यम से इस ऐतिहासिक छापा कला की बारीकियां सीख रहे हैं।

लिथोग्राफी का आविष्कार वर्ष 1796 में जर्मनी के कलाकार एलोयस सेनेफेल्डर ने किया था। इस तकनीक में चूना पत्थर पर चित्र बनाकर तेल और पानी के सिद्धांत के आधार पर उसकी अनेक प्रतियां तैयार की जाती थीं। उस दौर में इसी माध्यम से अखबार, पोस्टर, कैलेंडर, विज्ञापन और देवी-देवताओं के चित्र बड़ी संख्या में प्रकाशित किए जाते थे।

भारत में लिथोग्राफी का उपयोग सबसे पहले गोवा में हुआ, जहां धार्मिक साहित्य की छपाई की गई। बाद में प्रसिद्ध चित्रकार राजा रवि वर्मा ने इस कला को नई पहचान दी। उन्होंने 1894 में अपना लिथोग्राफी प्रेस स्थापित कर रामायण, महाभारत और पुराणों से जुड़े देवी-देवताओं के चित्रों को आम लोगों तक पहुंचाया।

खैरागढ़ में संरक्षित है दुर्लभ विरासत

राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय का लिथोग्राफी स्टूडियो देश के चुनिंदा संस्थानों में शामिल है, जहां आज भी पारंपरिक स्टोन लिथोग्राफी का अभ्यास कराया जाता है। यहां ब्रिटिशकालीन लिथोग्राफी प्रेस और जर्मनी से लाए गए मूल लाइमस्टोन सुरक्षित रखे गए हैं।

विश्वविद्यालय के लेक्चरर डॉ. मनिंदर सिंह बताते हैं कि आधुनिक ऑफसेट प्रिंटिंग की नींव भी लिथोग्राफी पर आधारित है। सीएमवाईके (CMYK) कलर प्रिंटिंग का सिद्धांत भी इसी तकनीक से विकसित हुआ। पहले हर रंग के लिए अलग पत्थर तैयार किया जाता था और फिर क्रमवार छपाई कर रंगीन चित्र तैयार किए जाते थे।

छात्र सीख रहे हैं पारंपरिक छपाई की तकनीक

प्रोफेसर रबी नारायण गुप्ता के अनुसार, लिथोग्राफी केवल कला नहीं बल्कि प्रिंट मीडिया के विकास की महत्वपूर्ण तकनीक रही है। शुरुआती दौर में अखबारों, सरकारी घोषणाओं, पोस्टरों और कैलेंडरों की छपाई में इसका व्यापक उपयोग किया जाता था।

विश्वविद्यालय में छात्र आज भी पत्थर तैयार करने, तैलीय माध्यम से चित्र बनाने, गम अरेबिक, पानी और स्याही के प्रयोग से प्रिंट तैयार करने की प्रक्रिया सीख रहे हैं। छात्र अश्वनी कुमार बताते हैं कि इस तकनीक से एक ही कलाकृति की कई समान प्रतियां बनाई जा सकती हैं।

वहीं छात्रा नैन्सी अग्रवाल का कहना है कि लिथोग्राफी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक कलाकृति को उसी स्वरूप में हजारों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।

परंपरा और आधुनिकता का संगम

बीएफए, एमएफए, पीएचडी और डी.लिट. जैसी उच्च शिक्षा उपलब्ध कराने वाला खैरागढ़ विश्वविद्यालय अब पारंपरिक स्टोन लिथोग्राफी के साथ प्लेट लिथोग्राफी शुरू करने की तैयारी कर रहा है।

डिजिटल युग में खैरागढ़ का यह लिथोग्राफी स्टूडियो साबित कर रहा है कि इतिहास केवल किताबों में दर्ज नहीं होता, बल्कि कला, तकनीक और कलाकारों के हाथों में भी जीवित रहता है।

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