रिकार्ड पांचवीं बार भारत को अंडर-19 विश्व कप क्रिकेट का खिताब दिलाने में अहम योगदान करने वाले कप्तान यश ढुल की राह इतनी आसान नहीं रही। फाइनल से पहले पांच साथियों सहित खुद कोरोना संक्रमित होने के बावजूद यश न हताश हुए और न निराश। उन्होंने खुद को प्रेरित करने के साथ-साथ टीम को भी दबाव के बीच सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित किया। नतीजा, टीम ने सबको चौंकाते हुए दमदार प्रदर्शन कर खिताब फिर भारत की झोली में डाल दिया। आखिर क्यों जरूरी है हार न मानने का जज्बा, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव…
कप्तान यश ढुल की अगुवाई में अंडर-19 विश्व कप खेलने वेस्टइंडीज गई भारतीय टीम के युवा धुरंधरों से देश को पहले से ही बड़ी उम्मीदें थीं। टीम ने ग्रुप मैचों में शानदार शुरुआत भी की थी। टीम कप जीतने के अपने लक्ष्य की ओर उत्साह से बढ़ ही रही थी कि अचानक उसकी राह में ग्रहण लग गया। कप्तान यश ढुल और उपकप्तान शेख रशीद सहित कुछ छह खिलाड़ियों को कोविड पाजिटिव पाये जाने के कारण क्वारंटाइन में जाना पड़ा। टीम के साथ-साथ देशवासियों के लिए भी यह बड़ा धक्का था। सवाल था कि अब आगे क्या होगा? क्योंकि वेस्टइंडीज गई भारतीय टीम में कुल 17 खिलाड़ी थी, जिसमें से छह पाजिटिव होने के कारण बाहर थे।
अब सारा दारोमदार बाकी बचे 11 खिलाड़ियों पर था। इसके बाद जो हुआ, उस सहसा कोई भरोसा नहीं कर सकता। ग्रुप के अगले ही मैच में इन 11 शूरवीरों ने हर तरह की निराशा और आशंकाओं को धता बताते हुए आयरलैंड को बुरी तरह धोया और इसके बाद टीम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। टीम सेमीफाइनल में पहुंच गई और तब तक यश ढुल सहित बाकी खिलाड़ी भी ठीक होकर टीम से जुड़ गए। इसके बाद तो जो धमाल मचा, उसे दुनिया देखती रह गई। सेमीफाइनल में तगड़ी माने जाने वाली आस्ट्रेलियाई टीम को धूल चटाई, जिसमें कोविड से उबरने के बाद कप्तान यश ढुल ने शतक ठोंका। फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ खेलते हुए भारतीय टीम ने हर विभाग में उसे पछाड़ा। इसमें हरफनमौला प्रदर्शन करते हुए राज बावा ने पांच विकेट चटकाकर न सिर्फ इंग्लैंड की कमर तोड़ी, बल्कि कीमती 35 रन भी बनाए और फाइनल के ‘मैन आफ द मैच’ बने।