धूल में दम तोड़ता तिल्दा-नेवरा: सत्ता के सारे में सिसकता शहर, जवाब दो जिम्मेदारों 

तिल्दा-नेवरा। राजधानी रायपुर से सटे तिल्दा-नेवरा में उड़ती धूल के गुब्बारे अब महज़ एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि शहर की बदहाल व्यवस्था की स्थायी पहचान बन चुके हैं। सड़कों पर जमा महीन धूल, जगह-जगह उखड़ी परतें और बजबजाती नालियां स्थानीय शासन-प्रशासन के विकास दावों की पोल खोल रही हैं। हालात ऐसे हैं कि राहगीरों का चलना दूभर है, दुकानदारों का व्यापार प्रभावित है और नागरिकों का स्वास्थ्य दांव पर लगा हुआ है।
शहरवासियों में इस मुद्दे को लेकर गहरा आक्रोश है। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि कागज़ी योजनाओं और झूठी वाहवाही लूटने में व्यस्त हैं, जबकि धरातल पर बुनियादी सुविधाएं दम तोड़ रही हैं। क्षेत्र में एक केबिनेट मंत्री, एक विधायक, जनपद अध्यक्ष और नगरपालिका अध्यक्ष जैसे जिम्मेदार पद मौजूद होने के बावजूद, विकास की दौड़ में तिल्दा-नेवरा आखिरी पंक्ति में खड़ा नजर आता है। सवाल उठता है कि जब इतने जिम्मेदार चेहरे सत्ता में हैं, तो फिर शहर की सूरत क्यों नहीं बदल रही?
नालियों की नियमित सफाई नहीं, सड़कों पर पानी का छिड़काव नहीं, और मरम्मत कार्य सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है। प्रशासनिक उदासीनता का खामियाजा आम जनता भुगत रही है। नागरिकों का कहना है कि अब आश्वासनों से पेट नहीं भरता और न ही भाषणों से धूल थमती है।
तिल्दा-नेवरा की जनता अब जवाब चाहती है—साफ सड़कों का, स्वच्छ नालियों का और ठोस विकास का। यदि समय रहते जिम्मेदारों ने स्थिति नहीं सुधारी, तो जनता का यह आक्रोश आने वाले समय में बड़ा जनआंदोलन बन सकता है। शहर कराह रहा है और जिम्मेदार अब भी खामोश हैं—यह खामोशी ही सबसे बड़ा सवाल.

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