तिल्दा-नेवरा । धुल की गुब्बारे से परेशान नगरवासियों की सब्र की बांध अब टूटने लगा है ,उसे अब अपने व परिवार के स्वास्थ्य को लेकर भय सताने लगा है जिसके चलते नगर की सरकार पर उंगलियां उठ रही है । रायपुर जिला के तिल्दा-नेवरा नगर में उड़ती धूल अब समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का खुला प्रमाण बन चुकी है। हर दिन सड़कों पर उठते धूल के गुब्बारे मानो यह चीख-चीखकर कह रहे हों कि नगर का विकास केवल कागज़ों और भाषणों तक सीमित है। जमीनी हकीकत यह है कि नागरिक धूल फाँकने को मजबूर हैं और जिम्मेदार आंख मूंदकर बैठे हैं।
यह बेहद शर्मनाक है कि जहाँ एक ओर स्वच्छता, स्मार्ट सिटी और विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर सड़कों की हालत बदतर है। अधूरे निर्माण कार्य, खुले पड़े मलबे और बिना पानी के छिड़काव के चल रहे प्रोजेक्ट साफ बताते हैं कि न तो नियमों की परवाह है और न ही जनता के स्वास्थ्य की। क्या नगर प्रशासन को यह दिखाई नहीं देता कि बच्चे, बुजुर्ग और बीमार लोग इस धूल के कारण सांस तक नहीं ले पा रहे?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर जवाबदेही किसकी है? क्या धूल से भरे वातावरण में जीना तिल्दा-नेवरा के नागरिकों की नियति बन चुका है? अगर यही विकास है, तो ऐसा विकास जनता के लिए अभिशाप से कम नहीं। हर गुजरते वाहन के साथ उड़ती धूल नगर परिषद, ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के मुंह पर तमाचा है।
अब केवल आश्वासन नहीं, ठोस कार्रवाई चाहिए। अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो यह जनता के स्वास्थ्य से खुला खिलवाड़ होगा। तिल्दा-नेवरा को धूल का शहर नहीं, रहने लायक नगर बनाना होगा—वरना आने वाले समय में इसका खामियाजा सबको भुगतना पड़ेगा।