साध्वी ऋतंभरा ने कहा- माता-पिता का महत्व समझे,चारो धाम आपके घर मे ही है,शक्ति की यह श्रीमद् भागवत कथा सदैव मेरे मानस पटल पर आपकी उपस्थिति के लिए रहेगी अंकित
सक्ति शहर के प्रतिष्ठित माछरौलिया गोयल परिवार बनवारीलाल प्रेमचंद ने भी किया सभी श्रोताओं का आभार व्यक्त,08 दिसम्बर को होंगा भंडारा-प्रसाद का आयोजन
सक्ती-शक्ति शहर के प्रतिष्ठित माछरौलिया गोयल परिवार बनवारीलाल प्रेमचंद द्वारा सक्ति के कॉलेज ग्राउंड में 01 दिसंबर से प्रारंभ श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह का समापन 7 दिसंबर की देर शाम हुआ, इस दौरान कथावाचक वृंदावन निवासी साध्वी ऋतंभरा ने कहा कि इस 1 सप्ताह तक आप सभी शक्ति क्षेत्रवासियों ने जिस तन्मयता के साथ इस श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण किया यह आप सभी के लिए मंगलकारी है, तथा ईश्वर से मैं कामना करती हूं कि आप सभी को कथा श्रवण का पूण्य मिले

एवं साध्वी ऋतंभरा ने आयोजक परिवार के प्रेमचंद सराफ, सुमित सराफ,अमित सराफ सहित परिवारजनों को भी इस श्रीमद् भागवत कथा के आयोजन के लिए बहुत-बहुत आशीर्वाद प्रदान किया, साथ ही उन्होंने समस्त श्रोताओं को भी कहा कि श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण हम सभी के लिए मंगलकारी होता है, तथा इस अवसर पर श्रीमद् भागवत कथा के आयोजन में प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करने वाले सभी लोगों को भी मंच के माध्यम से साध्वी ऋतंभरा ने आभार व्यक्त किया, तथा कथा के अंतिम दिवस 7 दिसंबर को छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल, अविभाजित मध्यप्रदेश खनिज विकास निगम के पूर्व चेयरमैन एवं वरिष्ठ भाजपा नेता गिरधर गुप्ता तथा भाजपा शक्ति जिले के अध्यक्ष कृष्णकांत चंद्रा ने भी कथा का श्रवण किया तथा अंतिम दिवस करीब 20 हजार की संख्या में कथा स्थल पर श्रोताओ कथा श्रवण करने पहुंचे हुए थे तथा आयोजक परिवार की ओर से भी सभी का आभार व्यक्त करते हुए प्रसाद वितरण किया गया

कथा वाचक दीदी माँ साध्वी ऋतम्भरा ने भागवत प्रसंग की विविध लीलाओं को भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया,कान्हा के सुदामा चरित्र, गोकुल गमन, कंस वध, गोपी उद्धव संवाद के भावपूर्ण वर्णन के साथ ही रुक्मणि विवाह प्रसंग की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि “मेरे ठाकुर जी जब मात्र ग्यारह वर्ष के थे तब उन्होंने कंस का वध किया था। सत्रह बार उन्होंने जरासंध से लोहा लिया। तो ऐसे मेरे ठाकुर जी का अब ब्याह भी होना चाहिए ना ? भीष्मक जी के पुत्री थीं रुक्मणि, जिन्होंने भगवान् को अपना ह्रदय दे दिया था, उनके भाई चाहते थे कि बहन रुक्मणि का विवाह शिशुपाल से हो जाए,अब आप देखो कि कर्ण कटु और कर्कश वाणी बोलने वाला शिशुपाल उसके बगल में बैठी सर्वांग सुंदरी और सर्वगुण सम्पन्न रुक्मणि भला कैसी दिखेगी,उस नगरी के सारे लोग “हाय हाय” कर रहे थे कि ये क्या अनर्थ होने वाला है,अपने भाई के इस निर्णय के विरुद्ध रुक्मणि ने अनशन कर दिया और भगवान को प्रेमपत्र भेजा,जब कान्हा का रथ तैयार हुआ तो दाऊ जी ने पूछा कि “क्यों कान्हा! कहाँ जा रहे हो ?* कान्हा मुस्कुराकर बोले “दाऊ! कुंदनपुर से निमंत्रण आया है।” दाऊ ने हँसकर कहा “अच्छा तो अब हमारे कान्हा का विवाह तो होना ही है,आप चलिए, हम भी पीछे-पीछे अपनी चतुरंगिणी सेना लेकर आते हैं। ” इधर जब ब्राम्हण ने जाकर कहा कि “रुक्मिणी जी, अब तो आप साक्षात् लक्ष्मी हैं क्योंकि द्वारकाधीश स्वयं आ गए हैं। ” तब सैट सहस्त्र दीप जलाकर रुक्मिणी भवानी माता के मंदिर गईं थीं. जैसे ही उन्होंने माँ के चरणों में आराधना की, तैसे ही माँ के गले में पड़ी वो पुष्पमाला उतरकर रुक्मिणी जी के गले में आ गई। मानों उन्हें मनवांछित वर का आशीर्वाद मिल गया हो। सारे भूमण्डल के नरेश खड़े हैं रुक्मिणी को देखने के लिए। जैसे ही वो मंदिर से बाहर निकली तो भगवान का गरुड़ध्वजी रथ आकर रुका। प्रभु ने रथ पर खड़े होकर शंख को घोष किया और घोषणा कि “सुनो सारे भूमण्डल के नरेशों! मैं रुक्मिणी को अपनी भार्या बनाकर ले जा रहा हूँ।” रुक्मिणी ने दौड़कर भगवान् के चरण छूना चाहे तो भगवान् ने अजानबाहु बनकर रुक्मिणी को अपने आलिंगन में भरकर रथारूढ़ कर लिया,चारों और जय जयकार का घोष होने लगा। दीदी माँ जी के भजन “लूटकर ले गया दिल जिगर, सावँरा जादूगर” के साथ झूमते नाचते हजारों श्रद्धालुओं के बीच जब श्रीकृष्ण और रुक्मिणी की बारात पंडाल से गुजरकर विवाह मंडप में पहुँची तब उसकी आभा देखते ही बनती थी। बाद में महारास का भव्य आयोजन भी हुआ