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वन संपदा और वन्यप्राणी हमेशा से छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाते रहे हैं। लेकिन वन्य प्राणियों में इन दिनों त्राहि-त्राहि मची हुई है। कोई तो सुने उनकी पीड़ा, कोई तो उन बेजुवान के दर्द को महसूस करे। दरअसल कुछ दिन पहले अनुसूची 1 में चिन्हित दुर्लभ वन्यप्राणी चौसिंगा की मौत होते रही, इस दौरान विभाग के जिम्मेदार अफसर गोवा घूमते रहे। एक-एक करके 17 चौसिंगा मौत के गाल में समा गए, पर आज तक जबाबदेही तय नहीं की गई। अकबर के राज में बेजुवान वन्यप्राणियों की बली चढ़ते रही। अधिकारी मौज-मस्ती में जुटे रहे। चौसिंगा एक दुर्लभ वनयप्राणी है, छत्तीसगढ़ में इनकी संख्या लगातार घटते जा रही। एशिया के सबसे बड़े सफारी जिसका लोकार्पण स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने किया था वह अब चौसिंगा विहीन होने की कगार पर है। 17 चौसिंगा की मौत घोर लापरवाही को दर्शाती है। एक-एक करके पांच दिनों तक ये बेजुवान तड़प-तड़प कर मरते रहे। इस दौरान अफसर गोवा घूमते रहे।
खुरहा-चापहा से हुई मौत
जानकारी अनुसार इन चौसिंगाओं की मौत खुरहा-चापहा से हुई है। जबकि इस रोग से जानवर तुरंत नहीं मरते। चौसिंगाओं का उपचार किया जा सकते था, लेकिन विभागीय लापरवाही ने इनका जीवन छीन लिया। मौतें होते रहीं और विभाग के अफसर पर्दा डालते रहे। यदि वास्तव में इन्हें समय पर उपचार मिल पाता तो शायद इन चौसिंगाओं की जान बच जाती।
टीकाकरण क्यों नहीं किया गया?
भारत सरकार की गाइडलाइन के अनुसार प्रत्येक संरक्षित क्षेत्रों एवं चिडिय़ा घरों के 5 किलोमीटर में सभी देशी पशुओं का टीकाकरण जरुरी है। साथ ही चिडिय़ा घरों में भी टीकाकरण आवाश्यक हैं, फिर भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया। डाक्टरों की लापरवाही और विभाग की उदासीन रवैया के कारण ये मौतें होते रहीं।
वन्यजीव विशेषज्ञों से करायी जाए जांच : सिंघवी
वन्यजीव एवं पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंघवी ने 17 चौसिंगाओं की मौत पर दु:ख व्यक्त करते हुए वन्यजीव विशेषज्ञों की कमेटी से इस मामले की जांच कराने की मांग की है। सिंघवी ने कहा राज्य में बेजुवान जानवरों की लगातार मौत हो रही हैं। जिम्मेदार अफसर अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर रहे। ऐसे में कमेटी से जांच कराकर इस मामले में सख्त कार्रवाई करने की जरुरत है। सिंघवी ने कहा चौसिंगा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 में शामिल हैं। यह एक दुर्लभ जीव हैं।