हलचल… मरकाम अब भूपेश के……

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मरकाम अब भूपेश के……

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मोहन मरकाम को मंत्री पद देकर बड़ा राजनीतिक दांव खेला है। 2018 में सिंहदेव कोटे से मंत्री बने डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम को बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया। अब उन्हीं के कोटे से मोहन मरकाम को नया मंत्री बनाया गया है। भूपेश के इस दांव ने मरकाम को बाबा खेमे से अलग कर दिया है। भले ही उनका कार्यकाल कुछ महीनों का है, लेकिन अब सिंहदेव और मरकाम की राहें जुदा हो गई हैं। मरकाम चाहकर भी अब सिंहदेव के साथ कदम मिलाकर नहीं चल पायेंगे। पीसीसी चीफ की नियुक्ति में भी भूपेश की पसंद का ख्याल रखा गया है। कहते हैं कि दीपक बैज को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने में सीएम भूपेश का अहम रोल है। कुल मिलाकर भूपेश के एक राजनीतिक दांव से विरोधी खेमा चारों खाने चित हो गया है। मरकाम के संगठन से बाहर होते ही चुनावी साल में सिंहदेव की दखल कम हो जाएगी। भूपेश एक चतुर राजनीतिक खिलाड़ी है, उन्होंने एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। उनके इस सियासी चाल से बाबा समर्थित एक मंत्री सत्ता से आउट हो गया, वहीं मरकाम को भी उन्होंने अपना बना लिया। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कभी सिंहदेव के कहलाने वाले मरकाम अब भूपेश के हो गए हैं।

अफसर घर के न घाट के

चार साल तक सत्ता के इर्द-गिर्द घूमने वाले, सत्ता की मलाई खाने वाले आबकारी अफसर इन दिनों कागजों में बुरी तरह फंसते नजर आ रहे हैं। एक ओर शराब घोटाले में ईडी ने 13000 पेज की चार्जशीट पेश कर दी है, दूसरी ओर राज्य सरकार ने अफसरों को नोटिस जारी कर कर जबाव तलब किया है। कहते हैं कि 36 अफसरों और तीन डिस्टलरियों से जवाब मांगा गया था। अफसरों पर आरोप है कि इनके संरक्षण में सरकारी राजस्व को क्षति पहुंचाई गई हैं। इन्होंने अवैध शराब निकासी कर करोड़ों के राजस्व की चपत लगाई है। वहीं रिश्वत लेने का भी आरोप इन अफसरों पर है। इस दांव से एक बात तो साफ है कि ईडी कारवाई कब करेगी या नहीं करेगी यह तो पता नहीं, लेकिन राज्य सरकार इन दागी अफसरों पर कभी भी शिकंजा कस सकती है। चार साल से सत्ता की मलाई खाने वाले यह अफसर अब ना घर के बचे, ना ही घाट के।

जीतने वाले ही चाहिए

कर्नाटका चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। 2018 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ हारने के बाद, 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में यहां के सभी सांसदों के टिकट काट दिए गए थे। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा था कि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सभी सीटों पर नये चेहरों पर दांव खेल सकती है। लेकिन कर्नाटका चुनाव परिणाम ने भाजपा की इस रणनीति को बदलने के लिए मजबूर कर दिया है। अब पुराने-नए नहीं बल्कि जीतने वाले ही चाहिए। जी हां भाजपा इन दिनों इसी रणनीति पर काम कर रही है। एक-एक करके भाजपा के हाथों से कई राज्य फिसलते जा रहे हैं। पहले राजस्थान, छत्तीसगढ़, अब हिमांचल और कर्नाटका। इसके मद्देनजर भाजपा अब हर विधानसभा क्षेत्र में मजबूत प्रत्याशियों पर दांव खेलने की तैयारी में हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में कम मतों से हारने वाले लगभग सभी प्रत्याशियों को फिर टिकट मिल सकती है। वहीं इस बार भाजपा के चार से पांच सांसद भी विधानसभा चुनाव में दो-दो हाथ करते नजर आयेंगे। कुल मिलाकर नए-पुराने नहीं अब सिर्फ चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी चाहिए।

समय से पहले पत्ते नहीं खोले जाते

आईएएस नीलकंठ टेकाम ने समय से पहले पत्ते खोलकर आफत मोल ले ली है। वैसे तो राजनीति के खेल में समय से पहले पत्ते नहीं खोले जाते, लेकिन आईएएस नीलकंठ टेकाम यह गलती कर बैठे है। टेकाम की चुनाव लडऩे की मंशा जगजाहिर हो चुकी है। उन्होंने वीआरएस के लिए अप्लाई भी कर दिया है। हाल ही में कांकेर प्रवास के दौरान उनकी राजनाथ सिंह से मुलाकात भी हो चुकी है। कुल मिलाकर टेकाम का केशकाल विधानसभा सीट से चुनाव लडऩा लगभग तय माना जा रहा है। इसी बीच टेकाम के स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति आवेदन में पेंच फंस गया है। कहते हैं कि वीआरएस मंजूर नहीं होने के कारण वह पार्टी की सक्रिय गतिविधियों में शामिल नहीं हो पा रहे। आईएएस नीलकंठ टेकाम के खिलाफ कोई जांच चल रही है, जिसके वजह से उनका वीआरएस अभी तक मंजूर नहीं हो सका है। कुल मिलाकार टेकाम ने समय से पहले पत्ते खोलकर आफत मोल ले ली है।

विभागों में फेरबदल के नाम पर छीना-झपटी

कोण्डागांव विधायक मोहन मरकाम को मंत्री बनाने के साथ-साथ कुछ मंत्रियों के विभागों में फेरबदल भी किया गया है। सरकार में सबसे पावरफुल मंत्री रविन्द्र चौबे से कृषि विभाग छीनकर ताम्रध्वज साहू को सौंपा गया है। वैसे रविन्द्र चौबे के बारे में यह कहा जाता रहा है कि महराज को राजा और साजा से काफी लगाव है। राजा का तो पता नहीं, लेकिन साजा के लगाव के कारण उनसे कृषि विभाग वापस लिए जाने की खबर इन दिनों सुर्खियों पर है। खबर में कितनी सत्यता है यह तो स्वयं चौबे ही जानेंगे, लेकिन फिलहाल उनसे कृषि विभाग छीन लिया गया है। चौबे से कृषि विभाग वापस लेते समय कहा गया कि उनके स्वास्थगत कारणों से यह विभाग वापस लिया जा रहा है। पर सवाल यह उठता है कि यदि चौबे से स्वास्थ्यगत कारणो से कृषि विभाग वापस लिया गया, तो फिर उन्हें प्रेमसाय सिंह टेकाम के बाकी विभाग क्यों सौंपे गए? दरअसल में इसके पीछे कहानी कुछ और ही है। कहते हैं कि कृषि विभाग में परिवर्तन को लेकर पहले से ही इन्डीकेशन था, जिसके बदौलत वित्तीय कार्यों में विगत माह से ढिलाई बरती जा रही थी।

बल्ले -बल्ले

भाजपा में इन दिनों रमन समर्थकों की बल्ले – बल्ले है। पिछले साल से उपेक्षा का दंश झेल रहे कौशिक और विष्णुदेव साय एक बार फिर फ्रंट फुट में आ गए हैं। दोनों नेताओं को पूर्व सीएम रमन सिंह का बेहद करीबी माना जाता है। हांलाकि यह समीकरण नन्दकुमार साय के कांग्रेस में शामिल होने की वजह से सम्भव हुआ है। सरगुजा क्षेत्र में भाजपा को मजबूती प्रदान करने के लिए पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय को फ्रंट फुट पर लागा गया है। वहीं कुर्मी समाज के वोटरों को साधने के लिए नारायण चंदेल के साथ अब एक बार फिर धरमलाल कौशिक को सामने लाया गया है। कुल मिलाकर जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के चलते एक बार फिर रमन समर्थकों की बल्ले -बल्ले हो गई है।

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