काका जी प्रहलाद राय अग्रवाल का महाप्रयाण एक आलोक व्यक्तित्व की निर्वाण-गाथा - प्रो. अम्बिका वर्मा

सक्ति-‘‘मनुष्य के जीवन की पहली सांस के साथ ही उसकी अंतिम सांस का दिन और वक्त विधाता द्वारा तय हो चुका होता है। यह सही है कि मौत के रजिस्टर में, एक दिन सबके दस्तखत होने ही है। लेकिन एक उजाले भरी बात यह भी है कि जीवन में आप जरूर कुछ ऐसा कर जाएं कि अपने गांव-शहर, प्रदेश-देश के रजिस्टर में, आपके हस्ताक्षर, वक्त की धूल से परे मोतियों की तरह दमकते रहें। कीर्तिशेष प्रहलाद राय अग्रवाल ऐसे ही अनेक उजले हस्ताक्षर कर गये हैं। कुछ लोग ऐसा जीवन जीते हैं कि अंतिम सांस के वक्त भी उनके चेहरे पर एक स्निग्ध मुस्कान की मौजूदगी होती है। यह कितनी खूबसूरत बात है कि एक मुस्कान के साथ जिंदगी को अंतिम विदाई देना। 86 वर्ष की उम्र में रात 9:30 बजे काका जी ने अपने हाथों से भोजन एवं दूध ग्रहण किया और रात 10:00 बजे शांत हो गये। महाप्रयाण के वक्त काका जी के चेहरे पर वही शांतिमयी स्निग्ध मुस्कान मौजूद थी। कीर्तिशेष काका जी प्रहलाद राय अग्रवाल के जीवन और अंतिम विराम की यही निर्वाण गाथा रही। चंद्रपुर की पहचान देवी चन्द्रहासिनी से है। चंद्रहासिनी देवी का मंदिर शक्ति के सिध्दपीठ में परिगणित होता है। चंद्रपुर की दूसरी पहचान देवी चन्द्रहासिनी के अनन्य भक्त और बहुआयामी सेवा के आलोक-व्यक्तित्व प्रहलाद राय अग्रवाल थे जिन्हें पूरा अंचल काकाजी का आत्मीय संबोधन देता है। चंद्रपुर की मिट्टी काकाजी के लिये तीर्थों की चंदन माटी थी। 1852 में पूर्वजों का चंद्रपुर आगमन हुआ था। पैतृक रूप से कृषि व्यापार ही संचालित होता था लेकिन एक रेखांकित करने वाली बात यह है कि प्रहलाद राय जी ने उस जमाने में बाकायदा नटवर हाई स्कूल से मेट्रिक पास किया। शिक्षा का यह उजाला उनके इर्द-गिर्द इस तरह झिलमिलाता रहा कि उन्होंने अपने पूरे अंचल में शिक्षा के अनेक ज्योति-संस्थान स्थापित कर दिये,रायगढ़ से शिक्षा पूरी करने के बाद प्रहलाद राय जी अनेक जन-उपयोगी निर्माण कार्यों से काका जी पूरी उदारता से जुड़े। इन सबका उल्लेख गिनती गिनाना नहीं है बल्कि यह काका जी की सामाजिक-समरसता एवं धार्मिक अवदान के प्रति उनका समर्पण दर्शाता है,यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि अग्रसेन भवन रायगढ़ से पहले चंद्रपुर में बना। इस उपलब्धि के केन्द्र में महाराजा अग्रसेन के प्रति काका जी की समर्पित भक्ति-चेतना ही रही। इसी अग्रसेन भवन में मंदिर का निर्माण भी कराया। काका जी बेहद गर्वीले स्वर में मुझे बताया था कि मैंने परिवार में बेटों से जब भी जितनी राशि के लिये कहा सब ने तत्काल राशि समर्पित की। आपका मानना है कि दान-कर्म की शुरूआत सबसे पहले अपने ही घर से प्रारम्भ करना चाहिए ।
प्रहलाद राय जी शिक्षा के उजाले को अपने अंचल के कोने कोने में फैलाने के आकांक्षी थे इसलिये उन्होंने अनेक शिक्षा संस्थानों की इमारतें रचीं। अनेक दूसरे शिक्षा संस्थानों से जुड़े और उजाले के दायरे को निरंतर बढ़ाते रहे। सरस्वती शिशु मंदिर के 9 साल प्रेसीडेंट रहे। संस्था की पढ़ाई व्यवस्था से प्रभावित होकर आपने सांसद एवं जनसहयोग से एक विशाल स्कूल का निर्माण कराया। अपनी पूर्व प्रतिबध्दता के कारण अपने प्रत्येक बेटे से एक एक लाख रूपये का सहयोग लेकर। 50-50 लाख के प्रोजेक्ट के इस स्कूल में ही छात्रावास है। इसके पहले ही 1957-58 में ग्राम चंदली में बेनीबाई पूर्व प्राथमिक शाला आरम्भ की। अनेक स्कूलों का आपने उन्नयन किया। माताजी एवं पत्नी के नाम पर कई कक्षों का निर्माण कराया।डभरा कालेज के न्यासी प्रेसीडेन्ट रहे। दरअसल कीर्तिशेष प्रहलाद राय जी एक व्यक्ति नही एक संस्था थे। जैसे एक सूरज की रौशनी से आकाश के अनेक ग्रह दमकते हैं ठीक इसी तरह काका जी के धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक सरोकारों से पूरा अंचल दमकता रहा है। काका जी के शैक्षणिक अवदान की गौरवशाली परम्परा में, उनके यशस्वी पुत्र गोविंद अग्रवाल ने चंद्रपुर में महानगरीय स्तर का उच्च गुणवत्ता मूलक स्कूल ‘चंद्रहासिनी विद्यापीठ’ का निर्माण एवं  संचालन कर अपने पिताश्री की यश-पताका को शिखर की ऊंचाई तक फहरा दिया है।
कीर्तिशेष काका जी के लिए चंद्रपुर एक नगरी नहीं बल्कि एक वात्सल्यमयी माँ की मानिंद रही। दोनों एक दूसरे से जुड़े रहे। सत्तू भैया के अनुसार चंद्रपुर के हर महत्वपूर्ण निर्माण में उनकी सहभागिता रही। लोग अपनी समस्याऐं लेकर आते। उनका कहा मानते, इस तरह अनेक जन-उपयोगी निर्माण कार्यों से काका जी पूरी उदारता से जुड़े। इन सबका उल्लेख गिनती गिनाना नहीं है बल्कि यह काका जी की सामाजिक-समरसता एवं धार्मिक अवदान के प्रति उनका समर्पण दर्शाता है,यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि अग्रसेन भवन रायगढ़ से पहले चंद्रपुर में बना। इस उपलब्धि के केन्द्र में महाराजा अग्रसेन के प्रति काका जी की समर्पित भक्ति-चेतना ही रही। इसी अग्रसेन भवन में मंदिर का निर्माण भी कराया। काका जी बेहद गर्वीले स्वर में मुझे बताया था कि मैंने परिवार में बेटों से जब भी जितनी राशि के लिये कहा सब ने तत्काल राशि समर्पित की। आपका मानना है कि दान-कर्म की शुरूआत सबसे पहले अपने ही घर से प्रारम्भ करना चाहिए ।
प्रहलाद राय जी शिक्षा के उजाले को अपने अंचल के कोने कोने में फैलाने के आकांक्षी थे इसलिये उन्होंने अनेक शिक्षा संस्थानों की इमारतें रचीं। अनेक दूसरे शिक्षा संस्थानों से जुड़े और उजाले के दायरे को निरंतर बढ़ाते रहे। सरस्वती शिशु मंदिर के 9 साल प्रेसीडेंट रहे। संस्था की पढ़ाई व्यवस्था से प्रभावित होकर आपने सांसद एवं जनसहयोग से एक विशाल स्कूल का निर्माण कराया। अपनी पूर्व प्रतिबध्दता के कारण अपने प्रत्येक बेटे से एक एक लाख रूपये का सहयोग लेकर। 50-50 लाख के प्रोजेक्ट के इस स्कूल में ही छात्रावास है। इसके पहले ही 1957-58 में ग्राम चंदली में बेनीबाई पूर्व प्राथमिक शाला आरम्भ की। अनेक स्कूलों का आपने उन्नयन किया। माताजी एवं पत्नी के नाम पर कई कक्षों का निर्माण कराया। ढभरा कालेज के न्यासी प्रेसीडेन्ट रहे। दरअसल कीर्तिशेष प्रहलाद राय जी एक व्यक्ति नही एक संस्था थे। जैसे एक सूरज की रौशनी से आकाश के अनेक ग्रह दमकते हैं ठीक इसी तरह काका जी के धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक सरोकारों से पूरा अंचल दमकता रहा है। काका जी के शैक्षणिक अवदान की गौरवशाली परम्परा में, उनके यशस्वी पुत्र गोविंद अग्रवाल ने चंद्रपुर में महानगरीय स्तर का उच्च गुणवत्ता मूलक स्कूल ‘चंद्रहासिनी विद्यापीठ’ का निर्माण एवं  संचालन कर अपने पिताश्री की यश-पताका को शिखर की ऊंचाई तक फहरा दिया है।
कीर्तिशेष काका जी के लिए चंद्रपुर एक नगरी नहीं बल्कि एक वात्सल्यमयी माँ की मानिंद रही। दोनों एक दूसरे से जुड़े रहे। सत्तू भैया के अनुसार चंद्रपुर के हर महत्वपूर्ण निर्माण में उनकी सहभागिता रही। लोग अपनी समस्याऐं लेकर आते। उनका कहा मानते। काका जी की लाडली बहुरानी सरला जी ने मुझसे कहा -‘काका जी से मिला स्नेह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हम बेटियाँ मायके से पिता की छाँव से दूर होकर ससुराल आती हैं। लेकिन काका जी से तो मुझे पिता का प्यार कई गुना बढक़र मिला। काका जी तो जैसे वात्सल्य के मीठे सागर थे। इतना प्यार उनसे मिला परमात्मा से यही प्रार्थना करती हूं कि हर जन्म में मुझे काका जी इसी पिता-रूप में प्राप्त होते रहें ।
अपने पूरे परिवार को काका जी ने मुक्त हाथों से प्यार बांटा। उनके भीतर का यह खजाना बेहद भरा-पूरा था। लेकिन काका जी का सबसे अधिक प्यार-दुलार मिला उनकी प्रिय पौत्र वधु अनु को वे कभी अपनी ममतामयी माँ तो कभी अपनी बेटियों का प्रतिरूप देखते। अनु बहु ने भी काका जी में ‘त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव’ के अनुसरण में उनमें परमात्मा का स्पंदित प्रतिबिंब ही देखा। अनु बहु की काका जी के प्रति केयरिंग की चर्चा पूरा अग्रवाल-खानदान करता है। पहली और तीसरी पीढ़ी के बीच यह नेह-भरा रिश्ता बेहद खूबसूरत रहा। जिसका श्रेय अनु बहु के हिस्से में ज्यादा आता है ।
कीर्तिशेष प्रहलाद राय काका जी के वात्सल्य का विस्तार पीढ़ी दर पीढ़ी विस्तृत होता गया। वे पिता, दादा जी, नाना जी, परदादा और परनाना जी के आत्मीय सम्बोधन प्राप्त परिवार के प्रमुख रहे। काका जी के आठ पौत्र चि. मनीष, अनीष, सुनील, सूर्यकांत, श्रीकांत, अनिल, सौरभ और गौरभ तथा आठ पौत्रियों आयु. सुधा, पिंकी, सीमा, मधु, ट्विंकल, रेखा, खुशबू और निधि हैं। उनकी बड़ी पुत्री शारदा जी के अभिषेक से पाँचवीं पीढ़ी काका जी के गोद में किलकारी भर गई। वात्सल्य एक अमूर्त भाव है। आँखों से नही देखा जा सकता। लेकिन वात्सल्य को एक चेहरा दिया जाए तो वह काका जी प्रहलाद राय अग्रवाल का चेहरा होगा। काका जी जैसी हस्तियों के लिए ही एक शायर अपनी जिंदगी की सबसे खूबसूरत लाइनें इस तरह लिख जाता है-
‘सारी उम्र आँखों में एक सपना याद रहेगा
सदियाँ बीत जायेंगी वो लम्हा याद रहेगा
आप चले गये भले ही इस जहां से पर

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