नैला के सुशील कुमार जैन के निवास पहुंचे मुनि जी महाराज-
सक्ती-चर्या शिरोमणि अध्यात्म योगी पूज्य आचार्य 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के परम प्रभावी शिष्य पूज्य मुनि 108 सुयश सागर जी महाराज एवं पूज्य मुनि 108 सद्भाव सागर जी महाराज जशपुर नगर में चातुर्मास करने के पश्चात रायगढ़ खरसिया शक्ति होकर 1 दिसंबर को नैला पहुंचे जैन समाज ने उनकी गाजे बाजे के साथ अगवानी की पूज्य मुनि के 1 दिसंबर को आहार चर्या विकास जैन एवं हर्ष पाटनी जांजगीर के घर पर होने के पश्चात दोपहर 2:00 बजे भव्य शोभायात्रा के रूप में पूज्य मुनि संघ का नैला जैन मंदिर में शाम 5:00 बजे आगमन हुआ गुरु भक्ति आचार्य भक्ति के पश्चात णमोकार चालीसा का पाठ सभी भक्तों के द्वारा लयबद्ध गाया गया पूज्य मुनि के 2 दिसंबर की आहार चर्या सुशील कुमार जैन एवं यंत्र कुमार जैन के घर पर हुई पूज्य मुनि के सानिध्य में विश्व शांति हेतु मूलनायक भगवान महावीर स्वामी विधान का आयोजन किया गया उक्त विधान में सौधर्म इंद्र यंत्र कुमार जी जैन एवं कुबेर की भूमिका में सुशील कुमार जैन अध्यक्ष जैन समाज नैला बने भगवान महावीर स्वामी की प्रतिमा पाण्डुक शिला में विराजमान कर बबलू जैन नवापारा राजिम को शांति धारा करने का सौभाग्य मिला पूज्य मुनि के तीन दिवसीय प्रवास में प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे शांति धारा एवं दो प्रवचन तथा शाम 6:30 बजे आचार्य भक्ति, प्रवचन, णमोकार चालीसा का पाठ करने के पश्चात शंका समाधान एवं भजन किया गया

आज दोपहर 2:00 बजे पूज्य मुनि संघ के द्वारा सर्व समाज नैला को धर्म सभा के रूप में संबोधित किया गया पूज्य मुनि सुयश सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि दृष्टि पवित्र है तो सृष्टि पवित्र है गुरुओं की प्रज्ञा कारिणी दृष्टि से शिष्य और भक्त आत्म उन्नति को प्राप्त होता है गुरु परीक्षा के द्वारा योग्यता को परखते हैं शिष्य उस योग्यता में अपने आप को निपुण पाते हैं,सुनना भिन्न विषय है सुनकर समझना भिन्न विषय है एक का अर्थ शब्दों के अर्थ को जानना और एक का अर्थ सुनने के पश्चात जो जीवन में चरितार्थ हो पूज्य मुनि श्री ने कहा कि दृष्टि जैसी होती है वस्तु वैसी ही दिखाई देती है एक वस्तु को जानने वाले अनेक दृष्टियां हैं दृष्टि अच्छी है तो वस्तु अच्छी दिखती है और यदि आपकी दृष्टि खराब है तो अच्छी वस्तु भी खराब दिखाई देती है पूज्य मुनि श्री ने कहा कि साधु किसी समाज विशेष के नहीं होते हैं साधु प्राणी मात्र होते हैं साधु की साधुता का अर्थ है सबको समान दृष्टि से देखना एवं प्राणी मात्र से दया भाव रखना वीतराग वाणी मात्र जैनों के लिए नहीं बल्कि जन जन के लिए होती है जगत की सारी आत्माएं समान है बाहरी रूप भले ही भिन्न-भिन्न में दिखते हो लेकिन आत्मिक रूप से सभी जीव एक समान है

मुनि राज निर्वस्त्र नहीं होते मुनिराज दिगंबर होते हैं अर्थात चारों दिशाएं ही उनका वस्त्र है निर्वस्त्र तो वह होते हैं जो वस्त्र पहनकर उतार दे मुनि का रूप प्रकृति का रूप है आज तक कोई मनुष्य ऐसा नहीं हुआ जिसने वस्त्र के साथ जन्म लिया हो वह आया तो नंगा ही है और जाता भी नंगा है बीच का समय सिर्फ दंगा में ही चला जाता है वासना को ढ़कने के लिए वस्त्र पहने जाते हैं दिगंबर मुनियों ने वासना को जीता इसीलिए वे निर्वस्त्र रहते हुए नग्नता को धारण करते हैं लोग कभी अच्छे या बुरे नहीं होते यह हमारी दृष्टि के ऊपर निर्भर है दृष्टि पवित्र है तो लोग अच्छे लगते हैं और यदि दृष्टि में विकार है तो लोग बुरे लगते हैं मनुष्य को अपनी दृष्टि बदलने की आवश्यकता है स्वयं की दृष्टि बदले तो किसी अन्य को बदलने के लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा शास्त्र सभा के बाद मुनिराज पद विहार करते हुए अकलतरा की ओर गमन किए