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सीएम भूपेश के राजनीतिक बयान के मायने?
छत्तीसगढ़ में अभी तक 37 विधायकों की रिर्पोट खराब होने की खबरें तैरती रही, जिसमें आधा से ज्यादा मंत्रियों के नाम भी शामिल बताए जा रहे हैं। कई सर्वे रिर्पोटों में कहा गया है कि इन 37 विधायकों से जनता संतुष्ट नहीं है। यहां तक की कांग्रेस के आतंरिक सर्वे रिर्पोटों की भी खबरें आती रही हैं, खैर सच्चाई क्या
है यह तो कांग्रेस के नेता ही जानेंगे। लेकिन सीएम भूपेश बघेल द्वारा दिए गए हाल ही के बयान ने सबको हैरान कर दिया है। सीएम बघेल के बयान से जहां भाजपा ने राहत की सांस ली है, वहीं कांग्रेसी नेताओं के पसीने छूटने लगे हैं। दरअसल में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कुछ दिन पहले सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि सिर्फ दो-चार विधायकों की ही रिपोर्ट ठीक नहीं हैं, बाकी सबने पिछले चार साल में बढिय़ा काम किया है। बघेल के इस राजनीतिक बयान के आखिर क्या मायने हैं? क्या राजनीतिक मायनों में सीएम भूपेश का यह बयान इंडिकेट करता है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव में 2-4 विधायकों के ही टिकट काटने वाली है। बाकी विधायक फिर से चुनावी मैदान में वापसी कर सकते हैं? यदि वास्तव में ऐसा हुआ तो क्या कांग्रेस 70 पार का लक्ष्य हासिल कर पायेगी? चुनाव परिणाम क्या होगें यह तो आने वाले समय में पता लग सकेगा फिलहाल सीएम भूपेश के इस बयान ने टिकट की दावेदारी करने वाले कांग्रेसी नेताओं की उम्मीदों में पानी फेर दिया है।
सत्तु भईया की सरदर्दी

चुनावी समय चक्र अब उल्टा घूमना शुरु कर दिया है। राज्य में महज दो माह बाद विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में गिनती के दिन ही शेष बचे हैं। चुनावी समय नजदीक आते ही दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस जोड़-तोड़ में जुट गए हैं। वैसे तो जोड़-तोड़ में इन दिनों पूरे देश में भाजपा को महारथ हासिल है। रायपुर ग्रामीण जो अभी तक कांग्रेस के लिए मजबूत सीट दिख रही थी, उसमें अब कड़ा मुकाबला होने जा रहा है। चुनावी परिणाम किसके फेवर में होंगे यह तो कुछ कहा नहीं जा सकता, पर रायपुर ग्रामीण से विधायक कद्दावर नेता सत्यनारायण शर्मा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। दरअसल में भाजपा के रणनीतिकार छत्तीसगढ़ की एक-एक सीट पर जीत के फार्मूले के साथ काम पर फोकस कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस प्रत्यासी सिर्फ सीएम भूपेश बघेल के भरोसे मैदान पर उतरना चाह रहे हैं। हालांकि सरल छवि के नेता सत्यनारायण शर्मा की इस क्षेत्र में काफी पकड़ हैं। वहीं भूपेश सरकार की योजना भी जनता को खूब आकर्षित कर रही हैं। लेकिन यह सब कितना प्रभावी होगा यह तो निकट भविष्य में ही पता चल सकेगा। फिलहाल भाजपा ने बीरगांव के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष डॉ. ओम प्रकाश देवांगन को अपने पाले में कर लिया है। डॉ. देवांगन कभी सत्यनारायण शर्मा के बेहद करीबी थे, लेकिन ओम प्रकाश देवांगन को कांग्रेस में अपना भविष्य नहीं दिखाई दे रहा था, इसलिए वह पिछले विधानसभा चुनाव में छजकां में चले गए। उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा कांग्रेस के बीच निकटतम मुकाबले मे त्रिकोणीय चुनावी में छजकां को विजयश्री मिल जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। डॉ. देवांगन चुनाव तो नहीं जीते, लेकिन 17175 मत हासिल कर उन्होंने भाजपा को रेस से बाहर कर दिया। वह तीसरे स्थान पर रहें। वहीं कांग्रेस प्रत्यासी सत्यनाराण शर्मा त्रिकोणीय मुकाबले में 10453 मतों से चुनाव जीत गए। कहा जाता है कि ओम प्रकाश देवांगन का बीरगांव क्षेत्र में अपना प्रभाव है। बिना पार्टी सिम्बाल के भी वह 10-15 हजार मत हासिल करने की क्षमता रखते हैं। भाजपा ने एक दांव चलकर इस सीट में कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।
अब योगेश की बारी?
सीएम भूपेश बघेल विगत पांच साल में अपनी योजनाओं के बदौलत राज्य में एक नई पहचान बनाने में सफलता हासिल की है। इसके ठीक
विपरीत गुटबाजी के कारण कांग्रेस का संगठन बीते सालों में ठंडा पड़ा रहा। कांग्रेस के मुकाबले भाजपा जोड़-तोड़ में फिलहाल आगे निकल चुकी है। रायपुर ग्रामीण के बाद भाजपा जल्द ही बेमेतरा विधानसभा सीट में एक नया दांव खेल सकती है। बीते विधानसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस ने 68 सीट जीतने में सफलता हासिल की थी, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि घोर एंटी-इनकंबेंसी के बाद भी ज्यादातर सीटों में मुकाबला नजदीकी रहा है। वहीं कुछ सीटों में छजकां ने भाजपा के वोटरों को प्रभावित किया था। साथ ही कांग्रेस के घोषणा पत्र का प्रभाव 2018 के चुनाव परिणाम में सीधे दिखाई दिया, जो अगामी चुनाव में कितना असर करेगा यह तो भविष्य के गर्त में है। फिलहाल एक-एक सीट में भाजपा नए समीकरण की ओर आगे बढ़ रही है। 2018 के विधानसभा चुनाव में बेमेतरा सीट में कांग्रेस प्रत्यासी आशीष छाबड़ा और भाजपा प्रत्यासी अवधेश चंदेल के बीच मुकाबला रहा। वहीं छजकां प्रत्यासी योगेश तिवारी 28332 मत हासिल करने में कामयाब हुए थे। भाजपा प्रत्यासी अवधेश चंदेल को 49783 मत मिले थे। वहीं कांग्रेस प्रत्यासी आशीष छाबड़ा 74914 मत पाकर जीत हासिल की थी। बीते चुनाव में इस सीट में भी त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला था। भाजपा के रणनीतिकार इस बात को भली-भांति जानते हैं कि योगेश तिवारी एक मजबूत प्रत्यासी हो सकते हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि पिछले चुनाव में ही भाजपा और योगेश के मत आपस में बंटे नहीं होते, तो शायद परिणाम कुछ और होते। इसलिए भाजपा अब योगेश तिवारी को अपने पाले में करने की जुगत में लग चुकी है।
रमन का यह कैसा मूल्याकंन ?
स्व. अटल बिहारी वाजपाई ने आज से 23 साल पहले नये राज्य की सौगात दी, जिसे हम और आप आज
छत्तीसगढ के नाम से जानते हैं। डॉ. रमन सिंह तब केन्द्र की टीम का हिस्सा हुआ करते थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि केन्द्र में रहते हुए अटल की दृष्टि रमन पर पड़ चुकी थी, राज्य में भाजपा की सरकार बनने पर रमन सिंह को छत्तीसगढ़ का सीएम बनाया गया। रमन के सामने चुनौतियां कम नहीं थी, 10 साल तक केन्द्र में यूपीए की सरकार रहने बाद भी वह छत्तीसगढ़ में लगातार जीत का परचम लहराते रहे। रमन सिंह के नेतृत्व में राज्य में एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन बार भाजपा की सरकार बनी। आज अटल के रमन का भाजपा कैसा मूल्यांकन कर रही हैं, इसे देखकर राजनीतिक विश्लेषक आश्चर्यचकित हैं। राज्य के दो नेत्री राज्यसभा संासद सरोज पांडे और पूर्व मंत्री लता उसेण्डी को भाजपा ने हाल ही में पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है। इन्हें किन समीकरणों के आधार पर बनाया गया है यह तो पार्टी के खेवनहार ही जानेगें। लेकिन अब रमन, सरोज और लता समकक्ष हो गए हैं, तीनों ही नेता अब भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। लता और सरोज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाने से राज्य के राजनीतिक समीकरणों में क्या फर्क पड़ेगा यह तो निकट भविष्य में ही पता चलेगा, लेकिन फिलहाल रमन के कद को बिना घटाए कम कर दिया गया है।
ब्यूटी पार्लर की चर्चा
छत्तीसगढ़ में ब्यूटी पार्लर का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है। कुछ दिनों तक एक रिटायर आईएएस के पत्नि के ब्यूटी पार्लर की चर्चा हुआ करती थी। अब एक आईएफएस अफसर की पत्नि द्वारा संचालित ब्यूटी पार्लर की जमकर चर्चा है। वैसे तो वन विभाग वाले इन साहब का जुगाड़ अच्छा खासा है। कहते हैं कि इनकी नजर हमेशा बड़े वनमण्डलों पर रहती है। वर्तमान में भी यह 100 करोड़ के बजट वाले वनमण्डल में पदस्थ हैं।
अनिल साहू की पोष्टिंग पर निगाहें
सीनियर आईएफएस अनिल साहू पीसीसीएफ प्रमोट हो चुके हैं। कहते है उनके पोष्टिंग की भी फाइल मुखिया तक
पहुंच चुकी है। श्रीनिवास राव वर्तमान में वनबल प्रमुख की सीट को सम्भाल रहे है, लेकिन अनिल साहू राव से सीनियर हैं। अनिल साहू ने पीसीसीएफ प्रमोट होने के बाद विभाग में लौटने की इच्छा जाहिर की है। कहते हैं कि राव की भांति अनिल साहू के सम्बन्ध दोनों दलों के नेताओं से मधुर हैं। ऐसे में अनिल साहू नम्बर वन या नम्बर टू सीट चाह रहे हैं, जिसके कारण उनकी नियुक्ति का मामला अभी तक अटका हुआ है। राव के नियुक्ति के बाद पहले से ही अरण्य भवन में सीनियर जूनियर का मामला गरमाया हुआ हैं। विगत दिनों यह बात सामने आई कि अनिल साहू को पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ बनाया जा सकता है। लेकिन अरण्य भवन के सबसे सीनियर आईएफएस सुधीर अग्रवाल भी अब इस पायदान ने नीचे जाने को किसी भी हाल में तैयार नहीं हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अरण्य भवन में एक नया समीकरण देखने को मिल सकता है।
आईएएस अफसरों पर गाय-बैल की जवाबदेही
राज्य सरकार ने सड़कों पर घूम रहे मवेसियों को लेकर सख्त निर्णय लिया है, जिसको लेकर
सीएस लेवल की बैठक आयोजित की गई। कहते है कि इस काम के लिए बंद कमरे में अफसरों से सुझाव भी मांगे गए हैं। जिला कलेक्टरों और अफसरों को साफ निर्देश है कि कोई भी मवेशी सड़क पर दिखाई नहीं देना चाहिए। फिर क्या अब सीएस के आदेश के बाद राज्य के अफसर इन दिनों इस काम में मुश्तैदी से जुट गए हैं। रायपुर कलेक्टर ने बकायदा जुर्माना का आदेश भी जारी कर दिया है, वहीं निगम ने भी इस काम के लिए अधिकारियों की ड्युटी लगा दी है।
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