हलचल… 30 के बाज़ीगर

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30 के बाज़ीगर

छत्तीसगढ़ में होने वाला विधानसभा चुनाव बहुत ही रोमांचक होगा। राज्य में कुल 90 विधानसभा सीट हैं। यदि तमाम सर्वे रिर्पोटों की माने तो 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 30 सीट हासिल करने से कोई रोक नहीं सकता। वहीं दूसरी ओर विधायकों का परफारमेन्स कितना भी खराब हो कांग्रेस की 30 सीट कोई छीन नहीं सकता। कुल मिलाकर चुनावी संघर्ष राज्य की 30 सीटों पर है। यानी कि 30 सीटों की बाजी जिसके हाथ में वही बाज़ीगर कहलाएगा। भाजपा के रणनीतिकार शाह छत्तीसगढ़ में कुछ इसी फार्मूले पर काम करना चाह रहे हैं। अमित शाह की छटपटाहट बता रही है कि भाजपा छत्तीसगढ़ में किसी भी हाल में सत्ता हासिल करने को बेताब है। शायद यहीं कारण है कि एक माह के भीतर शाह तीसरी बार छत्तीसगढ़ पहुंचे हैं। शाह राज्य के तमाम भाजपा नेताओं से एक बार फि र चुनावी मंथन करेंगे। कहतें है कि अमित शाह की एक सर्वे टीम ने भी छत्तीसगढ़ में सर्वे किया है। जिसके बाद शाह के कान खडे हो गए। आंतरिक सूत्र बताते है कि शाह के सर्वे रिर्पोट के अनुसार छत्तीसगढ़ में भाजपा महज 30 से 32 सीटें हासिल करने में कामयाब होते दिख रही है। लेकिन इतनी सीटें सरकार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अब भाजपा का फोकस उन 30 विधानसभा सीटों पर हैं, जहां पर दोनों ही पार्टियों के लिए हां और ना कि स्थिति बनी हुई है। वर्तमान सियासी हालातों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि 30 के बाज़ीगर के हांथ में ही छत्तीसगढ़ की बाजी होगी।

धान के मुद्दे को भोथरा करने की तैयारी

भाजपा यह भली-भांति जानती है कि जब तक छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के धान के मुद्दे को भोथरा नहीं किया जाएगा, तब तक राज्य में सत्ता वापसी संभव नहीं है। शायद यही कारण है कि माथुर हमेशा बोलते नजर आते हैं कि हमने धान की काट ढूंढ रखा है, इंतजार करिये। तो क्या वास्तव में भाजपा ने धान खरीदी का काट ढूंढ लिया है? क्या भाजपा कांग्रेस से जादा कीमत में धान खरीदने वाली है? कहते हैं कि यह तामाम सवाल उछालना भाजपा की रणनीति का अहम हिस्सा है। माथुर ने सब जानते हुए सोची समझी रणनीति के तहत इन सवालों को उछाला है। ओम माथुर के इन बयानों के बाद कांग्रेस भी दुविधा में दिखाई दे रही है। कांग्रेस यह सोचने में मजबूर हो गई है कि कहीं सच में भाजपा धान की कीमत 2800 से बढाकर 3000रू प्रति क्वींटल कर दिया, तो क्या होगा? वहीें भाजपा को यह भय है कि उनके द्वारा 3000 रुपये की दर से धान खरीदी का ऐलान किया गया, तो कांग्रेस 3200 प्रति क्विंटल में धान खरीदी का ऐलान कर सकती है। विश्वस्त सूत्र कहते हैं कि अब इसको लेकर भाजपा प्लान ‘बी पर भी काम करना शुरु कर दिया है। आखिर क्या है भाजपा का प्लान ‘बी? जी हां भाजपा के आंतरिक सूत्रों की माने तो बीजेपी किसानों के साथ-साथ बटाइदारों को भी बडी सौगात दे सकती है। दअसल में बटाईदारों का फार्मूला किसानों में फू ट डाल सकता है। छत्तीसगढ़ में प्राय: यह देखा जाता है कि छोटे किसानों को छोड दें तो ज्यादातर किसानों के यहां बटाईदार ही खेती-किसानी का काम करते हैं। भाजपा यदि यह दांव चलती है, तो किसानों में दो फ ाड़ हो जाएगा। इसके रणनीति पर घोषणा पत्र समिति मंथन कर रही है।

तास के पत्तों की तरह फेंटे जा रहे आदिवासी नेता?

छत्तीसगढ़ राज्य में 3 महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। यहां दोनो ही प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा चुनावी तैयारी में जुट गए हैं। छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बाहुल्य राज्य है। यहां की 26 सीटें सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनो दल आदिवासी वोटरों को साधने में जुटे हुए हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद भाजपा की पूर्व प्रभारी डी पुरंदेश्वरी और वर्तमान प्रभारी ओम माथुर ने बस्तर में लगातार डेरा डाल रखा। तों वहीं कांग्रेस भी अपनी स्थिति को फि र यथावत रखने आदिवासी नेताओं को तास की पत्तों की तरह फेंट रही है। खैर दोनो में किस दल की ओर आदिवासी वोटरों का रुख होगा यह तो आने वाले समय में ही पता लग सकेगा। लेकिन इस बीच कांग्रेस पार्टी के अन्दर जमकर उथल-पुथल देखने को मिल रहा है। कांग्रेस ने पहले एक आदिवासी नेता मोहन मरकाम से पीसीसी चीफ की कुर्सी छीन ली। मरकाम से कुर्सी छीनकर फि र यह कुर्सी एक आदिवासी नेता को ही सौंप दी गई। मोहन मरकाम को हटाकर दीपक बैज को पीसीसी चीफ बना दिया गया। इसके ठीक बाद एक और घटनाक्रम सामने आया सीनियर आदिवासी मंत्री प्रेमसाय सिंह टेकाम से इस्तीफा ले लिया गया। यहां भी टेकाम से इस्तीफा लेकर फि र दूसरे आदिवासी नेता को मंत्री बना दिया गया। प्रेमसाय सिंह टेकाम से इस्तीफा लेकर मोहन मरकाम को मंत्री बनाया गया। वहीं दीपक बैज के पीसीसी चीफ बनते ही राज्यसभा सांसद फू लोदवी नेताम ने महिला मोर्चा के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। अब फू लो देवी की जगह फि र कोई आदिवासी महिला को यह जिम्मेदारी सौंपी जाएगी या और किसी अन्य को महिला मोर्चा का अध्यक्ष बनाया जाएगा, यह तो निकट भविष्य में ही पता लग सकेगा। फि लहाल यह कहा जा सकता है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में इन 26 सीट के वोटरों को साधने के लिए कांग्रेस आदिवासी नेताओं को तास की पत्तों की तरह फेंटते नजर आ रही है।

अफसरशाही के लिए शुभ संकेत नहीं

काफ़ी दिनों से ईडी की राडार पर रहीं आईएएस रानू साहू को आखिरकर गिरफ्तार कर ही लिया गया। रानू साहू की गिरफ्तारी अफ सरशाही के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। रानू के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के अन्य कई अफ सर भी ईडी के राडार पर हैं, कुल मिलाकर उनके शनि की दशा भी खराब दिख रही है। कहते हैं कि ईडी पिछले कई माह से आईएएस रानू साहू और अन्य अफ सरों के खिलाफ दस्तावेज जुटाने में लगी हुई थी। ईडी के पास राज्य के हर विभाग की कुडंली पहुंच चुकी है। शायद यही कारण है कि पीएम मोदी ने छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान भरी सभा में कहा था कि ऐसा कोई विभाग नहीं जहां गडबडियां न हो, मोदी ने चेताते हुए साफ तौर पर कहा है कि भ्रष्टाचारी बक्शे नहीं जाएंगे। इस बीच शराब मामले पर ईडी द्वारा चालान पेश कर दिया गया। ईडी की जानाकारी रखने वाले सूत्र बताते हैं कि अब ईडी के निशाने पर माइनिंग-डीएमएफ , फू ड और वन विभाग के अफ सर हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि एक कारोबारी नेता के डायरी ने कई अफ सरों के नाम भी उगले हैं। बहरहाल भ्रष्टाचार के आरोप में राज्य के दो सीनियर आईएएस समेत कई अफ सर सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं, जो अफ सरशाही के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।

क्या नग्न प्रदर्शन इतिहास के पन्नों से हटाया जा सकता है?

छत्तीसगढ़ में हुए नग्न प्रदर्शन ने पूरे देश में राज्य की छवि को धूमिल किया है। आम तौर पर छत्तीसगढ़ शांत प्रांत माना जाता है। यहां के लोग सीधे और सरल होते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ की घटना को मणिपुर की घटना से जोड दिया गया, जो कतई नहीं होना था। युवाओं का प्रदर्शन कितना जायज है यह तो सरकार और सिस्टम को तय करना है। लेकिन चेतावनी के बाद भी पूरा सिस्टम सोया रहा, इस पर जाबाबदेही क्यों तय नहीं की गई? समाचार पत्रों में नग्न प्रदर्शन करने की चेतावनी की खबरें भी प्रकाशित हुईं। इस पर समय रहते एक्सन क्यूं नहीं लिया गया? युवाओं को बीच सडक में आखिर नग्न प्रदर्शन की नौबत क्यों आई? और वह हाई लेवल सिक्यूरिटी के बीच विधानसभा के उस मार्ग में कैसे पहुंच गए, जहां से सभी नेता, मंत्री, अधिकारी, मुख्यमंत्री गुजरते हैं। क्या यह सिस्टम का फैलियर नहीं कहलाएगा? प्रदर्शनकारी उन युवाओं पर पहले से ही आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं, सिर्फ यह कहने से क्या इतिहास के पन्नो से छत्तीसगढ़ का यह नग्न प्रर्दशन हटाया जा सकता है? शायद नहीं। फि र क्यों अभी तक जवाबदेही तय नहीं की गई।

रमन मंत्रिमंडल का दृश्य?

कांग्रेस सरकार के कामकाज से जनता खुश है, सरकार की योजनाओं की चारों ओर गूंज है। लेकिन पांच साल पूरे होते -होते भूपेश मंत्रिमंडल में रमन मंत्रिमडल का दृश्य दिखाई देने लगा है। यह हम नहीं कह रहे बल्कि छत्तीसगढ़ में हुए तमाम सर्वे और सर्वे ऑफ सर्वे की चर्चा में यह बातें सामने आ रही है। इन सर्वे और चर्चा में कितना दम है यह तो निकट भविष्य में ही पता चल सकेगा। सर्वे रिर्पोटों का मानना है कि 37 विधायकों की स्थिति ठीक नहीं है। जिसमें कई मंत्रियों के नाम भी शामिल हैं। अगर इन तामाम सर्वे और चर्चाओं की बात माने तो भूपेश मंत्रिमंडल में रमन मंत्रिमंडल का दृश्य दिखाई दे रहा है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सरकार तो गवायां ही रमन मंत्रिमण्डल के 80 प्रतिशत मंत्री भी चुनाव हार गए। जिसमेें सर्वप्रथम प्रेमप्रकाश पांडे, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत, केदार कश्यप, रामसेवक पैकरा, दयालदास बघेल, भइयालाल रजवाडे, रमशीला साहू, के नाम शामिल हैं। वर्तमान में यदि सर्वे रिर्पोटों की बात करें तो कांग्रेस की स्थिति भाजपा की तरह बिलकुल नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस मजबूत स्थिति में हैं। अमूमन अब तक के सभी सर्वे रिर्पोटों का मामना है कि भले ही 37 विधायकों का परफ़ारमेन्स ठीक नहीं है, लेकिन राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते दिख रही है। कुछ सर्वे रिर्पोटों में भूपेश मंत्रिमंडल के कई मंत्रियों की स्थिति ठीक नहीं बताई जा रही है। कुल मिलाकर भूपेश मंत्रिमण्डल में रमन मंत्रिमंडल का दृष्य दिखाई दे रहा है।

जंगल में चारों तरफ हरियाली, यहां किसी को कुछ नहीं दिखता

बरसात के मौसम में जंगल हरे-भरे रहते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ वन विभाग के कर्ता-धर्ताओं को हर वक्त, हर मौसम हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है। प्रभारी सीसीएफ की पदस्थापना को लेकर लोग इन दिनों चुटकियां ले रहे हैं। कई आईएफ एस अफ सरों से जूनियर श्रीनिवास राव को वन बल प्रमुख बनाकर सरकार वैसे ही सीनियर आईएफ एस अफ सरों को ख़फ़ा कर बैठी है। अब एक सीएफ स्तर के अफ सर दिलराज प्रभाकर को दुर्ग ही नहीं बल्कि रायपुर सर्कल का प्रभारी सीसीएफ बना दिया गया है। इस नियुक्ति के बाद से कई आईएफ एस अफ सरों में हातासा का भाव दिखने लगा है। कहते हैं कि आईएफ एस दिलराज प्रभाकर के खिलाफ विभागीय जांच में गभीर अनियमिताएं उजागर हुई हैं। दुर्ग के तत्कालीन सीसीएफ ने उनकी चार्ज सीट भी बनाकर अरण्य भवन भेज दिया है। अब मालिक मकबूजा कांड में फं से इसी सीएफ स्तर के अफ सर को दुर्ग ही नहीं रायपुर का भी प्रभारी सीसीएफ बना दिया गया है। दिलराज को प्रभारी सीसीएफ बनाने के बाद से लोग यह कह रहे हैं, कि जंगल में सब हरा-हरा है, यहां दूर-दूर तक किसी को कुछ दिखाई नहीं देता।

कभी शाबाशी देने वाले पट्टे ने उलझाया

कहते है कि राजनीति दांव-पेच का खेल है। कब कौन सा दांव काम आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। अफ सर से नेता बनने की चाह ने एक आदिवासी अफ सर को बुरी तरह उलझा दिया है। 2019-20 में साहब ने अपने क्षेत्र में जमकर पटटा बांटा। कहते हैं कि उस समय सरकार ने उन्हें इसके लिए शाबाशी भी दी, अब वहीं पट्टा राजनीतिक दांव बन गया है। कुल मिलाकर
अफ सर से नेता बनने की चाह ने साहब को बुरी तरह उलझा दिया है।

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