हलचल… दो खोखा का सच क्या?

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पिंगुआ, ऋचा और अंकित दिल्ली की ओर

सीनियर आईएएस एसीएस ऋचा शर्मा, मनोज पिंगुआ और छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के अध्यक्ष अंकित आनंद ने दिल्ली जाने का पूरा मन बना लिया है। एसीएस ऋचा शर्मा के जनवरी में दिल्ली डेपुटेशन में जाने की खबरें थी। लेकिन अब यह सिलसिला बढ़ते दिख रहा है। दरअसल अब ऋचा ही नहीं बल्कि एसीएस मनोज कुमार पिंगुआ भी दिल्ली जाने का मन बना लिये हैं। संभव है जनवरी 2026 में ऋचा शर्मा के साथ मनोज पिंगुआ भी राज्य छोड़कर केन्द्र सरकार में सेवाएं देते नजर आयें। वहीं 2006 बैच के आईएएस पर्यावरण संरक्षण मंडल के अध्यक्ष अंकित आनंद भी दिल्ली जाने का मन बना चुके हैं। सभंव है अंकित इसके लिए जल्द ही आवेदन कर दें। एसीएस ऋचा शर्मा के पास वर्तमान में वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की जिम्मेदारी है, वहीं एसीएस मनोज पिंगुआ वर्तमान में गृह विभाग की जिम्मेदारी सम्भाल रहे हैं। इन तीनों अफसरों के प्रतिनियुक्ति में जाते ही एक बार फिर सचिव स्तर के अफसरों के प्रभार बदले जाएंगे।

दो खोखा का सच क्या?

तकरीबन एक से डेढ़ माह पहले एक आईएफएस अधिकारी ने अपनी पोष्टिंग के लिए एड़ी चोटी लगा दी। कहते हैं कि वह बस्तर से निकलकर सरगुजा संभाग के माइनिंग वाली जगह पर पोष्टिंग के लिए एक खोखा एडवांस छोड़ा था। लेकिन एक खोखा देकर वह जहां जाना चाहते थे, वहां से वर्तमान को यथावत रखने का भारी दबाव था। मशलन खोखा भी गया और मनचाही पोष्टिंग भी नहीं मिली। लेकिन कहते हैं कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। डेढ़ माह के अंदर साहब ने फिर जुगाड़ बैठाया एक खोखा को बढ़ाकर दो खोखा कर दिया और सरगुजा संभाग में मनचाही पोष्टिंग पा ली। अब खोखा का सच क्या है? फिलहाल इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन डेढ़ माह के भीतर साहब की पोष्टिंग का दूसरा आर्डर जारी हो जाना इन बातों पर बल देता है। इसको लेकर सवाल उठना भी लाजमी है। हालांकि इसके पहले भी यह अफसर चर्चा में रहे। कैंपा मद से एक करोड़ रुपये की अनियमितता उजागर हुई थी, जिसकी चार्ज सीट अभी भी मुख्यालय में धूल खा रही है। कहा तो यह भी जाता है कि उक्त एक करोड़ रुपये कैंपा के गुढिय़ारी वाले खाते में किसी ने वापस जमा कर दिये है। जब कोई इतना जुगाड़ जमाने की क्षमता रखता है, तो उसके लिए एक-दो खोखा भला क्या मायने रखता है।

सिंह समेत कुछ और आईपीएस दिल्ली जाने की तैयारी में

महासमुंद जिले के एसपी आईपीएस आशुतोष सिंह केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति में जाने वाले हैं। कलेक्टर-एसपी कॉन्फ्रेंस के दौरान महासमुंद एसपी सिंह और उपमुख्यंत्री विजय शर्मा के बीच बहस की बात सामने आई थी। खैर अब आशुतोष सिंह को सीबीआई में पोष्टिंग मिल गई है। राज्य सरकार इन्हें जल्द रिलीव कर सकती है। वहीं इनके अलावा भी दो और आईपीएस अफसर के दिल्ली जाने की सुगबुगी है। कहते हैं कि यह दोनों अफसर सरकार से काफी खफा हैं। और केन्द्र सरकार में अपनी पोष्टिंग जमाने की जुगत में लगे हुए हैं। कुल मिलाकर सब ठीक-ठाक रहा तो तीन आईएएस अफसरों के साथ तीन आईपीएस अफसर भी दिल्ली का रुख कर सकते हैं।

पुलिस ही नहीं, चोर-डकैत भी खोज रहे सौम्या की सम्पत्ति

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ओएसडी रही सौम्या चौरसिया की 50 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति को जांच एजेंसियों ने खोज-खोज कर जप्त किया है। भ्रष्टाचार के चलते चौरसिया को जेल भी जाना पड़ा। लेकिन यह मामला यहीं नहीं समाप्त हुआ अब जांच एजेंसियों के साथ-साथ चोर और डकैत भी सौम्या चौरसिया की सम्पत्ति खोज रहे हैं। दरअसल कोरबा के जिस किसान के यहां डकैती डाली गई उसका नाता कभी सौम्या चौरसिया से था। किसान शत्रुहन की बेटी बचपन में सौम्या चौरसिया के घर पर रहती थीं। कहते तो यह भी हैं किसान शत्रुहन की बेटी की पढ़ाई-लिखाई और शादी का खर्च भी चौरसिया ने उठाया था। बहरहाल वास्तविक सच क्या है? फिलहाल यह तो सौम्या चौरसिया, किसान की बेटी बबीता और उन्हें लूटने निकले डकैत ही जानेंगे। लेकिन इस खबर से यह तो तय है कि सौम्या चौरसिया की संपत्ति की तलाश सिर्फ जांच एजेंसियों को नहीं है, बल्कि चोर-डकैत भी उनकी संपत्ति खोज रहे हैं। संभवत: इसी के चलते इस किसान को निशाना बनाया गया, और उसके घर तक को डकैतों ने खन-खोद डाला। शायद डकैत यह मानकर चल रहे थे कि सौम्या चौरसिया की बहुत सी संपत्ति इस किसान के पास होगी, उसके घरों में या जमीन के नीचे दबी होंगी, मकान के दीवारों में भी छुपाया गया होगा। शायद इसीलिए इस किसान के घर में डकैतों ने कई जगह गड्ढे भी खोदे।

बिजली बिल पर विचार

बढ़े हुए बिजली बिल पर सरकार को बड़े नुकसान की संभावनाओं के चलते, इस पर विचार मंथन जारी है। संभव है राज्य सरकार जनता को बढ़ी हुई बिजली दरों में कुछ राहत देने के लिए जल्द ही सकारात्मक निर्णय ले। दरअसल राज्य सरकार के द्वारा बढ़ाये गए बिजली बिल का विरोध शहर से ज्यादा गांवों में देखने को मिल रहा है। विपक्षी दल भले ही शांत है, लेकिन आम जनता इसके लिए मुखर होते दिख रही है। जिसको देखते हुए और बड़े राजनीतिक नुकसान की आशंका के चलते इस पर राज्य सरकार जल्द ही कोई बड़ा निर्णय ले सकती है। निश्चित ही सरकार के निर्णय से राज्य की जनता को लाभ मिलेगा। दरअसल सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जनता के खाते में सीधा रुपये डालने का काम कर रही है। इसके चलते यह माना जा रहा था कि बढ़े हुए बिजली बिल का जनता इतना तगड़ा विरोध नहीं करेगी। लेकिन विरोध का स्वर बड़े नुकसान की ओर इशारा कर रहा है। जिसके वजह से जल्द ही राज्य की जनता को बिजली दरों में खुशखबरी सुनने को मिल सकती है।

खूबी या विडंबना

भारतीय लोकतंत्र की अनेकों खुबियां हैं, साथ ही कुछ बिडंबना भी समय-समय पर देखने को मिलती है। यहां मंत्री बनने के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं है, लेकिन पीए योग्य होना चाहिए। राज्य के एक मंत्री ने एक व्यक्ति विशेष को अपना निजी सहायक बनाने की मांग की थी। इसके लिए बकायदा सामाान्य प्रशासन विभाग तक पत्राचार हुआ। लेकिन निजी सहायक का पद शिक्षा योग्यता के अभाव में हाथ से निकल गया। मंत्री जी को भी मनचाहे व्यक्ति को निजी सहायक बनाने में निराशा हाथ ली। दरअसल छत्तीसगढ़ सचिवालय सेवा भर्ती नियम 2012 के अनुसार निजी सहायक पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 12वीं पास निर्धारित है। लेकिन जिस कर्मचारी को मंत्री ने पीए बनाने की मांग की थी वह 8वीं पास है, जिसके कारण मामला फंस गया। नजीतन यह व्यक्ति मंत्री जी का निजी सहायक तो नहीं बन सका, लेकिन चर्चा का केन्द्र बन गया। लोग यह कहते-सुनते नजर आते हैं कि मंत्री का पीए बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता निर्धारित है, लेकिन मंत्री बनने की कोई योग्यता निर्धारित नहीं है।

यूनिटी मार्च में नहीं दिखी यूनिटी

यूनिटी मार्च के दौरान बिलासपुर में भाजपा नेत्री हर्षिता पांडे और बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला आपस में भिड़ गए। वैसे तो यह यूनिटी मार्च था, लेकिन बिलासपुर में यूनिटी जैसा कोई दृश्य जनता को नहीं दिखा। दोनों ही नेताओं के सार्वजनिक झगड़े की चर्चा सोसल मीडिया में छाया रहा। दरअसल यह विवाद प्रथम पंक्ति में आने के लिए हुआ। प्रथम पंक्ति में केन्द्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू राष्ट्र ध्वज लेकर चल रहे थे। केन्द्रीय मंत्री के साथ-साथ चलने का विवाद सार्वजनिक हो गया। हर्षिता पांडे भी केन्द्रीय मंत्री के साथ प्रथम पंक्ति में चलना चाहती थीं। वहीं विधायक होने के नाते सुशांत भी केन्दीय मंत्री के बगल में चलना चाहते थे। इसी को लेकर दोनों के बीच झड़प हो गई। मामला गरमाते देख हर्षिता को एक कार्यकर्ता ने पकड़ लिया। वहीं विधायक सुशांत शुक्ला को भी शांत कराया गया। कुल मिलाकर बिलासपुर के यूनिटी मार्च में भाजपा नेताओं की यूनिटी बिलकुल नहीं दिखी।

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