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महंत का क्या?
छत्तीसगढ़ में चुनावी संग्राम का शंखनाद हो चुका है। भले ही चुनाव के लिए अभी तक अधिसूचना नहीं जारी हुई, लेकिन दोनों दल के नेता मैदान में ताल ठोंकना शुरु कर दिये हैं। राज्य में विधानसभा अध्यक्ष को लेकर एक धारणा बनी हुई है। कहा जाता है कि विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी में जो नेता विराजमान होते है, जनता उसे चुनाव में स्वीकार नहीं करती। इसके पीछे क्या कारण है यह तो शोध का विषय है, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटाया जाए तो यह बात अब तक सोलह आने सच है। वास्तव में तीन-तीन अध्यक्षों का चुनाव हारना महज एक संयोग नहीं हो सकता। जबकि पूर्व के अध्यक्ष भी अपने निर्वाचन क्षेत्र के मझे हुए खिलाड़ी थे। महंत उनसे 20 हैं लेकिन 19 नहीं। आमतौर पर महंत सरल छवि के नेता के रुप में जाने जाते हैं। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही यह कहा जा रहा है कि महंत को पूर्व विधानसभा अध्यक्षों के पराजय का खौफ तो नहीं सता रहा है? हालांकि महंत के पक्ष में एक मजबूत तथ्य यह है वह आमतौर पर चुनाव पराजित नहीं होते, चाहे वह अपने क्षेत्र से चुनाव लडें या क्षेत्र बदलकर चुनाव लड़ें। डॉ. महंत 2018 में भी अपना क्षेत्र बदलकर सक्ति से चुनाव लड़े थे। सम्भवत: वह इस बार भी क्षेत्र बदल सकते हैं। विधानसभा अध्यक्ष रहते हुए प्रेमप्रकाश पांडे, धरमलाल कौशिक, गौरीशंकर अग्रवाल चुनाव हार चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि महंत क्या ?
ढेबर के लिए सीट रिजर्व ?
छत्तीसगढ़ में होने वाला विधानसभा चुनाव बेहद ही रोमांचक होने जा रहा है। रायपुर की चारों सीटों पर महामुकाबला होगा। रायपुर के महापौर एजाज ढेबर ने राजधानी की दो सीटों उत्तर और दक्षिण से दावेदरी की है। ढेबर जैसे ताकतवर नेता जब दावेदारी करते हैं, तो निश्चित ही उनके पीछे बड़े नेता पूरी तकात से खड़े होते हैं और यह माना जा रहा है कि ढेबर बिना निर्देश के दोनों सीटों से दावेदारी नहीं करेंगे। ढेबर की दावेदारी ने यह तो तय कर दिया है कि रायपुर की एक सीट कांग्रेस ढेबर के लिए रिजर्व रखने जा रही है। यह बात अलग है कि कांग्रेस पार्टी उन्हें दक्षिण से चुनाव लड़ाना चाहती है, लेकिन ढेबर की मंशा उत्तर से चुनाव लडऩे की है। फिलहाल यह तो निकट भविष्य में पता चल सकेगा कि एजाज ढेबर कौन सी सीट से चुनाव लडेंग़े। लेकिन एजाज की दोवदारी से भाजपाई नेता ही नहीं कांग्रेसी नेताओं की धड़कने बढ़ गई हैं।
अगले जनम मुझे एएसआई ही बनाना प्रभू
वैसे तो सट्टा, जुआं, नशाखोरी का समाज में बहुत बुरा असर पड़ता है। पुलिस इन समाजिक बुराइयों के विरुद्ध कार्रवाई भी करती है। लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस का एक एएसआई सट्टा के कारोबार में करोड़ों में खेलता रहा, उस पर यह भी आरोप है कि वह करोड़ों रुपये अपने बड़े अफसरों और नेताओं को भी बांटे। खैर क्या सच है, क्या झूठ यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। लेकिन इस घटना के बाद सावन जाते-जाते एकबार फिर महादेव की पूंछ-परख बढ़ गई है। महादेव के पास जाकर लोग अब मिन्नतें कर रहे हैं कि अगले जनम मुझे एएसआई ही बनाना प्रभू।
रणविजय सिंह जूदेव ने रायपुर पश्चिम से की दावेदरी
राज्यसभा सांसद रहे राजा रणविजय सिंह जूदेव ने रायपुर पश्चिम सीट से दावेदारी पेश की है। वैसे तो एक समय जूदेव परिवार की धमक पूरे प्रदेश में थी। इस क्षेत्र में चर्चित राजकुमार कालेज भी है और राजा रणविजय सिंह जूदेव का निवास स्थल (जशपुर निवास) रायपुरा में है। 2013 के विधानसभा चुनाव में रणविजय सिंह जूदेव ने बड़ी भूमिका निभाई थी। जिसके चलते भाजपा ने उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया था। जूदेव परिवार का सम्मान सिर्फ जशपुर तक सीमित नहीं है, वह समूचे छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय हैं। हांलाकि रायपुर पश्चिम से मंत्री रहे राजेश मूणत इस सीट के पहले दावेदार माने जा रहे हैं। लेकिन भाजपा ने जिस तरह सुपर 21 की पहली सूची जारी की है। उससे बड़े-बड़े नेताओं के तोते उड़ रहे हैं। कहीं रणविजय सिंह जूदेव की दावेदारी एक नए राजनीतिक समीकरण की ओर इशारा तो नहीं कर रही ?
एक और आईएएस बन गए नेता
आईएएस नीलकंठ टेकाम आखिरकार नेता बन ही गए। यह बात अलग है कि राज्य में उनका मसला फंसा हुआ था। कहते हैं कि टेकाम का इस्तीफा स्वीकृत कराने माथुर को एड़ी -चोटी लगानी पड़ी। माथुर ने यह बात स्वयं कही कि टेकाम का इस्तीफा प्रधानमंत्री जी से बात करने उन्होंने दो दिनों में स्वीकृत कराया। खैर अब भाजपा प्रवेश के बाद टेकाम का चुनाव लडऩा भी लगभग तय माना जा रहा है। नीलकंठ टेकाम और संतराम नेताम के बीच चुनावी मुकाबला बेहद करीबी होने के आसार है।
माथुर की दो टूक
छत्तीसगढ़ की एक सबसे ताकतवर भाजपा नेत्री ने अपने निवास में राज्य के बाहर से आए चार विधायकों को भोज में बुलाया था। कहते हैं कि जब नेत्री ने माथुर से दुर्ग जिले की एक विधानसभा सीट का नाम लेते हुए कहा कि इस सीट से मैं भी चुनाव लडऩा चाहती हूं। जिस पर माथुर ने दो टूक कह दिया कि आप राष्ट्रीय स्तर की पदाधिकारी हैं। आपका चुनाव लडऩा पार्टी हितों के अनुरुप नहीं हैं। इसलिए राज्य को छोड़कर आप अपने दायित्वों को निभायें इसी में सबकी भलाई है।
बीरनपुर के बाद साजा साहूओं के हवाले
कांग्रेस के दिग्गज नेता रविन्द्र चौबे के सामने इस बार भाजपा लाभचंद बाफना को नहीं बल्कि साहू समाज से किसी प्रत्यासी का नाम आगे कर दिया है। हालांकि भाजपा का पूरे 90 सीटों के लिए मंथन हो चुका है। साजा में लाभचंद और चौबे की जुगलबंदी की रिपोर्ट पार्टी तक पहुंच चुकी है। वैसे भी भाजपा ने बीरनपुर मामले को बड़ा मुद्दा बनाया था, यदि इसके बाद साहू समाज के नेता को टिकट नहीं दी गई तो सवाल खड़े होंगे। इसलिए सम्भव है कि इस बार साजा में महाराज के सामने भाजपा साहू समाज से किसी प्रत्यासी को मैदान में उतार सकती है।
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