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बिना काम के अफसरों की तैनाती
सुशासन वाली विष्णु सरकार को राज्य में शासन करते हुए तकरीबन २० माह बीत चुके हैं। मंत्रिमंडल का विस्तार भी हो चुका है। कुछ आयोगों को छोड़ दें तो ज्यादातर आयोगों, निगम मंडलों में नियुक्तियां भी हो चुकी हैं। पहले की अपेक्षा सरकारी कामों में हो रहे सुधार को भी जनता अब महशूस करने लगी है। लेकिन अफसरशाही में अभी और सुधार की गुंजाइश दिख रही है, जिससे सरकारी काम-काज में और गति आ सकती है। दरअसल कई विभागों में अफसरों को बिना काम के तैनाती की गई है। कई तो ऐसे विभाग हैं जहां एक ही काम के लिए दो-दो आईएएस अफसरों की पदस्थापना की गई है। एक उदाहरण वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग में देखने को मिला, इस विभाग में मंत्रालय स्तर पर तीन आईएएस अफसरों और दो आईएफएस अफसरों की तैनाती की गई है। दरअसल एसीएस ऋचा शर्मा के पास वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जिम्मेदारी है। ऋचा के साथ-साथ आईएएस जनक पाठक और जयश्री जैन को भी इसी विभाग में तैनात किया गया है। आश्चर्य की बात यह है कि जनक और जयश्री दोनों ही स्थापना देखते हैं। कुल मिलाकर यह दोनों अफसर क्या काम करते होंगे इसकी कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं। इतना ही नहीं दो आईएफएस अफसर अमरनाथ और प्रणय मिश्रा की भी तैनाती इसी विभाग में की गई है। कहने का आशय यह है कि इन अफसरों से और बेहतर काम लिया जा सकता है। ऐसे अनेकों विभाग है जो प्रभार पर चल रहे है, कई अफसरों के पास विभागों की अधिकता है। इसमें बेहतर संतुलन की जरुरत है जिससे प्रशासनिक कार्यों में और गति देखने को मिल सकती है।
कुर्सी की दौड़ फिर शुरु
वर्तमान सीएस अमिताभ जैन अपनी निर्धारित सेवा अवधि पूरा करके तीन माह के एक्सटेशन को भी पूरा करने की ओर आगे बढ़ चुके हैं। 30 सितम्बर को उनके एक्सटेशन की समयावधि भी पूरी हो जाएगी। इसके चलते अब एक बार फिर कुर्सी की दौड़ शुरु हो गई है। पिछली बार सीएस की कुर्सी के नजदीक पहुंचकर एसीएस मनोज पिंगुआ को वापस आना पड़ा। अब क्या होने जा रहा है? इसको लेकर चर्चाओं का दौर शुरु हो गया है। कहते हैं कि उस दरम्यान आईएएस मनोज पिंगुआ को संकेत मिल चुके थे, लेकिन एक घंटी ने पूरा खेल बदल दिया। अब क्या होने जा रहा है? क्या मनोज पिंगुआ अभी भी रेस में अपना स्थान बनाए हुए हैं या फिर सुब्रत साहू अपने मकसद में कामयाब होने जा रहे हैं? फिलहाल इस पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरुर कहा जा सकता है कि सुब्रत साहू के नाम पर राज्य के एक बड़े नेता बिलकुल सहमत नहीं हैं। सभवत: यदि दिल्ली और उड़ीसा का हस्तक्षेप न रहा तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय भी शायद ही सुब्रत के नाम पर सहमत होंगे। ऐसे में एक बार फिर मनोज पिंगुआ के सीएस बनने के आसार दिख रहे हैं। हालांकि कुछ लोगों का तर्क यह भी है कि इस मसले को अभी और आगे के लिए टाला जा सकता है यानि कि अमिताभ जैन को फिर सेवा विस्तार का तोहफा दिया जा सकता है।
दौर बदला, चमचे नहीं
आज से दो साल पहले जब चार राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे थे तब राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी। मध्यप्रदेश में भी शुरुआती मेें कांग्रेस की सरकार रही, बाद में कांग्रेस ने वहां सत्ता गवां दी। विधानसभा चुनाव के दौरान इन तीनों राज्यों में से छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार वापसी की प्रबल संभवना थी। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा आश्वस्थ छत्तीसगढ़ के लिए थे। कांग्रेस यह मानकर चल रही थी कि छत्तीसगढ़ में वह फिर सत्ता हासिल करने जा रही है। लेकिन जब परिणाम सामने आया तो कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व हैरान रह गया। दरअसल इसके पीछे अघोषित रुप से यह तथ्य सामने आया कि 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सामुहिक नेतृत्व के बदौलत छत्तीसगढ़ में सत्ता हासिल की, लेकिन 2023 में सत्ता गंवाने का आरोप अकेले भूपेश बघेल पर लगे। संभवत: इसीलिए केन्द्रीय नेतृत्व के द्वारा भूपेश को राज्य की राजनीति से दूर रखने का निर्णय लिया गया। अन्यथा भूपेश को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती थी, वह फिर प्रदेश अध्यक्ष बनाए जा सकते थे, पर ऐसा नहीं हुआ। खैर यह कांग्रेस का अंदरुनी मामला है, लेकिन अभी भी कांग्रेस के सीनियर नेता रविन्द्र चौबे को भूपेश के नेतृत्व की आस है, वह खुले मंच से भूपेश के नेतृत्व की मांग कर अपनी फजीहत करा बैठे, जबकि राजनीतिक निर्णय की बरीकी को समझेंगे तो कांग्रेस के आलाकमान ने 2023 में सत्ता गंवाते ही भूपेश के नेतृत्व को खारिज कर दिया था और प्रदेश की कमान दीपक बैज और डॉ. चरणदास महंत को सौंप दी। बहरहाल नेतृत्व मामले में रविन्द्र चौबे ने अपनी फजीहत करा ली, इस बीच नेता प्रतिपक्ष डॉ. महंत ने बड़े नेताओं से अपील की है कि वह अपने चमचों को सम्भालकर रखें। अब रविन्द्र चौबे किस श्रेणी में आते हैं, यह तो महंत ही बता सकते हैं। कुल मिलाकर दौर बदला लेकिन चमचे नहीं।
पुडिय़ा, नव्या और विधायक का बेटा
राजधानी रायपुर जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से अपराधिक गतिविधियां भी यहां बढ़ रही हंै। वीआईपी रोड़ में संचालित कई क्लब देर रात तक पार्टी के लिए बदनाम है। अब इस शहर और इस रोड़ का नाता ड्रग से भी जुड़ गया है। यहां पुडिय़ा का चलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। पुलिस ड्रग्स मामले की पड़ताल कर रही है, इसके तह तक जाने से कई बड़े चेहरे बेनकाम होंगे इसलिए खुलासे की संभावना कम है। दरअसल ड्रग मामले की जांच शुरु ही हुई थी कि एक विधायक के बेटे का नाम सामने आ गया। कहा जा रहा है कि नव्या के एकाउंट की जांच करने पर पता चला कि विधायक के बेटे के खाते से तकरीबन 18 लाख रुपये का ट्राजेक्शन किया गया है। अब विधायक के बेटे ने नव्या के खाते में इतनी भारी रकम क्यों ट्रांसफर की है, इसका जवाब तो वहीं दे सकते हैं। लेकिन ड्रग्स मामले में कई हाईप्रोफाइल लोगों के संलिप्त होने की आशंका जताई जा रही है।
अरुण पांडे का कद बढ़ा
1994 बैच के आईएफएस अफसर अरुण कुमार पांडे को पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ की कमान सौंपी गई है। पांडे वर्तमान में विकास-योजना की जिम्मेदारी सम्भाल रहे थे। दरअसल पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ सुधीर कुमार अग्रवाल पिछले माह रिटायर हो गए हैं। जिसके बाद से यह पद रिक्त था जिस पर अरुण कुमार पांडे की तैनाती की गई है। अरुण कुमार पांडे सत्ता-संगठन दोनों की पसंद माने जाते हैं, जिसके कारण उनको यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई है। अरुण कुमार पांडे डॉ. रमन सिंह की सरकार के दौरान रायपुर और बिलासपुर के सीसीएफ भी रह चुके हैं। हालांकि पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ के लिए आईएफएस अफसर प्रेम कुमार का नाम भी सामने आया था, बाद में अरुण कुमार पांडे पर मुहर लगा दी गई। आम तौर पर अब तक वाइल्ड लाइफ की कमान किसी एक स्वतंत्र अफसर को दी जाती रही है। लेकिन इस बार अरुण कुमार पांडे वर्तमान दायित्वों के साथ-साथ अन्य का भी निवर्हन करते रहेंगे। कुल मिलाकर सरकार ने अरुण पांडे का कद बढ़ाया है।
कैसे पूरा होगा विजन
भविष्य के लिए अच्छे विजन के साथ योजना तैयार करना निश्चित ही एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन क्या भविष्य के लिए वर्तमान से आंखे चुराना उचित है? इस पर मंथन और चिंतन की जरुरत है। हम एनसीआर की तरह एटीआर की बात करते हैं, हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं हैं। लेकिन वर्तमान व्यवस्था के क्या हाल हैं, इससे नजरें चुराना कितना वाजिब है? छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े नगर निगम रायपुर के हालात इन दिनों यह है कि उनके पास सड़क और नाली मरम्मत करने के लिए रुपये नहीं हैं। यह हम नहीं कह रहे राजधानी के पूरे समाचार पत्र इन खबरों से रंगे पड़े हुए हैं। नगर निगम के जिम्मेदार अफसरों और जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक बयान भी समाचार पत्रों में प्रकाशित किए गए हैं। आखिर इतने बड़े निगम की हालात इतनी बत्तर क्यों हैं? बरसात के महीनों में नाली की मरम्मत नहीं होगी तो कब की जाएगी? निगम क्षेत्र की सड़कों के मरम्मत के लिए रुपये नहीं हैं, तो जनता से टैक्स वसूलने का क्या मतलब है? आखिर निगम की व्यवस्था चरमराई क्यों है? इसका जिम्मेदार कौन है? हालातों को देखकर यह कहने में संकोच नहीं कि सिर्फ विजन से काम नहीं चलेगा योजनाओं को धरातल पर उतारने की जरुरत है। अगर राजधानी की जनता मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं तो अन्य शहरों की कल्पना आप खुद कीजिए। दरअसल रायपुर नगर निगम में फंड का संकट एक दिन में नहीं खड़ा हुआ है, यहां राजस्व वसूली के समुचित प्रयास में कमी खुले तौर पर दिख रही है। रायपुर में हजारों की संख्या में विशालकाय होर्डिग्स खड़ी हैं, लेकिन निगम के पास इनकी कोई जानकारी मौजूद नहीं है, इन होर्डिग एजेंसियों की कितनी देनदारियां हैं, अफसरों के पास इसके कोई आकड़े नहीं हैं। अगर जांच की जांए तो सिर्फ होर्डिग्स एजेन्सीज के मालिक ही निगम के अफसरों से सांठ-गांठ कर करोड़ों रुपये के राजस्व का चूना लगा रहे हैं। ऐसे में राजस्व का संकट खड़ा होना स्वाभाविक है।
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