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छत्तीसगढ़ को अब तक का सबसे बड़ा उपहार
छत्तीसगढ़ को कभी देश में नक्सलवाद के लिए जाना जाता था। बस्तर जैसे सूदूर अंचल में नक्सलवाद का आतंक और खौफ हम सभी ने अपनी आंखों से देखा है। नक्सलवाद ने यहां अनेकों घर उजाड़ दिए। अनेक राजनेताओं, जवानों और स्थानीयों की हत्या कर दी गई। बस्तर में नक्सलवाद किसी काली रात से कम नहीं था, जो अत्यंत डरावना और खतरनाक था। लेकिन कहते हैं कि रात के बाद फिर सूरज निकलता है। अब बस्तर में नक्सलवाद की काली रात बीत चुकी है, यहां विकास और सुशासन का नया सूरज उदय होते दिख रहा है। केन्द्र और राज्य सरकार की इच्छाशक्ति के बदौलत नक्सलवाद यहां समाप्त हो गया है। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह की प्लानिंग और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के सरल नेतृत्व तथा जवानों के हौसलों के आगे नक्सलवाद को आखिरकर ढेर होना पड़ा। तय समय सीमा 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद का सफाया कर दिया गया है। निश्चित ही यह छत्तीसगढ़ की जनता के लिए अब तक का सबसे बड़ा उपहार है।
बैचमेट अफसरों का दर्द
भाजपा के एक नेता ने बीते विधानसभा चुनाव के दौरान अपने बैचमेट अफसरों से मदद मांगी। कुछ बैचमेट अफसरों ने भी नेताजी के उज्जवल भविष्य को देखते हुए अपनी हैसियत अनुरुप चुनाव में सामाजिक और आर्थिक मदद की। नेताजी जी को विधानसभा चुनाव में बहुमत मिला, वह अफसर से नेता बन गए। निश्चित तौर पर बैचमेट अफसरों ने यह सोचकर मदद की होगी कि जरुरत पडऩे पर उन्हें थोड़ा बहुत राजनीतिक मद्द मिल जाएगी। पर कहते हैं कि राजनीति करने वाले किसी के नहीं होते, यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ। नेता जी ने मदद करना तो दूर अपने बैचमेट अफसरों का फोन उठाना ही बंद कर दिया। आखिरकर आधा से अधिक कार्यकाल बीतने के बाद अब बैचमेट अफसरों को समझ आया कि राजनीति में कोई अपना-पराया नहीं होता, सब अवसर के साथी होते हैं। फिलहाल अभी तक नेताजी ने अपने बैचमेट अफसरों के मैसेंजर और वाट्सअप ब्लाक नहीं किया है, इसलिए फोन कॉल न सही, मैसेज में ही अपनी बात रखने की कोशिश जारी है।
दर्द से कराह रहे कार्यकर्ता
आम तौर पर किसी दल के कार्यकर्ताओं की भूमिका चुनाव के समय काफी महत्वपूर्ण होती है। असम, बंगाल जैसे राज्यों में इस समय कार्यकर्ताओं की असल भूमिका खुली आंखों से देखी जा सकती है। यही कार्यकर्ता हैं जो पार्टी का झंडा बुलंद करने का काम करते हैं। विपक्ष में रहते हुए इन्हीं कार्यकर्ताओं को डंडा भी खाना पड़ता है। लेकिन जब इन कार्यकर्ताओं के दल की सरकार होती है तो बहुत से कार्यकर्ताओं की सुध लेने वाला कोई नहीं होता। दर्द से कराह रहे इन कार्यकर्ताओं को मलहम लगाने वाला कोई नहीं होता, दरअसल सत्ता का चरित्र ही कुछ ऐसा होता है। नतीजन कुर्सी में विराजमान कुछ सरकारी मुलाजिम इन्हें रौंदने का काम करने लगते हैं। सरकारी मुलाजिम भ्रष्टाचार के दम पर यंत्री से लेकर संत्री तक अपनी वकत बना लेते हैं और इन्हें पल-पल बेइज्जत करना शुरु कर दिया जाता है। खैर ताजा मामला सरगुजा संभाग के एक सीएमओ के ऑडियो से जुड़ा हुआ है, जो ऑडियो में कार्यकर्ताओं को लेकर अशोभनीय और भद्दी बातें करते सुनाई दे रहे हैं। उनकी हिम्मत की दात देनी पड़ेगी, वह अशोभनीय बातों को रिकार्ड कर सुना देने की भी बात कह रहे हैं। निश्चित तौर पर उन्हें किसी राजनेता का संरक्षण होगा, वरना कोई भी प्रशासनिक अफसर ऐसे आचरण से परहेज करता है। फिलहाल ऑडियो की सत्यता जांच का विषय है। लेकिन वास्तव में अगर यह ऑडियो सत्य है, तो यहां अफसरों की अराजकता और निरंकुशता को लेकर डॉ. रमन सिंह के आखिरी कार्यकाल और भूपेश बघेल के बीते कार्यकाल को स्मरण कर लेना चाहिए।
वन नहीं तो पर्यावरण ही सही
वर्तमान वनबल प्रमुख आईएफएस व्ही. श्रीनिवास राव पूरे प्रदेश में अपने प्रबंधन के नाम से जाने जाते हैं। छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक, सत्ता से लेकर संगठन तक उनके प्रबंधन के किस्से अक्सर सुनने को मिलते रहे हैं। कहते हैं कि उनके इस विशेष गुण के कारण ही भाजपा सरकार को भी उन्हें कन्टीन्यू करना पड़ा। दरअसल राज्य में कांग्रेस की सरकार रहते हुए यहां के तमाम भाजपा नेताओं ने श्रीनिवास राव को निशाने पर लिया था। उन दिनों लोकसभा और विधानसभा में भी राव से जुड़े मुद्दे गूंजते रहते थे। लेकिन 2023 में भाजपा की सरकार बनने के बाद से भाजपा के वह तमाम नेता खामोश हैं? यहां सत्ता बदली लेकिन राव नहीं बदले? दरअसल इसके पीछे भी उनके प्रबंधन के किस्से ही बताये जाते हैं। अब अगले महीने श्रीनिवास राव रिटायर होने जा रहे हैं। हालांकि उन्होंने 6 माह के एक्सटेंशन पर भी जोर दिया था, लेकिन वह मामला बनते नहीं दिख रहा है। जिसकी वजह से राव के तार वन से पर्यावरण की ओर जुड़ते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि आईएफएस श्रीनिवास राव छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के चेयरमेन बनने की जुगत में हैं।
बजट राशि और विकास
छत्तीसगढ़ सरकार लगातार विकास पर जोर दे रही है। लेकिन बीते वित्तीय वर्ष में कई विभाग बजट राशि खर्च करने में फिसड्डी साबित हुए। जिसमें पीडब्ल्यूडी विभाग का नाम सबसे उपर है। खैर इस विभाग में राशि क्यों खर्च नहीं हो पाई यह चिंतन का विषय है। जिन विभागों में समुचित बजट राशि खर्च नहीं हो पाई वहां धरातल पर किस प्रकार का और कितना विकास हुआ इसकी समीक्षा भी आवश्यक है। खैर अब नया बही खाता शुरु हो चुका है, पुराने खर्च प्रवृत्ति से सीख लेने की अत्यंत जरुरत है। राज्यपाल ने विधानसभा में पारित नए बजट को खर्च करने की अनुमति दे दी है। वित्त विभाग ने भी सभी विभागों को बजट जारी कर दिया है। पहली तिमाही में 25 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 15 प्रतिशत बजट खर्च करने को कहा गया है। वहीं तृृतीय और चतुर्थ में 60 प्रतिशत राशि खर्च होगी। कुल मिलाकर विकास की रुपरेखा और खर्च के अनुपात में विभागों को इस साल बेहतर तालमेल बनाने की जरुरत है। वरना बीते साल में पीडब्ल्यूडी विभाग की तरह 9500 करोड़ रुपये की बजट राशि में एक तिहाई खर्च कर विकास के कोरे दावे फिर किये जाएंगे।
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