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छत्तीसगढ़ में भी हैं सुब्बारेड्डी?
छत्तीगसढ़ के कई ऐसे विधायक हैं जिनकी अकूत संपत्तियों की बातें जनमानस के बीच चर्चा का केन्द्र बनी रहती हैं। लेकिन यह बातें यहां सिर्फ चर्चा तक ही सीमित हैं, इसके इतर कर्नाटक के बागेपल्ली सीट से निर्वाचित कांग्रेस विधायक एसएन सुब्बारड्डी का चुनाव संपत्ती और कारोबार के चलते रद्द कर दिया गया है। नामाकंन के दौरान सुब्बारेड्डी ने फार्म-26 शपथ पत्र में अपने और अपनी पत्नी से जुड़े व्यवसायिक संस्थानों की जानकारी नहीं दी थी। जिसके चलते कर्नाटक हाईकोर्ट ने उनके चुनाव को रद्द कर दिया है। दरअसल प्रत्याशी के लिए संपत्ति देनदारी और कारोबारी हितों का पूरा खुलासा अनिवार्य होता है। लेकिन सुब्बारेड्डी के कई व्यवसायों की जानकारी का विवरण शपथ पत्र में नहीं था, इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 के तहत चूक माना जाता है। जिसके चलते उनके चुनाव को रद्द कर दिया गया है। हालांकि सुब्बारेड्डी की भांति छत्तीसगढ़़ राज्य में कितने नेताओं और विधायकों ने सही जानकारी फार्म 26 में दी है, इसका खुलासा कभी नहीं हो पाया, और न ही अभी तक किसी ने इसके तह तक जाकर पड़ताल की है। वास्तव में अगर ऐसे प्रकरणों की गंभीरता और निष्पक्षता से जांच हो तो छत्तीसगढ़ में भी कई सुब्बारेड्डी सामने आ सकते हैं।
खर्च करने में कई विभाग फिसड्डी साबित
राज्य के विकास और योजनाओं के आधार पर प्रत्येक वर्ष हर एक विभाग का वार्षिक बजट निर्धारित किया जाता है। लेकिन आकड़ों की माने तो छत्तीसगढ़ के ज्यादातर विभाग बजट राशि खर्च करने में फिसड्डी साबित हो चुके हैं। जहां एक ओर मुख्य सचिव विकासशील सुबह 10 बजे से लगातार योजनाओं की मानिटरिंग कर रहे हैं। प्रशासन के हर दायित्व को सुनिश्चित करने अथक मेहनत कर रहे, वहीं दूसरी ओर कई विभाग बजट राशि तक नहीं खर्च कर पा रहे हैं। नतीजन करोड़ों रुपये सरेंडर करने की नौबत आ गई है। यह नौबत क्यों आई? इसके पीछे कारण क्या है? फिलहाल यह तो जांच का विषय है। लेकिन एक बात तय है कि जिस तरह से बजट राशि खर्च नहीं हो पाई है, उससे कई निर्माण अधूरे पड़े हैं, तो कईयों के काम तक शुरु नहीं हो पाये हैं। कुल मिलाकर बजट राशि खर्च न हो पाना इस ओर इशारा कर रहा है कि कहीं न कहीं विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ते दिखाई दे रही है। 24 फरवरी 2026 को विष्णु सरकार अपने कार्यकाल का तीसरा बजट विधानसभा में पेश करने जा रही है। इसके बाद कार्यकाल के दो बजट और शेष हैं, जिसमें आखिरी साल चुनावी बजट माना जाता है। ऐसे में बजट राशि खर्च करने के प्रति उदारता नहीं दिख रही। आकड़ों को देखते हुए बजट राशि खर्च पर सतत निगरानी की जरुरत है, उदारता की आवश्यकता है। ई-आफिस और डिजिटल कार्यप्रणाली के बाद भी इसकी गति धीमी क्यों है? इसको लेकर जवाबदेही तय करने की जरुरत है। क्या बजट राशि खर्च न होने की वजह राजनीतिक हित है? या फिर प्रशासनिक लापरवाही? इस पर भी मंथन और चिंतन की जरुरत है।
तबाह होता युवाओं का भविष्य
हमारे सिस्टम में भ्रष्टाचार दीमक की तरह प्रवेश कर चुका है, जो धीरे-धीरे युवाओं के भविष्य को छलनी करते दिख रहा है। दरअसल हम बात कर रहे हैं सरकारी नौकरियों की। यहां राज्य सरकार ने युवाओं को सरकारी नौकरी देने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन सरकारी सिस्टम के नश-नश में घुस चुके भ्रष्टाचार ने युवाओं को नौकरी से वंचित कर दिया। आरआई परीक्षा की धांधली जनता के सामने है, पुलिस परीक्षा पहले से ही उलझ चुकी है। वन विभाग में वनरक्षकों की भर्ती भी दम तोड़ते दिख रही है। ऐसी अनेकों भर्तियां मुकाम तक नहीं पहुंच पायीं, जिसके चलते राज्य के युवा अपने भविष्य को लेकर आशंकित है, चिंतित हैं। ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार ने युवाओं के लिए प्रयास नहीं किया। दरअसल इन तमाम पदों की स्वीकृति मिल चुकी है, भर्ती प्रक्रिया भी हो चुकी है, लेकिन चंद भ्रष्ट अफसरों के कुठाराघात के कारण युवाओं का भविष्य ताबाह होते दिख रहा है। आरआई परीक्षा के आरोप पत्र जनता के सामने हैं, वनरक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में प्रथम दृष्टया विभाग के अफसरों को जिम्मेदार ठहराया गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इन तमाम अफसरों को संरक्षण क्यों ? युवाओं के भविष्य को तबाह करने वालों को पनाह देने की वजह क्या है? खैर कारण जो भी हो लेकिन सरकारी भर्तियों को लेकर सरकार की छवि युवाओं के बीच नकारात्मक बनते जा रही है।
कैसे होगा नया रायपुर गुलजार?
नया रायपुर में इन दिनों जमीनों की अफरा-तफरी मची हुई है। एक ओर जहां नवा रायपुर डवलपमेंट अथॉरिटी ओपन टेंडर में न्यूनतम दर पर जमीनों की बिक्री को लेकर विवादों में हैं, तो वहीं दूसरी ओर प्राइवेट बिल्डरों द्वारा निर्मित सोसाटियों और कालोनियों की कीमत आम जनता के बजट से कोसों दूर हैं। वर्तमान दृष्टिकोण को देखते हुए यह कहने में संकोच नहीं कि नवा रायपुर एक खास वर्ग का रहवास बनकर सीमित रह गया है। यह आम जनता की पहुुंच से दूर होते जा रहा है। 5000 रुपये प्रति वर्गफिट की दर के रेसीडेंसियल प्लाट और तकरीबन 5 करोड़ रुपये की राशि के बंगले नवा रायपुर को सुशोभित करते नजर आ रहे हैं। यहां आम जनता की वास्तविक पेयिंग कैपीसिटी क्या है? यह किसी से छिपी नहीं है। उसके बावजूद इतनी भारी-भरकम दरों में नियंत्रण के प्रयास शून्य हैं? यह बात अलग है कि एक वर्ग विशेष ही इन दिनों नवा रायपुर में भारी भरकम दर में इन्वेस्ट करते नजर आ रहा है। खैर जमीनों की अफरा-तफरी देखकर वह वक्त भी याद आता है जब हाउसिंग बोर्ड ने नवा रायपुर में करोड़ों की दर से बंगले बनाये जो आज भी उसी कीमत के इर्द-गिर्द बिकते नजर आते हैं। कईयों के बंगले खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। हालांकि कुछ विशेष लोगों ने अपनी पहुंच का इस्तमाल करके बंगलों को कार्पोरेट कंपनियों को गेस्ट रुम आदि के लिए किराया से दे दिया है। लेकिन सवाल आज भी खड़ा है कि जब तक आम जनता के अप्रौच से दरें बाहर रहेंगी तो यह शहर कैसे गुलजार होगा? आलम यह है कि आज भी राज्य सरकार के कई मंत्री जनता से दूर नहीं जाना चाहते, वह रायपुर के सरकारी आवास का उपयोग करते नजर आ रहे हैं।
दम तोड़ती सांसें, मुंह चिढ़ाता सिस्टम
सुपेबेड़ा का बेड़ा आखिर कब पार लगेगा। यहां मौत के बीच जिदंगी जी रहे लोगों की चीख-पुकार आखिर सत्ता में बैठे लोगों तक क्यों नहीं पहुंच पाती? आखिर इनका कसूर क्या है? यहां सरकारें बड़े-बड़े वादे करके भी कुछ कर नहीं पाती, इसकी वजह क्या है? आलम यह है कि सुपेबेड़ा में किडनी की बीमारी से अब तक 133 लोग जान गवां चुके हैं। लेकिन इनकी कराह अभी तक कोई नहीं सुन पा रहा। पूर्व उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री रहे टीएस सिंहदेव ने सुपेबेड़ा के लिए बहुत संवदेना दिखाया, लेकिन परिणाम जस के तस हैं। तात्कालीन राज्यपाल अनुसुइया उइके से भी यहां की जनता की पीड़ा देखी नहीं गई, वह स्वयं सुपेबेड़ा पहुंंची। लेकिन अफसोस आज भी मौत का सिलसिला जारी है। हाल ही में एम्स में इलाज के दौरान एक और व्यक्ति की मौत हो गई। लेकिन सिस्टम जस के तस दिखा। अब सरकार बदल चुकी है, लेकिन व्यवस्था आज भी कुछ पहले जैसी ही है। यहां सुविधा आज भी आधी-अधूरी है। इस गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र मंजूर तो है, लेकिन आज तक भवन नहीं बन पाया। डायलिसिस मशीन का संचालन नहीं शुरु किया गया। डाक्टरों की भी समुचित व्यवस्था नहीं हो पाई? पूरे देश में स्वच्छ जल पहुंच रहा है, लेकिन यहां के ग्रामीण आज भी वही पानी पीने को मजबूर हैं? आखिर इसका दोषी कौन है? गांव में अभी भी 3 दर्जन से ज्यादा मरीज हैं, लेकिन व्यवस्था जस के तस है ? यहां दम तोड़ती सांसों के बीच सरकारी सिस्टम मुंह चिढ़ाते नजर आ रहा है।
हवा-हवाई वादे
राज्य के एक जबावदार नेता ने शहरी सरकार बनने के बाद राजधानी के सभी वार्डों को 50-50 लाख रुपये के विकास कार्यों का वादा किया था। लेकिन वादे हवा-हवाई निकले, जिसको लेकर इन दिनों नगर की सरकार में जनप्रतिनिधि काफी खफा नजर आ रहे हैं। विपक्ष तो दूर सत्ता पक्ष के नेता भी दबे स्वर में हवा-हवाई वादे को लेकर नाराजगी जताते दिख रहे हैं। कहा जा रहा है कि राशि में कटौती करके 18 से 35 लाख कर दिया गया है। जिसकी वजह से पूरा हिसाब ही गड़बड़ा गया है।
राम आयेंगे
चंद्रखुरी में स्थापित भगवान श्री राम की प्रतिमा को अब सरकार बदलने जा रही है। दरअसल इसके पूर्व कांग्रेस सरकार के दौरान चंद्रखुरी में भगवान राम की प्रतिमा को स्थापित किया गया था। लेकिन प्रतिमा की बनावट और स्वरुप को लेकर लगातार सवाल उठाये जा रहे थे। हालांकि उस दौरान भगवान राम की प्रतिमा पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। लेकिन अब इसे बदला जा रहा है। इतनी ही बड़ी प्रतिमा अब भाजपा सरकार चंद्रखुरी में स्थापित करने जा रही है। कहा जा रहा है कि प्रतिमा तैयार होकर रायपुर के लिए निकल भी चुकी है। इसे पुरानी प्रतिमा से ज्यादा सुंदर और आकार्षक बनाया गया है। वहीं कांग्रेस सरकार के दौरान बनाई गई प्रतिमा को मुक्तांगन में लगाया जा सकता है। कुल मिलाकर अब चंद्रखुरी में प्रभू श्री राम की नई प्रतिमा दिखाई देगी।
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