हलचल … तो क्या छह माह बाद राज्य से नक्सलवाद का सफाया?

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एकला चलो रे

उपमुख्यमंत्री अरुण साव के बारे में कहा जा रहा है कि वह ‘एकला चलो रे’ के सिद्धान्त पर काम करना शुरु कर दिए हैं। सीएम विष्णुदेव साय की तरह ही अरुण साव के सरकारी बंगले में भी हरेली त्योहार की जमकर धूम दिखी, जहां काफी संख्या में लोग जुटे हुए थे। दरअसल में अरुण साव को पीएम मोदी का करीबी कहा जाता है, मोदी ने पहले उन्हें प्रदेश अध्यक्ष और बाद में उपमुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते राज्य में भाजपा की सरकार लाने में अरुण साव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन साव के बारे में कहा जाता है कि वह मनचाहा काम नहीं कर पा रहे, इसलिए वह ‘एकला चलो रे’ के सिद्धान्त पर काम करना शुरु कर दिए हैं।

अफसरशाही में तो जुगाड ही चलता है, पांडे का क्यों नहीं चला?

किश्मत तो सिर्फ राजनीति में चलती है, अफसरशाही में तो जुगाड ही चलता है। सरकार किसी भी दल की हो जुगाड ठीक-ठाक है तो सब चलता है। लेकिन इसी महीने रिटायर होने वाले आईएएस अनुराग पांडे का जुगाड क्यों नहीं चला यह समझ से परे है। रिटायरमेन्ट का दिन नजदीक होने के बावजूद भी अनुराग पांडे को बीजापुर के कलेक्टर पद से हटाकर मंत्रालय अटैच कर दिया गया है। कहते हैं कि अनुराग पांडे का एक भाजपा नेता से विवाद हुआ जिसका ऑडियो भी सोसल मीडिया में वायरल हो रहा है। पर वास्तव में क्या यही सच है? शायद नहीें। सच क्या है यह तो सुशासन वाली विष्णु सरकार ही जानेगी। लेकिन कहा यह जा रहा है कि अनुराग पांडे को बीजापुर से रवाना कराने के पीछे जगदलपुर के एक व्यापारी की अहम भूमिका है। दरअसल में इस व्यापारी का बीजापुर में अच्छा खासा कारोबार है। वरना राजनीतिक पकड अनुराग पांडे की भी कमजोर नहीं है। आईएएस अनुराग पांडे का नाता संघ परिवार से रहा है। एक जमाने में उनके पिता स्व. मनहरणलाल पांडे बिलासपुर के सांसद रहे, यहीं नहीं अनुराग की बहन हर्षिता पांडे भी राज्य भाजपा में राजनीतिक रुप से सक्रिय हैं। कहतें हैं कि मुख्यमंत्री साय के बस्तर प्रवास के दौरान इस व्यापारी ने उनके कान फूंक दिए। जिसके कुछ दिन बाद ही अनुराग को मंत्रालय भेज दिया गया।

छह माह बाद राज्य से नक्सलवाद का सफाया?

प्रभारी डीजीपी, डीजीपी और अब एक्सटेशन वाले डीजीपी, जी हां हम बात कर रहे हैं आईपीएस अशोक जुनेजा की। 1989 बैच के आईपीएस अशोक जुनेजा को भूपेश सरकार ने नवम्बर 2021 में राज्य का प्रभारी डीजीपी बनाया और 2022 में जुनेजा पूर्णकालिक डीजीपी बनाये गये। आमतौर पर अशोक जुनेजा का स्वभाव काफी सरल है, और उनकी पुलिसिंग को भला भाजपा से बेहतर कौन जानेगा। यह बात अलग है कि पिछले पांच साल कानून व्यवस्था को भाजपा ने सिर्फ राजनीतिक हथियार बनाया, क्योंकि भूपेश सरकार के दौरान भी जुनेजा ही राज्य के डीजीपी पद पर आसीन थे। अब सेवाअवधि पूरा होने के बाद जुनेजा को छह माह का एक्सटेशन दिया गया है, छत्तीसगढ़ के इतिहास में इस तरह का यह पहला निर्णय है। एक्सटेशन का विस्तृत अर्थ होता है समय की एक अतिरिक्त अवधि जो आपको किसी काम के लिए दी जाती है। हालातों की बात की जाए को बीते सात माह में कानून व्यवस्था में कोई खास बदलाव या सुधार नहीं दिखा। हां इस दरम्यान राज्य में नक्सलवाद को लेकर आक्रामक रणनीति जरुर अपनाई गई है। इसलिए सम्भवत: जुनेजा को इसी के चलते एक्सटेशन भी दिया गया है। कहा यह जा रहा है कि राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा और जुनेजा के विशेष प्रयासों से छह माह के भीतर छत्तीसगढ़ नक्सल मुक्त हो जाएगा।

रजत बंसल को क्यों हटाया गया?

वैसे तो रजत बंसल वित्त मंत्री ओपी चौधरी के काफी नजदीक हैं। बंसल और चौधरी की यह नजदीकी वर्षों पुरानी है। लेकिन 7 माह के भीतर रजत बंसल को जीएसटी से क्यों हटा दिया गया इसकी इन दिनों जमकर चर्चा है। दरअसल में एक दौर में ओपी चौधरी रायपुर के कलेक्टर हुआ करते थे तब बंसल रायपुर नगर निगम के कमिश्नर थे। ओपी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने विभागों में पसंदीदा अफसरों की तैनाती की है। जिसमें प्रमुख रुप से मुकेश बंसल, आर संगीता, सौरव कुमार, रजत बसंल समेत अन्य अफसरों के नाम शामिल हैं। रजत बसंल अभी तक वित्त मंत्रालय अंतर्गत वाणिज्यिक कर की जिम्मेदारी सम्भाल रहे थे, लेकिन उन्हे महज सात माह के भीतर यहां से हटा दिया गया है। जिसकी चारों ओर चर्चा हो रही है।

200 एकड वनभूमि पर कब्जा

राज्य के एक प्रभारी डीएफओ ने हाल ही में 200 एकड वनभूमि को खाली कराने का दावा किया है। प्रभारी डीएफओ ने मीडिया के सामने वकायदा इस पर खुलकर बयान भी दिया है। यह बात अलग है कि यहां के एक नेताजी के 70 एकड वनभूमि पर उनकी दृष्टि नहीं पहुंच पा रही है। खैर कहते हैं कि यह जमीन इनके पूर्व वाले डीएफओ साहब के कार्यकाल दौरान कब्जा हुई थी, जिसमें उनके मिलीभगत की सम्भावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता। जमीन तो खाली हो गई, लेकिन अब यह कहा जा रहा है कि यदि वनभूमि खाली कराने वाले प्रभारी डीएफओ का पीठ थपथपाया जाए तो, पूर्व डीएफओ के उपर जमीनों को कब्जा कराने की सह देने की कार्यवाही भी की जाए।

शमशान की जमीन का सच क्या?

कहते हैं कि नवा रायपुर में जिस जगह पर अरण्य भवन का निर्माण किया गया है, वहां के पश्चिम दिशा में पहले शमशान था। कहा तो यह भी जा रहा है कि जब निर्माण चल रहा था तो यहां जमीन के अन्दर से हड्डियां निकलती थीं, जिसको देखकर चौकीदार भाग खडे होते थे। वास्तव में सच्चाई क्या है? इसका सच क्या है? यह तो निर्माण एजेंसी ही बता सकती है। पर इसको लेकर तरह -तरह की चर्चाएं की जाती हैं। भूतल में मानिटरिंग का एक ऑफिस है, कहा यह जाता है कि जिससे नाराजगी होती है उसे यहां बैठा दिया जाता है। वहीं दूसरे माला में वाइल्ड लाइफ विंग है। तीसरी माला में इस विभाग के प्रमुख बैठते हैं। वैसे तो प्रेत-पिचास पर मैं बिलकुल विश्वास नहीं करता, पर यहां के लिए कहा जाता है कि जो अफ सर पहले वन्यजीव प्रेमियों का पक्षधर रहता है वह यहां बैठते ही, उनको अपना विरोधी समझने लगता है। इसके अनुपात में उपर माला में असर कम हो जाता है। खैर इसका सच क्या है? यह तो यहां बैठने वाले अफसर, निर्माण करने वाली एजेन्सी और चर्चा करने वाले लोग ही जानेंगे।

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