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मीठे अंदाज में तीखे बोल
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत आम तौर पर सरल नेता हैं, लेकिन बजट में उन्हें जब बोलने का अवसर मिला तो उन्होंने मीठे अंदाज में वित्त मंत्री पर तीखे बोल बोलने से परहेज नहीं किया। जहां एक ओर वित्त मंत्री के हस्तलिखित बजट भाषण की चारों ओर तारीफ हो रही थी, वहीं महंत विधानसभा में वित्त मंत्री पर मीठे अंदाज में तीखे ‘बोल’ बोल रहे थे। बड़े शालीनता से ही सही लेकिन महंत यह बताने में सफल रहे कि उन्हें सब खबर है, सब पर नजर है। यहां तक की गरीबों के आवास के मामले में भी उन्होंंने अपने ही दल के विधायक पूर्व सीएम भूपेश बघेल को अपने आकड़े दुरुस्त करने का इशारा किया। वित्त मंत्री ओपी चौधरी के हाथ से लिखे बजट पर भी उन्होंने तीर छोड़े, महंत ने कहा कि वर्ष 2019 में केन्दीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने भी हाथ से लिखा बजट भाषण दिया था, जरा दिखवा लेंगे। यहीं नहीं डॉ. महंत ने एक एनजीओ पर भी निशाना साधा और कहा कि अब राज्य की यह स्थिति है कि एक एनजीओ यहां आकर सिस्टम चलाएगी। महंत ने कहा कि हमारे यहां 16 से अधिक ऐसे अफसर है जिन्होंने बड़े-बड़े सस्थानों यहां तक कि लंदन में भी अध्ययन किया है। तो फिर एनजीओ क्यों? कुल मिलाकार महंत के 20 से 30 मिनट कीचर्चा को सुनेंगे तो उन्होंने वित्त मंत्री को निशाने में लेते हुए यह तक कह डाला कि रायगढ़ के लोग कोरबा में आकर डीएमएफ का काम कर रहे हैं, ऐसे में डीएमएफ में पारदर्शिता कैसे आयेगी? जरा दिखवा लेंगे। महंत ने कुंभ स्नान पर भी टिप्पणी की उन्होंने कहा कि कुंभ जैसे पवित्र महापर्व को राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, यह गलत है। उन्होंने कहा कि जरा दिखवा लेगें कि डॉ. मोहन भागवत कुंभ स्नान करने गए थे कि नहीं? खैर मीठे अंदाज में ही सही लेकिन महंत ने यह एहसास दिलाने की कोशिश की उनके आंख-कान खुले हुए हैं, और जब जैसी जरुरत होगी माकौल जवाब दिया जाएगा।
आरोपों से घिरे नेताम
आम तौर पर भाजपा एक अनुशासित पार्टी है। भाजपा के कार्यकर्ता भी बहुत ही अनुशासित होते हैं। लेकिन जब अपनों पर ही प्रताड़ना और षड्यंत्र के आरोप लगने लगे, तब यह समझना आवश्यक है कि अन्दरखाने में सब ठीक नहीं चल रहा। दरअसल केबिनेट मंत्री रामविचार नेताम पर उनके ही पार्टी के सीनियर नेता संसदीय सचिव रहे सिद्धनाथ पैकरा ने षड्यंत्र करने का अरोप लगाया है। पैकरा का दर्द मीडिया के सामने तब छलक उठा, जब उनके ही नेता रामविचार नेताम ने उन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी में बैठने में व्यवधान पैदा करते नजर आये। आरोप यह है कि सिद्धनाथ पैकरा बलरामपुर जिला पंचायत के अध्यक्ष बनने जा रहे थे, लेकिन रामविचार नेताम षड्यंत्र करके हिरामुनी निकुंज को यहां का अध्यक्ष बनवा दिया। मंत्री रामविचार नेताम की विशेष रुचि पर हिरामुनी निकुंज अध्यक्ष बन गईं और सिद्धनाथ पैकरा को हार का सामना करना पड़ा। जिसके बाद बलरामपुर की राजनीति में सब ठीक नहीं चल रहा और मंत्री नेताम आरोपों से घिरे नजर आ रहे हैं। भाजपा के सीनियर नेता सिद्धनाथ पैकरा ने सार्वजनिक मंच पर मंत्री नेताम पर आरोप लगाते हुए कहा कि 10 वर्षों तक पुष्पा नेताम और 5 वर्ष तक उनकी पुत्री अध्यक्ष रहीं, लेकिन जिले में कुछ भी काम नहीं हुआ। भाजपा कार्यकर्ता नेताम पर यह भी आरोप लगा रहे कि जब वह सत्ता से बाहर रहते हैं, तो एकजुटता की बात करते हैं, और कुर्सी मिलते ही उनकी कार्यप्रणाली बदल जाती है।
मंत्री की चूक या अफसर जिम्मेदार?
नवागढ़ विधायक दायलदास बघेल वर्तमान में केबिनेट मंत्री है। और इसके पहले भी वह पूर्व की भाजपा सरकार में दो बार मंत्री रह चुके हैं। लेकिन विधानसभा में उनकी भद्द पिट गई। दरअसल कांग्रेस सदस्य चातुरी नंद के ध्यानाकर्षण में मंत्री बघेल को लिखा हुआ जवाब पढऩा था। लेकिन मंत्री जी विधानसभा अध्यक्ष और कांग्रेस सदस्य को दिए गए जवाब से भिन्न जवाब पढऩा शुरु कर दिए। जिससे अध्यक्ष को कड़े शब्दों में कहना पड़ा कि आप तीन बार के मंत्री हैं विधानसभा में दूसरा जवाब दिया गया है, और जो आप पढ़ रहे हैं वह दूसरा है। अध्यक्ष ने कहा आपने क्या सदस्य और विधानसभा को इसकी कापी उपलब्ध कराई है? जिस पर मंत्री दयालदास घिरते नजर आये। हालांकि डॉ. रमन सिंह ने इस ध्यानाकर्षण के लिए अलग से समय देने की बात कही है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर मंत्री को विधानसभा में दिए गए जवाब को छोड़ दूसरी कापी किसने थमा दी? दयालदास सीनियर मंत्री हैं फिर भी इनती बड़ी चूक कैसे कर गए? क्या यह मंत्री की चूक है? या अफसर ओवर कांफीडेन्स में हैं। बहरहाल कारण जो भी हो इस घटना के कारण तीन बार के मंत्री दयालदास बघेल की भद्द पिट गई।
गणितबाज सुधीर के सभी फार्मूले ध्वस्त
1988 बैच के आईएफएस अफसर सुधीर अग्रवाल को अरण्य भवन सूट नहीं कर रहा। संभवत: उनके कार्यकाल में सबसेे ज्यादा वन्यजीवों कीे मौत हुई है। हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने की चाह में वह वाइल्ड लाइफ में कुछ खास नहीं कर पाये। वह हेड ऑफ फारेस्ट बनने की गणित में उलझे रहे, लिहाजा वाइल्ड लाइफ विंग की स्थिति जर्जर हो गई। अब इसके लिए सुधीर अग्रवाल की कार्यप्रणाली जिम्मेदार है? या फिर उनके इर्द-गिर्द रहने वाले लोग? बहरहाल सुधीर अग्रवाल को इस पर चिंतन और मंथन करना चाहिए। दरअसल सुधीर अग्रवाल हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने के लिए राजनीतिक गणित पर उलझे रहे, इसलिए उन्हें गणितबाज कहना कोई गलत नहीं होगा। राजनीतिक गणित के साथ-साथ उन्होंने हेड ऑफ फारेस्ट बनने के लिए कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था, लेकिन उन्हें यहां से भी निराशा हाथ लगी। इसके पहले वह एक डॉक्टर के साथ मिलकर हेड ऑफ फॉरेस्ट बनने के फार्मूला को हल करने में जुटे थे। जानवरों के डॉक्टर को विभागीय मंत्री का ओएसडी बनवाने की गणित थी। लेकिन डॉक्टर के कारनामों से गणितबाज सुधीर का यह फार्मुला ध्वस्त हो गया। कहते हैं कि उस समय डॉक्टर साहब तो मंत्रालय में भी जाकर अपना कक्ष तय कर आये थे। कहा तो यह भी जा रहा है कि गणितबाज सुधीर डॉक्टर के ओएसडी बनते ही हेड ऑफ फारेस्ट बनने के फार्मुला को हल करने की तैयारी में थे। लेकिन इसी बीच डॉक्टर वन्यजीवों के मौत और गोवा घूमने के मामले में बुरी तरह उलझ गए और मामला विधानसभा तक जा पहंचा। फिर भला कौन मंत्री ऐसे विवादित व्यक्ति को अपना ओएसडी बनाने का जोखिम उठाता। लिहाजा गणितबाज सुधीर का यह फार्मूला भी ध्वस्त हो गया। अब कहते हैं कि गणितबाज सुधीर गणित और फार्मुले से तंग आकर डॉक्टर को सेवा से पृथक करने की तैयारी में हैं।
बिल्डरों को मुनाफा, जनता का क्या?
नवा रायपुर डवलपमेन्ट अथारिटी सरकारी जमीनों को बिल्डरों को सौंपने जा रही है। एनआरडीए क्षेत्र अंर्तगत दूर से दूर के प्लाटों को आम जनता के मकान आदि के लिए 1500 से 2000 रुपये प्रति वर्गफिट निर्धारित कर बेंचा गया है। तो अब यही जमीन बिल्डरों को 500 से 600 प्रति वर्ग फिट में बेचने की जल्दबाजी क्यों? दरअसल एनआरडीए ने 18.64 एकड़ में ब्रांडेड रेसीडेंसी के नाम से टेंडर निकाला है। जिसका प्रति वर्गफिट का दर 658 रुपये निर्धारित किया गया है। यह वो इलाका है जो नवा रायपुर के सबसे पॉस इलाके सीएम हाउस और मेफेयर रिजार्ट से लगा हुआ। आम तौर पर सीएम हाउस और वीआईपी रहवास इलाके सिविल लाइन्स कहलाते हैं। और सिविल लाइन्स इलाका किसी शहर का सबसे महंगा इलाका होता है। फिर यहां की जमीन बिल्डरों को कौड़ी के भाव क्यों? 658 रुपये प्रति वर्गफिट में सीधा जनता को क्यों नहीं? रायपुर सिविल लाइन्स की बात की जाए तो यहां का बाजार दर वर्तमान में 7 से 15 हजार वर्गफिट तक है। तो राज्य की वेलडवलप सिटी नवा रायपुर में बिल्डरों को कौड़ी के दाम पर सिविल लाइन्स की जमीन सौपने की जल्दबाजी क्यों? नवा रायपुर अथारिटी ने तो यहां सड़क, बिजली, पानी आदि की सुविधा पहले से ही डवलप की है, तो फिर बिल्डरों को जमीन सौंपकर जनता की जेब पर चोट क्यों? सरकार की इस नीति से राज्य के बिल्डर तो मालामाल होंगे, लेकिन नवा रायपुर आम जनता से और दूर हो जाएगा।
कमीशन का सच?
राज्य का चर्चित रिएजेन्ट घोटाला सिर्फ चोपड़ा बंधू को ही चोट पहुंचाकर शांत होने वाला नहीं है। दरअसल इसकी परतें अब खुल चुकी है, इसलिए इसमें उलझे अफसरों को भी अब अपनी मंजिल तय करनी पड़ेगी। लाख प्रयासों के बावजूद घोटाले का हर एक सच उजागर हो रहा है। इसके पूर्व भी हम हलचल कॉलम में लिख चुके हैं कि एक अफसर के 10 प्रतिशत कमीशन की लालच ने इस मामले को जनता के समझ उजागर होने में महत्पवूर्ण भूमिका निभाई है। दरअसल मोक्षित कार्पोरेशन का वर्ष 2023 की खरीदी का 338 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना शेष था। खबर यह है कि इस बीच एक अफसर ने सीधा 10 प्रतिशत कमीशन की मांग कर डाली। 338 करोड़ के 10 प्रतिशत राशि की गणना आप स्वयं कर लीजिए क्या हो सकती हैं? चोपड़ा बंधू का इस व्यापार में एकक्षत्र राज रहा भला वह इतनी बड़ी रकम कमीशन के रुप में एक अफसर को कैसे दे सकता है? लिहाजा दोनों के बीच पेमेन्ट और कमीशन की आना-कानी चलती रही। 2023 का विधानसभा चुनाव नजदीक आते देख अफसर समझ चुके थे कि अब मामला हाथ से निकल चुका है। इसलिए मुझे नहीं तो और किसी को चोपड़ा बंधू को यह राशि ढीलनी ही पड़ेगी। फिर क्या उस समय के एक चर्चित बाबू का डर दिखाया गया और कहा गया कि आप लोग देख लो नहीं तो बाबू इस मामले को लपक लेगा। और कमीशन की राशि डकार जाएगा। अपना खुद का नम्बर बढ़ाने के चक्कर में अफसर ने इस मामले को कहीं और यह कहते हुए सौंप दिया कि इसमें 40 से 50 प्रतिशत का मार्जिन है, इसलिए 10 प्रतिशत कमीशन तो बनता है। आप देख लो क्या करना है? फिर क्या चोपड़़ा की अघोषित पेशी उसी दरम्यान से शुरु हो गई। मामला कुछ आगे बढ़ता कि राज्य में विधानसभा का चुनाव आ गया और मामला बिगड़ गया। बहरहाल कमीशन का सच क्या है? इस घोटाले के पर्दे के पीछे कौन-कौन शामिल हैं? इसकी पड़ताल राज्य की जांच एजेन्सी ईओडब्ल्यू कर रही है।
इन्तहां हो गई इंतजार की
राज्य में नगरीय निकाय के साथ ही पंचायत चुनाव भी सम्पन्न हो चुके हैं, लेकिन अभी तक निगम मंडलों की नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं। जिसको लेकर अब कार्यकर्ता यह कहने लगे हैं इन्तहां हो गई है इंतजार की। दरअसल निगम मंडल की एक सूची जारी होने की सम्भावना थी, जो लीक हो गई। सूची लीक होने के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। राज्य सरकार को डेढ़ साल पूरे होने को हैं, ऐसे में भाजपा कार्यकर्ता निगम मंडल की ओर टक-टकी लगाकर देख रहे हैं। हालांकि बहुत नेताओं को नगर पंचायत और जिला पंचायत में शेटल कर दिया जा रहा है। ऐसे में आंतरिक विवाद की स्थिति न के बराबर ही निर्मित होगी। बहरहाल देखना यह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के इंतजार का इन्तहां कब खत्म होगा।