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ऋचा जाएंगी दिल्ली, पिंगुआ रेस से बाहर ?

राष्ट्रीय समाचार पत्र पायनियर के विशेष कॉलम ‘हचलच’ में सबसे पहले 1994 बैच के अफसर विकास शील के सीएस बनने की संभावना को लेकर खबर प्रसारित की गई थी, जिस पर अब राज्य सरकार की मुहर लग चुकी है। 30 सितंबर को अमिताभ जैन का कार्यकाल पूरा होते ही विकास शील औपचारिक रुप से पदभार भी ग्रहण कर लेंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि राज्य में सीएस की रेस पर नंबर 1 रहे एसीएस मनोज पिंगुआ क्यों बाहर हो गए? 1994 बैच की ही अफसर एसीएस ऋचा शर्मा इस कुर्सी तक क्यों नहीं पहुंच पायीं? खैर यह मंथन और चिंतन का विषय है। कहा तो यह भी जा रहा है कि आईएएस मनोज पिंगुआ को लेकर आरएसएस में सहमति नहीं बन पाई। तो वहीं ऋचा शर्मा अब फिर दिल्ली जाने के इच्छुक हैं, हालांकि ऋचा शर्मा ने विकास शील के सीएस बनने के पहले ही इसके लिए आवेदन कर रखा है। संभव है एसीएस ऋचा शर्मा जनवरी 2026 में फिर केन्द्र सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आयें।
बदले जाएंगे कलेक्टर

राज्य सरकार एक बार फिर बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करने जा रही है, जिसमें से 3 कलेक्टर बदले जा सकते हैं। इसके साथ ही मंत्रालय में सिकेटरी स्तर पर भी कुछ बदलाव संभव है। दरअसल राजनांदगांव कलेक्टर सर्वेश्वर भूरे केन्द्र सरकार पर प्रतिनियुक्ति पर जा रहे हैं। भूरे की पोष्टिंग केन्द्र सरकार में ज्वाइंट सिकेटरी टेक्सटाइल्स पर की गई है। वहीं कोरबा कलेक्टर बार-बार विष्णु सरकार की फजीहत करा रहे हैं। वरिष्ठ आदिवासी नेता पूर्व मंत्री ननकीराम कंवर ने 4 अक्टूबर से राजधानी स्थित मुख्यमंत्री निवास के सामने धरना देने का ऐलान कर दिया है। इसके पहले मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखकर उन्होंने यह कहा है कि कोरबा कलेक्टर का रवैया हिटलर की भांति है। अब मामला आर-पार का है, या तो सरकार कलेक्टर अजीत बसंत को हटाएगी या अपनी ही पार्टी की फजीहत कराएगी। वैसे राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो ननकीराम कंवर की पृष्ठभूमि एक जुझारु और जिद्दी नेता की रही है। लेकिन उन पर कभी भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे, उन्होंने कभी निजी स्वार्थ की राजनीति नहीं की। जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ननकीराम कंवर का कलेक्टर से बार-बार पंगा निजी स्वार्थ के चलते नहीं हो सकता, दाल में कुछ तो काला है। यदि राज्य के बाहर के नेताओं का दखल नहीं हुआ, तो संभव है कि कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत भी हटा दिए जाएंगे। वहीं नए सीएस विकास शील के कार्यभार सम्भालते ही उनसे सीनियर अफसरों को मंत्रालय से बाहर किया जा सकता है। एसीएस रेणु पिल्ले को विज्ञान और प्रौद्यागिकी विभाग के प्रभार से मुक्त किया जा सकता है। इसके साथ ही एसीएस सुब्रत साहू से सहकारिता और धर्मस्व विभाग वापस लिया जा सकता है।
100 प्रतिशत रेटिंग, अब निशाने पर बिल्डर
2018 के बाद से राज्य की जनता ने ईडी की कार्रवाई को जाना और पहचाना। इसके पहले शायद ही यहां के लोग ईडी को जानते रहे होंगे? इस दौरान एक बात स्पष्ट रुप से निकलकर सामने आई है कि अब तक ईडी की कार्रवाई की सफलता रेटिंग 100 प्रतिशत रही है। ईडी और केन्द्रीय जांच एजेंसियों ने जहां भी हाथ डाले हैं, फिर चाहे मंत्री हो या कारोबारी, माफिया हो या अफसर किसी को नहीं बख्शा गया। कोल घोटाला, शराब घोटाला, पीएससी भर्ती घोटाला, महादेव सट्टा मामला, डीएमएफ घोटाला समेत अनेकों उदाहरण सामने हैं। अब कहा जा रहा है कि इन्हीं घोटालों का तार जुड़ते-जुड़ते बिल्डर और अन्य कारोबारियों तक पहुंच गए हैं। हाल ही में रायपुर के एक नामी बिल्डर के यहां ईडी ने दबिश दी है, अब इनका कनेक्शन किसी आरजी से जुड़ते बताया जा रहा है। अब यह आरजी कौन हैं? फिलहाल इसका खुलासा अभी तक जांच एजेन्सी ने नहीं किया है। इसके पहले ईडी ने एक महिला डॉक्टर को भी निशाना बनाया है। दोनों के यहां कार्रवाई जारी है। वास्तव में यदि इन कारोबारियों का कनेक्शन कोल, शराब या अन्य घोटालों से निकला, तो शायद ही ईडी की कार्रवाई की सक्सेज रेटिंग कम हो।
उपलब्धि कागजों तक?
27 सितंबर को पूरे देश ने विश्व पर्यटन दिवस मनाया। छत्तीसगढ़ राज्य में भी पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। इस राज्य में प्रकृति की उदारता खुले रुप से दिखती है। लेकिन यहां पर्यटन विभाग की उपलब्धियां सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह गई हैं। धरातल पर विभाग में कोई काम नजर नहीं आते? क्या इसकी खबर किसी को नहीं है? राज्य सरकार के तकरीबन दो साल पूरे होने को है, लेकिन फिल्म सिटी का ढिंढोरा पीटने वाला पर्यटन विभाग इस ओर क्या काम कर पाया, यह पूछने वाला यहां कोई नहीं है? पहले से निर्मित पर्यटन स्थलों में बदलाव और लोगों को अपनी ओर आकार्षित करने के लिए क्या काम हो रह हैं? यह भी किसी को खबर नहीं। पर्यटन में अपार संभवनाओं के बाद भी आखिर यहां काम क्यों नहीं हो पा रहे? यह बेहद ही चिंता का विषय है। दरअसल इसके पीछेे एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि पर्यटन विभाग के संचालक के पद पर ज्यादातर आईएफएस अफसरों की पोस्टिंग रही है। जो एक-दूसरे के किए हुए प्रयासों काटतेे नजर आये। यदि पुराने अफसर के समय कोई काम हुआ तो नए अफसर ने उसमें रुचि नहीं ली और अब जो कार्य हो रहे शायद आने वाले दिनों में शायद कोई दूसरे अफसर को पसंद न आये। जतना का रुपया है कोई करोड़ों का टेंटर कर देता है, तो कोई ठेकेदारों का भुगतान रोक देता है। आखिर इस विभाग में हो क्या रहा है? क्या यह विभाग अफसरों की मनमानी के लिए है। शायद इसलिए पर्यटन में आपार संभावनाओं के बाद भी यहां धरातल में कुछ नजर नहीं आता।
दौड़ने वाले घोड़ों की तलाश
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पार्टी के नेताओं को गुजरात में चेताया था कि बारात के घोड़ों की जरुरत अब नहीं है, उन्हें दौड़ने वाले घोड़े चाहिए। इसी कड़ी में राहुल गांधी ने छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और तेलांगाना में दौडऩे वाले घोड़ों की तलाश शुरु कर दी है। इसके लिए शीर्ष स्तर पर तैयारियां भी हो चुकी हैं। कांग्रेस अब इन तीनों राज्यों में बारात के घोड़ों यानि की जो नेता निष्क्रिय है, उनकी विदाई करने जा रही है। यह विदाई जिले स्तर से शुरु होगी मतलब पहले चरण में जिलाध्यक्ष बदले जाएंगे। यह परिवर्तन बिहार चुनाव के बाद या उससे पहले भी हो सकते हैं। दरअसल कांग्रेस के केन्दीय नेतृत्व को चुनावी लिहाज से छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश ज्यादा आसान दिख रहा है। इसलिए इन राज्यों पर अभी से संगठात्मक सुधार पर जोर दिया जा रहा है।
नियम और परंपरा पर भरोसा?
नवा रायपुर में नवनिर्मित विधानसभा भवन बनकर तैयार हो चुका है। राज्योत्सव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नए विधानसभा भवन का उदघाटन करेंगे। नवम्बर माह विधानसभा के सचिव दिनेश शर्मा रिटायर हो जाएंगे। वैसे तो छत्तीसगढ़ विधानसभा का इतिहास देखेंगे तो यहां सचिवों को पूर्व में संविदा नियुक्ति मिलते रही है। इसके पूर्व विधानसभा के सचिव रहे चंद्रशेखर गंगराडे और देवेन्द्र वर्मा इसके उदाहरण हैं। लेकिन अब क्या विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह इस परंपरा को तोड़ेंगे? या फिर दिनेश शर्मा को भी संविदा नियुक्ति दी जाएगी। वैसे अब तक छत्तीसगढ़ विधानसभा नियम और परंपरा को कायम रखने पर भरोसा करते रही है, इसलिए संभव है दिनेश को भी संविदा नियुक्ति दे दी जाएगी।
नेक इरादे
राज्य में विष्णु कैबिनेट के विस्तार के दौरान तीन मंत्रियों ने शपथ ली, जिसमें स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव का कद बढ़ता दिख रहा है। गजेन्द्र का कद राजनीतिक लिहाज के साथ-साथ प्रशासनिक रुप मेंं भी बढ़ा है। दरअसल इसके पीछे है मंत्री गजेंन्द्र यादव के नेक इरादे। मंत्री गजेन्द्र यादव ने अपने विभाग में तय कर लिया है कि उन्हें नाम नहीं बल्कि काम चाहिए। शायद इसीलिए पिछली सरकार की तरह स्कूलों का नाम बदलने में वह अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते। गजेन्द्र ने अपने शुरुआती कार्यकाल में ही प्रत्येक जिलों में एक स्कूल को सलेक्ट करके मॉडल के रुप मे तैयार करने को ठाना है। उन्होंने राज्य में शिक्षा को सुदृढ़ बनाने टीचरों का डिजिटल अटेंडेंस भी अनिवार्य कर दिया है। प्रशासनिक कसावट लाने के लिए विभाग में पदस्त भ्रष्ट अफसरों पर कार्रवाई करने में भी वह पीछे नहीं हट रहे। मंत्री के नेक इरादे के बदौलत यहां एक बार फिर स्कूल शिक्षा में बदलाव की उम्मीद जग उठी है।
बस्तर सांसद का बढ़ता कद
पहली बार जीतकर बस्तर से सांसद बने महेश कश्यप का बस्तर की राजनीति में कद बढऩे लगा है। दरअसल बस्तर संासद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष के रुप में महेश कश्यप ने केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बस्तर दशहरा में शामिल होने का आमंत्रण दिया है। मुरिया दरबार का आयेाजन 4 अक्टूबर को होगा, सभंव है अमित शाह इस आयोजन में शामिल होने छत्तीसगढ़ आयें। हालांकि अभी तक शाह के दौरे की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन यह माना जा रहा है कि बस्तर सांसद महेश कश्यप को केन्द्र सरकार और अमित शाह का अच्छा सपोर्ट मिल रहा है, जिसके कारण बस्तर की राजनीति में महेश कश्यप का कद बढऩे लगा है।
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