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निशाने में पवन साय?
भाजपा में सत्ता से ज्यादा संगठन को मजबूत माना जाता है। सम्भवत: इसीलिए पहाड़ सा बहुमत लेकर सत्ता में काबिज कांग्रेस और भूपेश सरकार के जबड़े से भाजपा संगठन ने जीत छीन ली। राज्य में भाजपा को सत्ता वापस दिलाने में संगठन महामंत्री पवन साय का विशेष योगदान रहा। सरल और सहज छवि के पवन साय की रणनीति के बदौलत आज यहां विष्णु का सुशासन चल रहा है। संगठन और कार्यकर्ताओं की तपस्या से विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा में भी भाजपा ने राज्य में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। लेकिन 9 माह के भीतर अब ऐसा क्या हो रहा है? जिसके कारण भाजपा कार्यकर्ता ही संगठन महामंत्री पवन साय पर उंगली उठाना शुरु कर दिए हैं? भाजपा संगठन तो सत्ता से परे 365 दिन अपने कामों में लगा रहता है, तो फिर पवन साय निशाने पर क्यों हैं? दरअसल में बीते 9 माह में धान, किसान और महतारी वंदन के अलावा सरकार की कोई योजना आम जनता के बीच अपना स्थान नहीं बना पाई। जबकि पहले साल सरकार की छवि गढऩे का काम सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। विकास कार्यों की गति अत्यंत धीमी है, जिससेे कार्यकर्ताओं में हतासा और निराशा स्वाभाविक है। पवन साय के निशाने पर होने की प्रमुख वजह यह भी मानी जा रही है कि मुख्यमंत्री सचिवालय या सरकार के ज्यादातर निर्णय में संघ का प्रत्यक्ष दखल है। जिसके कारण अनेकों निर्णय में देरी होती है। खैर यह तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव और संगठन महामंत्री पवन साय ही जानेंगे कि सच क्या है? दूसरा प्रमुख कारण मुख्यमंत्री के पास विभागों की भरमार है, दो-दो मंत्रियों के पद रिक्त पड़े हुए हैं। यही नहीं ओव्हरलोड के कारण मुख्यमंत्री के सचिवालय में महत्वपूर्ण फाइलें भी महीनों धूल खाती पड़ी रहती हैं। सम्भवत: इसलिए भाजपा कार्यकर्ता सरकार को कोसने की बजाय संगठन महामंत्री पवन साय पर उंगली उठाना शुरु कर दिए हैं।
एक तीर से कई निशाने
कवर्धा कांड के चलते एसपी अभिषेक पल्लव को मुख्यालय अटैच कर दिया गया। सुशासन वाली विष्णु सरकार ने कवर्धा कलेक्टर जन्मेजय महोबे को भी हटा दिया। खैर महोबे को नान का एमडी बनाया गया है। डॉ. रमन सिंह की सरकार में कभी अनिल टुटेजा भी नान के एमडी हुआ करते थे। महोबे की जगह नए कलेक्टर गोपाल वर्मा को कवर्धा की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो पूर्व सीएम भूपेश बघेल के रिस्तेदार बताये जाते हैं, निश्चित ही गोपाल वर्मा की पोष्टिंग के बाद भूपेश और कांग्रेस की धार धीमी पड़ती दिख रही है। बहरहाल इसमें सबसे ज्यादा नुकसान एक्शन, वीडियो, रोल, ड्रामा और कट करने वाले एसपी अभिषेक पल्लव का हुआ। दरअसल में एसपी अभिषेक पल्लव छोटी-छोटी गलतियों को लेकर आम जनता का एक्शन, रोल, ड्रामा के बाद वीडियो बनाकर सोसल मीडिया में डाल देते थे, और इस ड्रामा के माध्यम से सुर्खियां बटोरने का काम करते थे। लेकिन कवर्धा में एक नाबालिक युवती की डंडों से पिटाई करवाते हुए वह खुद वीडियो में कैद हो गए। यह वीडियो एक्शन, रोल, और ड्रामा नहीं, बल्कि 100 प्रतिशत सच था। ड्रामा और सच में अन्तर तो होता ही है। नतीजन पल्लव के ड्रामा वाले वीडियोज से ज्यादा सच का वीडियो वायरल होना शुरु हो गया, इस वीडियो ने पूरे राज्य में पुलिस की छवि खराब की। शायद इसी कारण आईपीएस विकास कुमार के निलंबन के बाद भी अभिषेक पल्लव को कवर्धा से हटा दिया गया। लेकिन यहां भी एक तीर से कई निशाने साध लिए गए। ज्ञात हो एसपी-कलेक्टर कांफ्रेंस के दौरान बलरामपुर की सबसे बड़ी ज्वेलरी शॉप में दिन-दहाड़े कट्टे की नोक पर 6 करोड़ की लूट हो जाती है। जिसके कारण बलरामपुर से लेकर राजधानी तक सरकार की किरकिरी होती है। दिन-दहाड़े लूट के बाद बलरामपुर-रामानुजगंज के एसपी राजेश अग्रवाल का हटना लगभग तय हो गया था। मौका देख उन्हें कवर्धा की कमान सौंप दी गई, वहीं बैंकर वैभव रमनलाल को बलरामपुर-रामानुजगंज का नया कप्तान बना दिया गया। वैभव इसके पहले बीजापुर में एडिसनल एसपी थे। कुल मिलाकर एक एसपी यानि कि अभिषेक पल्लव को हटाकर दो एसपी यानि कि बैंकर बैभव रमनलाल और राजेश अग्रवाल की पोष्टिंग कर दी गई, हुआ न एक तीर से कई निशाना।
फ्रंट लाइन से बैक लाइन की ओर
टीएस सिंहदेव छत्तीसगढ़ की राजनीति में बीते पांच साल तक चर्चित रहे। सत्ता और संगठन के बीच वह नम्बर दो के आहदे पर भी दिखाई देते रहे। पहले नम्बर पर पूर्व सीएम भूपेश बघेल तो दूसरा बड़ा ओहदा पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव का रहा। वह ढाई साल की जगह पांच साल तक वेटिंग इन सीएम बने रहे, आखिरी-आखिरी उन्हें डिप्टी सीएम के पद से ही आत्मसंतोष करना पड़ा। बेशक सिंहदेव फ्रंट लाइन के नेता हैं, लेकिन वह फ्रंट लाइन से बैक लाइन में कब आ पहुंचे, यह उन्हें भी आभास नहीं हो पा रहा है ? दरअसल में कांग्रेस के द्वारा छत्तीसगढ़ न्याय यात्रा निकाली गई है, जिसकी पहली तस्वीर मीडिया के समाने आई, इस तस्वीर में सिंहदेव जैसा कद्दावर नेता फ्रंट लाइन से गायब होकर, बैक लाइन में दिख रहे हैं। पहली पंक्ति में पीसीसी चीफ दीपक बैज, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत, फूलो देवी नेताम समेत अन्य नेता नजर आ रहे हैं, सिंहदेव पीछे की पंक्ति में खड़े दिख रहे हैं?
लता के साथ यह कैसा न्याय?
कोण्डागांव विधायक लता उसेण्डी मुख्यमंत्री निवास की सबसे ज्यादा चक्कर लगाने वाली विधायकों में से एक हैं। शायद इसीलिए पहली किस्त में ही लता को लाल बत्ती दे दी गई है, उन्हें बस्तर विकास प्राधिकारण का उपाध्यक्ष बनाया गया है। लेकिन लता के साथ यह कैसा न्याय है? इसको लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। दरअसल में लता उसेण्डी वर्तमान में भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं, वह उड़ीसा की सहप्रभारी भी हैं, उडीसा में भाजपा को विजयश्री दिलाने में लता का विशेष योगदान रहा। रमन सरकार में वह महिला एवं बाल विकास मंत्री रहीं। लता नागरिक आपूर्ति निगम की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। वर्षों से वह छत्तीसगढ़ की राजनीति में सरल-सहज नेत्री के रुप में स्थापित हैं। उसके बाद भी सुशासन वाली विष्णु सरकार में उनके कद अनुरुप जगह नहीं मिली? लता के पहले बृजमोहन अग्रवाल जैसे कद्दावर नेताओं को राजनीतिक रुप से किनारे कर दिया गया है? अजय चंद्राकर, अमर अग्रवाल, राजेश मूणत जैसे नेताओं की पूछ-परख सरकार में न के बराबर है? बहरहाल लता के साथ यह कैसा न्याय है? इस पर मंथन और चिंतन की जरुरत है।
इसी का नाम राजनीति है
आज से 9 माह पहले मुख्यमंत्री की रेस में शामिल गोमती साय को एक प्राधिकरण के उपाध्यक्ष पद से ही संतुष्ट होना पड़ रहा है। दरअसल में राजनीति का यही सिद्धान्त है, यदि अवसर गया तो उसके बाद जो मिल गया उसी से संतोष करना पड़ता है। यहां पर गोमती साय के साथ भी कुछ ऐसा ही होते दिख रहा है। बहरहाल गोमती साय को जो पद दिया गया है, उससे गोमती साय कितना संतुष्ट हैं इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन क्षेत्र की जनता में तनिक भी हर्ष नहीं दिख रहा। कांग्रेस के रामपुकार सिंह को पत्थलगांव की जमीन में हराना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन गोमती साय के शांत और सरल स्वभाव के कारण जनता ने आठ बार के विधायक रहे रामपुकार सिंह को घर बिठा दिया। हाल ही में गोमती साय को सरगुजा विकास प्राधिकरण का उपाध्यक्ष बनाया गया है। इस प्राधिकरण के अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय होंगे। ऐसे में गोमती सरगुजा की जनता के विश्वास में कितना खरी उतर पायेंगी फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता।
प्रशासनिक सर्जरी की सुगबुगाहट
सचिव स्तर पर कुछ फेरबदल की सुगबुगाहट प्रशासनिक स्तर पर सुनने को मिल रही है। कुछ विभागों के सेकेट्रियों के विभाग बदले जाएंगे। वहीं आईएफएस अफसरों की एक छोटी लिस्ट नवरात्रि के बीच जारी हो सकती है, जिसमें अरण्य भवन में पदस्थ कुछ सीसीएफ स्तर के अफसरों के विभाग बदले जा सकते हैं। वहीं दो-चार वनमण्डलाधिकारी के भी स्थानांतरण होने की चर्चा है।
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