हलचल… कुछ भी स्थायी नहीं है

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कुछ भी स्थायी नहीं है

याद रखिए यह आज का भारत है, यहां हर दिशा में, हर क्षेत्र में सब कुछ संभव है। किसी का आज कमजोर है, तो उसे कमजोर समझने का दुस्साहस मत करिए। किसी का आज मजबूत है तो हमेशा वह मजबूत रहेगा यह भी मत सोचिए। यहां कुछ भी स्थायी नहीं है, अंगेजी में जिसे हम कहतें हैं ‘Nothing is permanent’ इसका जीता जागता उदाहरण इन तस्वीरों में देख लीजिए। हम कुछ नहीं कह रहे ये तस्वीरें चीख-चीख कर कह रही कि ‘न कंचित् शाश्वतम्’। जो पुलिस कभी विजय शर्मा के मामले पर हां या न, सत्य या असत्य बोलने की स्थिति में नहीं थी, उस पुलिस का मिजाज अब बदल चुका है। उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा की यह तस्वीर 23 अक्टूबर 2021 की है, इस दौरान विजय शर्मा अरोपी के रुप में जेल दाखिल किए जा रहे हैं। वहीं दूसरी तस्वीर भी देख लीजिए जो 17 जनवरी 2024 की है, जिसमें वह उपमुख्यमंत्री बन चुके हैं, और उनके आधीन राज्य का पूरा गृह मंत्रालय है। यह खास तस्वीर उन अफसरों के लिए हैं जो क्षणिक लाभ के लिए अपने आप को सत्ता का करीबी बताने में जुट जाते हैं। इसलिए याद रखिए ‘कुछ भी स्थायी नहीं है’।

इसी महीने नए डीजीपी पर मुहर

राज्य के नए डीजीपी की नियुक्ति पर इसी माह के आखिरी-आखिरी मुहर लग सकती है। दरअसल में नियुक्ति का मामला रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद साफ हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी 22 जनवरी तक काफी व्यस्त हैं। ऐसे में ज्यादातर फाइलें पेंडिग हैं, इसलिए नियुक्ति का मामला भी लटका हुआ है। यह माना जा रहा है कि 22 के बाद कभी भी राज्य को नया डीजीपी मिल सकता है।

भूपेश ने रमन को दिया, साय ने वापस भूपेश को ही सौंप दिया

कहते हैं कि पूर्व सीएम भूपेश बघेल को जो सरकारी आवास एलाट किया गया है वह बहुत ही बुरी कंडीशन में है। सीएम भूपेश जब इसे देखने पहुंचे, तो उनके चाहने वाले लोगों ने कहा साहब यह आपके रहने लायक नहीं, आपके लिए अच्छा सा मकान कहीं खोज लेते हैं। लेकिन भूपेश बघेल ने साफ कह दिया सरकारी आवास और कैसा रहेगा। फिलहाल मकान की मरम्मत चालू है। भूपेश बघेल मुख्यमंत्री निवास के पास ही एलाट सरकारी बंगले में रहेंगे। सरकार जाने के बाद न्यू शांति नगर स्थित सरकारी आवास (पाटन सदन) जो कांग्रेस अध्यक्ष रहते भूपेश बघेल को दिया गया था, उसे भी किसी और को एलाट किया जा सकता है। खैर भूपेश के एक करीबी विधायक ने इसे खुद के नाम से एलाट करने का पत्र लिखा है। पर अब भूपेश उसी बंगले में रहेंगे जो सीएम बनते ही भूपेश सरकार ने रमन सिंह को एलाट किया गया था। इसको लेकर लोग कह रहे हैं कि समय चक्र घूम चुका है। पहले भूपेश ने इस खंडहर मकान को रमन सिंह को एलाट करवाया, अब भाजपा और साय ने वापस भूपेश को ही सौंप दिया।

45 करोड़ का काम कोटेशन में

कुछ अधिकारियों ने छत्तीसगढ़ में खूब लूट-घसोट की। इस भ्रष्टाचार से राज्य का कोई कोना नहीं छूटा। कहते हैं कि संविदा पर काम कर रहे एक आईएएस ने जिलों में दबाव बनाकर 45 करोड़ रुपये का काम कोटेशन में दिला दिया। गांव रोशन हुए कि नहीं यह तो जांच का विषय है। स्ट्रीट लाइट लगी कि नहीं यह भी जांच का विषय है, लेकिन ठेकेदारों को 45 करोड़ रुपये भुगतान कर दिया गया है। कहते हैं कि आदिवासी बाहुल्य गांवों को रोशन करने में बड़ा खेल हुआ है। अब मंत्रालय में बैठे इन साहब के पीछे कई जिलों के अफसर व नेताओं ने अलग-अलग विषय को लेकर मोर्चा खोल दिया है। वहीं साहब की मुख्यमंत्री तक भी शिकायत पहुंचाई जा रही है। ऐसे में आगे संविदा में नौकरी चलती रहेगी कि सरकार सेवा मुक्त करने का निर्णय लेगी, फिलहाल अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।

कांग्रेस सरकार ने ही छीनी कुर्सी, फिर भी कांग्रेसी का ठप्पा?

सरकार बदलने के बाद अफसरों के साथ एक बड़ा संकट पैदा हो चुका है, वह है विश्वास का संकट। कुछ अफसरों पर कांग्रेस का ठप्पा लगा दिया गया है, पर वे कांग्रेसी कभी रहे हैं कि नहीं यह मंथन का विषय है। दरअसल में एक बोर्ड के सदस्य सचिव रहे अफसर को विभाग के बारे में खासी जानकारी है और पकड़ भी। पुरानी सरकार ने रिटायरमेन्ट के पहले ही उनकी कुर्सी छीन ली। यह सब उस दौर में हुआ जब राज्य में ईडी की कार्रवाई सातवें आसमान पर थी। कहते हैं कि ईडी इन साहब के नवा रायपुर स्थित कार्यालय में भी धमक देने पहुंच गई, रात को 1 बजे तक पूछतांछ भी हुई। उसके बाद दूसरे दिन इस अफसर पर यह दबाव आया कि ईडी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराओ, हालांकि इसमें कितनी सत्यता है, यह तो साहब और ईडी के खिलाफ एफआईआर दर्ज के निर्देश देने वाले ही जानेंगे। यह साहब धर्म-कर्म पर आस्था रखते है, कुर्सी भी उनको इसी मार्ग से मिली थी। लेकिन जब उन्होंने एफआईआर दर्ज कराने से साफ मना कर दिया। फिर क्या दूसरे ही दिन संदेश आ गया कि जब मेरा नहीं हो सकता, तो उसे बोलो की कुर्सी छोड़ दे। कुछ दिनों बाद सच में कुर्सी छीन ली गई। यह सब महज एक संयोग है कि सच, यह तो शोध का विषय है। लेकिन उसके बाद भी इन साहब में और भी कुछ काम करने की जिज्ञासा बची रही, जिसके लिए उन्होंने संविदा नियुक्ति के लिए आवेदन लगा दिया, आवेदन बोर्ड से पास होकर संबधित मंत्री के पास पहुंच चुका है। अब यह कहा जा रहा कि साहब कांग्रेसी हैं। इसलिए उनका मामला फिलहाल विचाराधीन है। कुल मिलाकर धर्म-कर्म से कुर्सी तक पहुंचने वाले इस अफसर पर कथित कांग्रेसी होना बताकर कुछ लोगों द्वारा रोड़ा पैदा किया जा रहा है।

चौथी किस्त का क्या?

राज्य में भाजपा की सरकार बनते ही मोदी की गांरटी को पूरा करते हुए किसानों को 2 साल का बकाया बोनस दे दिया गया है। लेकिन भूपेश सरकार के वादे भी पूरे होंगे यह कुछ कहा नहीं जा सकता। दरअसल में चौथी किस्त को लेकर अभी भी पेंच फंसा हुआ है। तकरीबन 15 दिन पहले उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने मुंगेली में आयोजित एक कार्यक्रम में राजीव गांधी किसान न्याय योजना की चौथी किस्त जारी करने की घोषणा की है। साव का यह बयान मीडिया में भी आया है, लेकिन इसको लेकर अभी तक कोई आदेश नहीं दिए गए हैं। वहीं मीडिया रिर्पोटों की बात करें तो मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को भी इसके बारे में पता नहीं है। ऐसे में चौथी किस्त का क्या होगा फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता।

रसूख वाला जानवरों का डॉक्टर

अनूसूची 1 में शामिल दुर्लभ वन्य जीव चौसिंगा की लगातार मौत होते रहीं। 5 दिन के भीतर मौत का यह आकड़ा 17 पहुंच गया। तीन सदस्यीय जांच समिति ने जंगल सफारी के डॉक्टरों को इसके लिए दोषी माना है। जांच रिर्पोट भी विभाग को पहुंच चुकी है। पर इस रसूख वाले जानवरों के डॉक्टर को विभाग का संरक्षण मिला हुआ है, शायद इसलिए अभी तक कार्रवाई नहीं हुई, इनका एक और मामला पहले से ही वन बल प्रमुख श्रीनिवास राव के पास लंबित है, जिसमें निलंबित करने की अनुसंशा की गई है। अब चौसिंगाओं के मामले में भी डॉक्टरों को दोषी ठहराया गया है, यह जांच रिपोर्ट पीसीसीएफ वन्य प्राणी सुधीर अग्रवाल तक पहुंच चुकी है। कहते हैं कि जांच रिपोर्ट को इसलिए लटकाया जा रहा कि डॉ. अपने रसूख का पूरा उपयोग कर मंत्री केदार कश्यप पर दबाव बनाने में सफल हो जाएं। वहीं आरोपों से घिरे इस डॉक्टर को एक मंत्री का ओएसडी बनाने की चर्चा भी हो रही है। कहते हैं इसके लिए मंत्री जी का अनुशंसा पत्र भी मंत्रालय पहुंच चुका है।

पहले गहलोत और अब भजन, अडानी का क्या?

हसदेव अरण्य बचाने के लिए लगातार आंदोलन जारी है। यह आंदोलन लम्बे समय से चला आ रहा है। इसके पूर्व छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकारें थीं। राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत छत्तीसगढ़ की कांग्रेस शासित सरकार को खदान के संबंध में लगातार पत्र लिखते रहे। यहां तक कि एक बार गहलोत खुद भी छत्तीसगढ़ आए, गहलोत का यह दौरा अडानी समूह के द्वारा किए जा रहे खनन से जोड़ा गया था, लेकिन उस समय इस दिशा पर कोई सार्थक बात नहीं बनी। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के राजनीतिक स्टैंड के अनुरूप राज्य में अडानी के कोल खनन का काम ढीला पड़ा रहा। अब छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की सरकारें हैं। कहते हैं कि परसा ईस्ट केते बासन एक्सटेंशन से कोयला खनन के लिए राजस्थान के नए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखा है। हालांकि कांग्रेस सरकार में गहलोत भी भूपेश को कुछ इसी तरह पत्र लिखते रहे, लेकिन खनन के काम में कोई खास गति नहीं मिल पाई। पत्र का संदर्भ भी लगभग एक है। पहले भी यह कहा जाता रहा है कि राजस्थान सरकार बिजली के लिए छत्तीसगढ़ के कोयले पर निर्भर है। खनन में देरी के कारण राजस्थान में बिजली संकट पैदा हो सकता है। अभी भी तर्क में समानता है। अब देखना यह है कि कोयला खनन को लेकर पत्राचार यूं ही जारी रहेगा कि दोनों सरकारें इसमें आगे बढ़ेंगी। भूपेश सरकार के दौरान राज्य में अडानी के कोल खनन का जमकर विरोध हुआ था। अभी भी हसदेव बचाओ का आंदोलन जारी है। अब विष्णुदेव सरकार इस मामले से कैसे निजात पाएगी?

editor.pioneerraipur@gmail.com

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