हलचल… महंत कितने सफल?

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महंत कितने सफल?

राज्य की सत्ता गवांते ही कांग्रेस आलाकमान ने भूपेश बघेल के कद को कम कर दिया है। भूपेश आक्रामक राजनीति करने वाले नेता के रुप में जाने जाते हैं, लेकिन पार्टी ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाया। निश्चित ही शीर्ष नेतृत्व को अब भूपेश पर भरोसा नहीं रहा। शायद इसी कारण डॉ. चरणदास महंत को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन महंत नेता प्रतिपक्ष के रुप में कितने सफल होंगे या इतिहास फिर दोहराया जाएगा, यह तो भविष्य में ही पता लग सकेगा। दरअसल में एक ओर भाजपा सभी राज्यों में नए चेहरे आगे कर रही है, वहीं कांग्रेस इस दिशा में कुछ नया नहीं कर पा रही। महंत को नेता प्रतिपक्ष बनाना इसका जीता-जागता उदाहरण है। डॉ. चरणदास महंत अविभाजित मध्यप्रदेश से लेकर अब तक पार्टी के अनेकों पदों पर विराजमान रहे, फिर भी वह कुछ खास नहीं कर पाये। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार में वह केन्द्रीय मंत्री रहे, तब भी कोई खास उपलब्धि उनके खाते में नहीं आई। छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, लेकिन कांग्रेस को सत्ता में नहीं ला सके। विधानसभा अध्यक्ष के कार्यकाल में भी वह महज संतुलनकर्ता बनकर रह गए। अब नेता प्रतिपक्ष के रुप में वह पार्टी और राज्य की जनता के साथ कितना न्याय कर पायेंगे, यह तो आने वाले बजट सत्र से ही दिखाई देना शुरु हो जाएगा।

बाइट ले लो, बाइट

आज के दौर में ऐसा लगता है कि पत्रकारिता सिर्फ बाइट वाली होकर रह गई है। पत्रकार भाइयों की मजबूरियों का चारों ओर खूब फायदा उठाया जा रहा है। रोजी-रोटी की भाग दौड़ में मजबूर पत्रकार करे भी तो क्या करे? हजारों ज्वलंत मुद्दे हैं, लेकिन पत्रकार बाइट के पीछे दौड़ रहा है। बाइट लेने वाले पत्रकारों की संख्या देख, बाइट देने वाले भी अब इतराते हैं। माइक देखकर चुनाव किया जाता है कि किसे बाइट देना है, किसे नहीं। खैर यह बाइट वाली पत्रकारिता का दौर कहां रुकेगा फिलहाल कुछ कहा नहीं जा सकता। पत्रकार की मजबूरी है, वह न चाहकर भी बाइट के लिए दौड़ रहा है। क्योंकि खबर कहीं चली और उनके संस्थान में नहीं चली तो खिंचाई तय है। जबकि इस बाइट के अलावा भी हजारों मुद्दे हैं, हजारों समस्याएं हैं, हजारों सरोकार की खबरें हैं। लेकिन बाइट के लिए गलाकाट पत्रकारिता चल रही है। अब तो बाइट के लिए बकायदा मैसेज भी आते हैं, फला जगह रात को 9 बजे बाइट मिलेगी। मैसेज आते ही बाइट के लिए मैराथन शुरु हो जाती है। ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों में बाइट सब्जी-भाजी की तरह गली -मोहल्ले में मिलेगी। बाइट ले लो, बाइट की आवाज चारों ओर गूंजेगी। अभी भी समय है इस विषय पर मंथन का, चिंतन का। क्या हर खबर के लिए बाइट जरुरी है? पर्याप्त सबूत और पर्याप्त तथ्य हैं तब भी बाइट की आवश्यकता है क्या? विषयों में आपकी पकड़ है, तब भी बाइट की जरुरत है क्या? इस बाइट के मैराथन में कई बार आप अपने आपको उपेक्षित महसूस करते हैं, तब भी बाइट की आवाश्यकता है?। इसलिए हो सके तो बाइट ले लो, बाइट से बचिए।

रमन, भूपेश और अब विष्णुदेव

भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रहे, वहीं डॉ. रमन सिंह भी मुख्यमंत्री रहे। दोनों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि रमन सिंह खामोश रहकर 15 साल तक राज किए। वहीं भूपेश बघेल बड़बोलेपन के कारण पांच साल में सत्ता से बाहर हो गए। दरअसल भूपेश के कार्यकाल में कुछ अफसर ही सरकार चलाते थे, लेकिन रमन पार्ट 1 और पार्ट 2 में ऐसा नहीं था। रमन का दरवाजा आम जनता के लिए हमेशा खुला रहता था। गुरुवार को जनदर्शन भी होते थे, जहां अधिकारियों के न चाहते हुए भी रमन सभी वर्ग के लोगों से रुबरु हो जाते थे। जनदर्शन में कई बार रमन के इर्द-गिर्द रहने वाले अफसरों की भी शिकायत हो जाती थी। कार्रवाई हो या न हो जनता अपनी गुहार रमन तक पहुंचाने में सफल हो जाती थी। वहीं सीएम भूपेश किस वर्ग से मिलेंगे यह कुछ खास अफसर या खास लोग ही तय करते थे। भेंट मुलाकात में कलेक्टरों पर भीड़ जुटाने के आरोप भी लगते रहे, माइक भी वह अपने हिसाब से सौंपते थे। मनचाहे जबाब की अपेक्षा भी रखते थे। शायद इसी कारण भूपेश वास्तविकता से कोसों दूर होते गए। भूपेश के कानों में वही आवाज पहुंचाई जाती थी, जो खास लोग तय करते थे। शुरुआती के दौर में सब ठीक था, बाद में भूपेश से वहीे लोग मिल पाते थे, जिन्हें यह खास लोग तय करते थे। इसके विपरीत रमन सबसे मिल लेते थे। यह बात अलग है कि वह मुलाकात सीएम हाउस में न सही, जनदर्शन में ही सही, पर रमन की उपलब्धता आसान थी। वीआईपी मुलाकात न सही, लाइन लगकर ही, पर लोग रमन तक पहुंच जाते थे। लेंकिन भूपेश को इन सबसे कोसों दूर रखा गया। भूपेश में निर्णय लेने की क्षमता है, राजनीति की अच्छी समझ भी। लेकिन उन्हें जनता से दूर कर दिया गया, परिणाम सबके सामने है। अब मुख्यमंत्री के रुप में विष्णुदेव साय का कार्यकाल शुरु हो चुका है, इतिहास के पन्नों में वह किस तरह उकेरे जांएगे यह तो उन्हें ही तय करना है।

कटियार का क्या?

लंबे समय बाद एपीसीसीएफ आलोक कटियार को वन मुख्यालय भेज दिया गया है। सरकार किसी की भी हो कटियार का सिक्का हमेशा चलते रहा है। इस बार पहली दफा ऐसा हुआ है कि आईएफएस आलोक कटियार को उनके मूल विभाग में वापस भेज दिया गया है। कहते है कि कटियार ने ज्वाइन तो कर लिया है, लेकिन अभी भी उनकी रुचि वन विभाग में नहीं है। शायद यही कारण है कि वन मुख्यालय में उनके पांव नहीं पड़ते। राज्य में सरकार बदलते ही आईएएस अफसरों का तबादला कर दिया गया। वहीं आईपीएस और आईएफएस अफसरों के दबालते की सूची अभी नहीं आई है। ऐसे में अभी तक कटियार को वन मुख्यालय में कोई खास जिम्मेदारी भी नहीं दी गई है।

अमित के चर्चे

अमित कुमार ऐसे अफसर हैं, जो सीबीआई में तकरीबन एक दशक से भी जादा का समय बिताकर छत्तीसगढ़ वापस आये हैं। 1998 बैच के आईपीएस अमित कुमार को राज्य का नया इंटेलिजेंस (खुफिया) चीफ बनाया गया है। अमित कुमार छत्तीसगढ़ मेंं रहते हुए दुर्ग, रायपुर एसपी के रुप में भी कमान संभाल चुके हैं। सीबीआई जैसी संस्था में काम करने का उनका लंबा अनुभव है। अमित सीबीआई के तकरीबन आधा दर्जन डायरेक्टरों के साथ काम कर चुके हैं। कुल मिलाकर राज्य और केन्द्र दोनों में अमित कुमार की पकड़ मजबूत है।

सुधर जाओ, वरना बुलडोजर आ जाएगा

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर की खूब डिमांड है। यूपी वाला बुलडोजर अब सीजी में भी खूब सुर्खियां बटोर रहा है। राज्य में भाजपा की सरकार आते ही चारों ओर बुलडोजर निकल पड़ा। रायपुर नगर निगम के तत्कालीन कमश्निर मयंक चतुर्वेदी ने आसमाजिक तत्वों और कब्जाधरियों के खिलाफ मुहिम छेड़ रखा था। मयंक का बुलडोजर खूब चर्चा में रहा। अब एक बार फिर बुलडोजर सुर्खियों में है। पखांजुर में भाजपा नेता असीम राय की हत्या के मुख्य आरोपी का होटल बुलडोजर से ढहा दिया गया। वहीं साधराम हत्याकांड के आरोपी आयाज खान के द्वारा किए गए अवैध कब्जों पर भी प्रशासन का बुलडोजर चला। यहीं नही सीएम विष्णुदेव साय ने साफ तौर पर कह दिया कि भयमुक्त शासन देने की दिशा में ऐसी कार्रवाई जारी रहेगी। कुल मिलाकर अपराधिक तत्वों को सरकार का साफ मैसेज है सुधर जाओ, वरना बुलडोजर आ जाएगा।

बेखबर विभाग, बेबस वन्यजीव

छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों को लेकर एक के बाद एक बुरी खबरें आ रही हैं। 17 चौसिंगाओं की मौत का मामला अभी शांत नहीं हुआ था कि गोमर्डा अभ्यारण में बाघ की करंट से मौत हो गई। हालांकि चौसिंगा और बाघ के मौत के कारण अगल-अलग हैं। 17 चौसिंगाओं की मौत जंगल सफारी के डाक्टरों की लापरवाही कारण हुई। तो बाघ करंट की चपेट में आकर काल के गाल में समा गया। मीडिया में आई खबरों की माने तो वन विभाग को बाघ के मरने की खबर 12 दिन बाद मिली। एक तरफ बाघ की निरंतर घटती संख्या ने सबको चिंचित करके रखा है। दूसरी तरफ यह घटना वन्यजीव प्रेमियों को झिकझोर के रख दिया है। कुल मिलाकर वन्यजीवों के प्रति राज्य का वन विभाग सजग नहीं है, जिसके कारण आये दिन ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं।

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