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विभागों का बंटाधार
डिप्टी सीएम अरुण साव के विभागों की हालात बहुत खराब हैं। आकड़े और हालात देखकर यह कहने में संकोच नहीं कि खेवनहारों ने अरुण साव के विभागों का बंटाधार कर दिया है। इसके लिए जिम्मेदार कौन है? फिलहाल इस पर अरुण साव को मंथन करने की जरुरत है। दरअसल पीडब्ल्यूडी विभाग को राज्य के विकास की रीढ़ माना जाता है। संभवत: इसीलिए इस विभाग और निर्माण के लिए 9500 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया था। लेकिन यह विभाग एक तिहाई बजट राशि भी खर्च नहीं कर पाया। इसके पीछे कारण क्या है? कहीं इसकी वजह कमीशनखोरी तो नहीं है? ऐसे तमाम सवाल इन दिनों आमजनता के बीच चर्चा के विषय बने हुए हैं। निश्चित तौर पर बजट राशि खर्च न होना विकास के मापदंड को झुठलाने का काम कर रहा है। जब राशि ही खर्च नहीं की गई तो विकास कहा हुआ यह तो पीडब्ल्यूडी विभाग के खेवनहार ही बता पायेंगे। दूसरी ओर अरुण साव के पीएचई विभाग में खुलेआम कमीशनखोरी के आरोप लग रहे हैं। धरातल में जलजीवन मिशन का बंटाधार है। कमीशनखोरी का मामला यहां तक पहुंच गया कि इस विभाग के एक ठेकेदार 30 मार्च को आत्मदाह करने की चेतावनी दी है।
13-13 लाख की वसूली का सच?
कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार अब सभी सरकारों के लिए चुनौती बन गई है। दरअसल इन दिनों एक विभाग के एचओडी पर एक सबसे बड़े संगठन के नाम पर अपने विभाग के अफसरों से 13-13 लाख वसूली की खबर सामने आई है। कहा जा रहा है कि प्रत्येक क्षेत्र से 13-13 लाख जमा करने का अघोषित फरमान जारी किया गया है। वास्तव में 13-13 लाख की वसूली का सच क्या है? यह तो जांच का विषय है। लेकिन यह अफसर पूर्व की कांग्रेस सरकार में भी भ्रष्टाचार में गले तक डूबे रहे। राज्य में सरकार बदलने के बाद यह माना जा रहा था कि पहली गाज इन्ही पर गिरेगी, लेकिन पुराने संबंध और इस संगठन के एक पदाधिकारी की वजह से साहब कुर्सी बचाने में कामयाब हो गए। आलम यह है कि नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले इस संगठन के नाम पर भी प्रत्येक वर्ष करोड़ों की रकम वसूली जा रही है।
सट्टा ने लगाया बट्टा
महादेव सट्टा ऐप को लेकर इन दिनों बड़ी कार्रवाई के संकेत हैं। महादेव सट्टा ऐप ने राज्य के कई नेताओं और चर्चित अफसरों की साख में बट्टा लगाने का काम किया है। दरअसल राज्य के कुछ आईपीएस अफसरों पर आरोप है कि महादेव सट्टा ऐप को प्रोटक्शन देने के एवज में हर माह लाखों रुपये की वसूली की जा रही थी। कहा तो यह भी जा रहा है कि सीबीआई ने इन तमाम अफसरों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है, जिसमें कभी भी कार्रवाई हो सकती है। बहरहाल महादेव सट्टा ऐप मामले को लेकर एक बार फिर से हलचल शुरु हो गई है। वहीं ईडी ने कुछ दिन पहले महादेव सट्टा ऐप को लेकर तकरीबन 1700 करोड़ रुपये की संपत्ती अटैच की है। इसमें दुबई से लेकर दिल्ली तक की सम्पत्तियां शामिल हैं। अब इसको लेकर सीबीआई ने भी कार्रवाई शुरु कर दी है। माना जा रहा है कि महादेव सट्टा ऐप मामले में गिरफ्तारियां भी संभव है। इसमें कुछ आईपीएस अफसरों, राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर और नेताओं पर गंभीर आरोप हैं।
इंटरवेल के बाद नया रोमांच
राज्य सरकार ने अपना आधा कार्यकाल पूरा कर लिया है। मतलब अब इंटरवेल के बाद नए दृश्य भी देखने को मिल सकते हैं। दरअसल भाजपा एक ऐसी पार्टी है जो समय पर मूल्यांकन कर जरुरी परिवर्तन करने से परहेज नहीं करती। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों में सरकारों ने अपना आधा कार्यकाल पूरा कर लिया है। ऐसे में पार्टी बड़ा रिव्यू कर सकती है। और आवश्यकतानुसार मंत्रियों के विभागों में फेरबदल या बदलाव भी कर सकती है। दरअसल वर्तमान में कुछ राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, परिणाम आने के बाद मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चा शुरु हो गई है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में भी गुजरात मॉडल अपना सकता है। यह परिवर्तन चुनावी लिहाज से किए जा सकते हैं। आपको बता दें कि भाजपा ने इसके पहले गुजरात में बड़ा प्रयोग किया था जहां आधा कार्यकाल बीत जाने के बाद पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया गया था।
मुख्यमंत्री सचिवालय में बदलाव, 15 अप्रैल के पहले बड़ी सर्जरी
मुख्यमंत्री सचिवालय में बीते दिनों बड़ा बदलाव किया गया। सीएम सचिवालय में संयुक्त सचिव का दायित्व संभाल रहे जनसंपर्क आयुक्त डॉ. रवि मित्तल की पीएमओ में पोष्टिंग के बाद 2012 बैच के आईएएस अफसर रजत बंसल को जनसंपर्क आयुक्त के प्रभार के साथ सीएम सचिवालय में भी विशेष सचिव का दायित्व सौंपा गया है। रजत एक रिजल्ट ओरिएंटेड अफसर के रुप में जाने जाते हैं, साथ ही पीएस टू सीएम सुबोध कुमार सिंह के भी गुड बुक में उनका नाम शामिल है। इसके साथ ही राज्य सरकार प्रशासनिक कसावट लाने और भी बड़ा प्रशासनिक फेरबदल कर सकती है। इसमें सचिवों के विभाग बदले जाएंगे, वहीं कुछ जिलों के कलेक्टरों का भी बदलना तय है। दरअसल बहुत से सिक्रेटरी दो साल से अधिक का समय एक ही विभाग में बिता चुके हैं जिनके बदले जाने के संकेत हैं। बहुत से अफसरों की चुनाव ड्यूटी में तैनाती की गई है, इसलिए यह बदलाव 15 अप्रैल के भीतर संभव है। वहीं एक ही जिले में दो साल से अधिक समय बिता चुके कुछ कलेक्टर भी बदले जाएंगे। इसके साथ ही संचालनालय स्तर पर भी बदलाव संभव हैं।
जमीनों की लूट तो नहीं?
बीते दिनों विधानसभा के बजट सत्र में गोदावरी पॉवर एण्ड इस्पात लिमिटेड को कौडिय़ों के दाम पर सरकारी जमीन लुटाने का आरोप लगाया गया। करीब 295 एकड़ जमीन 28 लाख रुपये प्रति वर्ष लीज राशि में यह आवंटन 99 साल के लिए किया गया है। इसके लिए 4 दिसंबर 2024 को अनुबंध किया गया है। 30 दिसंबर 2024 को ग्राम पंचायत के सामान्य सभा में अनुमोदन कर एनओसी दी गई। 25 फरवरी 2025 को कलेक्टर महासमुंद द्वारा इस जमीन को उद्योग विभाग को दिया गया। 6 मार्च 2025 को उद्योग विभाग महासमुंद द्वारा सीएसआईडीसी को जमीन दी गई और 22 मई 2025 को सीएसआईडीसी ने गोदावरी पॉवर एण्ड इस्पात को जमीन आवंटित की। मतलब तकरीबन 5 माह की प्रक्रिया में 295 एकड़ जमीन आवंटित कर दी गई। विपक्षी सदस्यों ने विधानसभा में यह भी आरोप लगाया कि यहां पेड़ों की अवैध कटाई की गई, नालों को पाट दिया गया। कहा तो यह भी जा रहा है कि चारागाह की भी जमीन इसमें शामिल है। खैर मामले का असली सच क्या है? इसका पूरा खुलासा विधानसभा में नहीं हो पाया। इसके अलावा भानुप्रतापपुर में ग्राम कच्चे आरे-डोंगरी 138.96 हेक्टेयर आयरन ओर खनन के लिए लीज पर दी गई है। वहीं 74 हेक्टेयर जमीन मटेरियल डंप के लिए भी दी गई है। गोदावरी पॉवर एवं इस्पात को आवंटित जमीनों को लेकर इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चे हो रहे हैं।
डांगी की करतूत और सरकार की कार्रवाई
वैसे तो निलंबित आईपीएस रतनलाल डांगी की करतूत तकरीबन एक साल पहले ही उजागर हो गई थी, लेकिन सरकार ने उन्हें बीते दिनों निलंबित किया। हालांकि डांगी मामले में दोनों पक्षों द्वारा आरोप लगाए गए हैं। फिलहाल वास्तविक सच क्या है? यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा। रतनलाल डांगी की कथित तस्वीरें सोसल मीडिया में उजागर होने के बाद सरकार हरकत में आई, जबकि इस गंभीर आरोप की जांच में प्रथम दृष्टया ही निष्पक्षता बरतने की जरुरत थी। आईपीएस रतनलाल डांगी ने भी विभाग को लंबी चौड़ी चिट्ठी लिखी थी, उस पर जांच हुई? घटना का वास्तविक सच उजागर हुआ क्या? इस विवाद के सामने आने के बाद भी रतनलाल डांगी को नारकोटिक्स विभाग की कमान क्यों सौंप दी गई? इसको लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं। क्या वास्तव में उनकी करतूतों से पूरा सिस्टम बेखबर था? या फिर इतने दिनों तक डांगी मामले में पर्दा डालने की कोशिश की जा रही थी?
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