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सवालों के घेरे में अरुण प्रसाद ?
2006 बैच के आईएफएस अफसर अरुण प्रसाद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वर्तमान में प्रसाद छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मडल में सदस्य सचिव की जिम्मेदारी निभा रहे थे। इससे बड़ी बात यह है कि अरुण प्रसाद के इस्तीफे की खबर तब सामने आई जब पूरा प्रदेश विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा था। कुल मिलाकर जिसके कंधे पर पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी है, उसी ने इस खास दिन को अपना इस्तीफा सौंप दिया? इसको लेकर सवाल तो उठेंगे ही। हालांकि अरुण प्रसाद ने इस्तीफा में व्यक्तिगत कारणों का जिक्र किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि प्रसाद के इस्तीफे की खबर विश्व पर्यावरण दिवस के दिन ही सामने क्यों आई? खैर प्रसाद को जानने वाले लोग कहते हैं कि उन्हें 6 करोड़ रुपये के पैकेज की एक नौकरी का ऑफर है। लेकिन सवाल तो यहां भी खड़ा होता है, पर्यावरण संरक्षण मंडल में नियुक्ति पाने के लिए पीसीसीएफ स्तर के अफसर आतुर रहते हैं, तो प्रसाद महज 6 करोड़ रुपये सलाना के लिए इस्तीफा देंगे ? अरुण प्रसाद वर्तमान में सीसीएफ स्तर के अफसर हैं, समय से पहले उन्हें इस खास विभाग में पोष्टिंग मिल गई यह सभी जानते हैं। दरअसल अरुण प्रसाद को पर्यावरण संरक्षण मंडल का सदस्य सचिव बनवाने में रिटायर्ड आईएएस अनिल टुटेटा का विशेष योगदान रहा है। टुटेजा पहले प्रसाद को सीएसआईडीसी लेकर गए बाद में उन्हें पर्यावरण संरक्षण मंडल की जिम्मेदारी दे दी गई। समय बदला, सरकार बदली, लेकिन प्रसाद नहीं बदले, अरुण प्रसाद वर्तमान आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओपी चौधरी की भी पसंद बने रहे। बहरहाल इस्तीफे ने प्रसाद को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
सौरभ का डेपुटेशन और प्रसाद का इस्तीफा महज संयोग?
आईएएस सौरभ कुमार को केन्द्र सरकार नेे रवन्यू की जिम्मेदारी सौंपी है। इधर सौरभ डेपुटेशन में जाते हैं, दूसरी तरफ अरुण प्रसाद के इस्तीफे की खबर आती है। क्या यह महज एक संयोग है? दरअसल आईएएस सौरभ कुमार और आईएफएस अरुण प्रसाद एक ही मंत्री के आधीन काम करते थे। सौरभ कुमार वित्त मंत्री ओपी चौधरी के पसंदीदा अफसरों में से एक हैं। इतना ही नहीं सौरभ और प्रसाद की दोस्ती के भी चर्चे दूर-दूर तक होते हैं। सौरभ कुमार एनआरडीए के सीइओ के पद की जिम्मेदारी निभा रहे थे और अरुण प्रसाद छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के सदस्य सचिव के पद पर तैनात है। दोनों विभागों का कार्यालय एक ही कैम्पस में है। कई दफे सौरभ की प्रसाद के कार्यालय में लंबी बैठके भी होती थी, यहीं नहीं सरकारी काम से फुर्सत पाते ही दोनों खान-पान भी साथ कर लेते थे। कहने का मतलब यह है कि सौरभ ने अपने पसंदीदा बॉस (मंत्री) को छोड़कर दिल्ली जाने का फैसला क्यों लिया? आईएएस सौरभ और उनके विभागीय मंत्री के नजदीकी की तस्वीर आप भी देख सकते है। क्या कोई प्रशासनिक अफसर सार्वजानिक मीटिंग में अपने विभागीय मंत्री को उंगली दिखाकर बात कर सकता है? शायद नहीं। लेकिन आईएएस सौरभ कुमार अपने विभागीय मंत्री के इतने नजदीक हैं कि उन्हें यह भी छूट प्राप्त है, तब भी उन्हें दिल्ली जाने की जल्दबाजी क्यों? खैर यह सौरभ कुमार का निजी फैसला है, लेकिन प्रसाद का इस्तीफा और सौरभ का दिल्ली जाना क्या महज एक संयोग है? इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं।
होर्डिंग का काला कारोबार
रायपुर नगर निगम में अफसर इन दिनों होर्डिंग के काले कारोबार में सहभागी बन गए है। कुछ अफसरों ने एक होर्डिंग एजेन्सी से सांठ-गांठ करके निगम को करोड़ों रुपये का चूना लगा दिया है। दरअसल एक होर्डिंग एजेन्सी ने तकरीबन 6-7 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान निगम को नहीं किया और अफसर सिर्फ नोटिस जारी करने की रस्म अदा करते रह गए। इतनी बड़ी बकाया राशि कोई एक दिन में तो नहीं हुई होगी? कहा जा रहा है कि निगम के अफसरों ने जानबूझबर इस बकाया राशि की वसूली में ढिलाई बरती है। इतना ही नहीं खबर तो यह भी है कि अफसरों के मिलीभगत से फिर से निगम को लंबा चूना लगाने की तैयारी है। जिम्मेदार अफसरों ने सांठगांठ करके इस एजेन्सी से सरकारी राशि तो नहीं वसूली, अब एक दूसरी कंपनी के साथ ज्वांइटवेंचर करके इस कंपनी को होर्डिंग के काले कारोबार में फिर शामिल करने की तैयारी है। बहरहाल होर्डिंग के काले कारोबार का कारनामा जनता के सामने उजागर हो चुका है। अब इसको लेकर अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग उठने लगी है। सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी इसकी शिकायत राज्य की जांच एजेंसी ईओडब्ल्यू में करने की तैयारी में हैं। वहीं लोक आयोग में भी भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ मोर्चा खोला जा रहा है।
विष्णु का नया अवतार
वैसे तो नक्सल मामलों में सुशासन वाली विष्णु सरकार का 16 माह का कार्यकाल काफी उपलब्धियों भरा रहा है, लेकिन चुनौतियां और भी हैं। दरअसल अब तक सरकार के ज्यादातर खेवनहार वहीं है, जो भूपेश सरकार की नैया के खेवनहार थे। विपक्ष में रहते हुए डीजीपी अशोक जुनेजा के नाम पर भाजपा कार्यकताओं ने खूब हल्ला किया था। डिप्टी सीएम और तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अरुण साव ने कानून व्यवस्था को लेकर मोर्चा खोला था, भाजपा ने कई आंदोलन किए। जुनेजा के कार्यकाल में ही महादेव सट्टा एप को लेकर खाकी में सवाल उठे, लेकिन उन्हें एक्सटेशन मिल गया। इस निर्णय से भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में हतासा दिखी, पर विरोध नहीं कर सके। अब सीएस के एक्सटेंसन पर भी खुसर-फुसर शुरु हो गई है। हालांकि आतंरिक विरोध के चलते अब स्थानीय भाजपा नेता सीएस के एक्सटेंशन के पक्षधर नहीं है। और माना जा रहा है कि राज्य को जल्द नया सीएस मिलने जा रहा है। वर्तमान सीएस अमिताभ जैन इसी माह रिटायर हो रहे हैं, लिहाजा सीएस को लेकर मुख्यमंत्री की शीर्ष नेतृत्व से भी चर्चा की बात सामने आई है। दरअसल भारत सरकार ने कई राज्यों में मुख्य सचिवों की नियुक्तियां की है, जिसको देखकर अब यह कायास लागाया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ को भी जल्द नया सीएस मिलने जा रहा है। वहीं पूर्णकालिक डीजीपी के लिए पैनल में दो नाम भेजे गए है जिसमें प्रभारी डीजीपी अरुण देव गौतम और हिमांशु गुप्ता के नाम शामिल हैं। हालांकि सीनियर आईपीएस पवनदेव ने कैट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन कैट ने डीजीपी चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही भूपेश सरकार में चर्चित रहे वनबल प्रमुख व्ही श्रीनिवास राव को भी बदला जा सकता है। पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ सुधीर अग्रवाल रिटायर होने जा रहे हैं, ऐसे में सरकार वनबल प्रमुख भी बदल सकती है। इसके लिए प्रमुख दावेदार के रुप में आईएफएस अरुण पांडे का नाम उभरकर सामने आ रहा है। कहा जा रहा है कि अरुण पांडे की पकड़ भाजपा में काफी मजबूत है। रमन सरकार में भी अरुण पांडे काफी पावरफुल रहे हैं। इसके साथ ही मुख्यमंत्री विष्णुदेव भी अरुण पांडे के काम से खासे प्रभावित हैं। संभावना यह बन रही है कि श्रीनिवास राव को वाइल्ड लाइफ की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, वहीं पांडे मेन पीसीसीएफ बनाए जा सकते हैं। कुल मिलाकर जल्द ही विष्णु सरकार नए अवतार में दिखने वाली है।
महंत बने संत
नेता प्रतिपक्ष महंत इन दिनों संत बन गए हैं। संत रुपी महंत की तारीफ करने से भाजपा भी परहेज नहीं कर रही। वैसे तो निजी जीवन में डॉ. चरणदास महंत संतों को ही फालो करते हैं। लेकिल यदि वह वर्तमान भूमिका में संत बन गए तो कांग्रेस का क्या होगा? बीते एक माह में राज्य के समाचार पत्रों और टीवी चैनलों को देख लें तो नेता प्रतिपक्ष के रुप में महंत की उपस्थिति कहीं नजर नहीं आ रही है। वह किसी मामले में वर्तमान सरकार को घेरने में कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। इसके विपरीत भाजपा उन्हें तारीफ नामक तीर से छलनी कर दे रही है। भाजपा के कई नेता महंत की खुले मंच से तारीफ कर रहे हैं। कुछ वीडियो तो उनकी धर्मपत्नी कोरबा संासद ज्योत्सना महंत ने भी साझा किए हैं। खैर निजी जीवन में महंत संत से कम नहीं हैं। लेकिन वर्तमान सामाजिक भूमिका संत रुपी महंत के विपरीत है। दरअसल विष्णु सरकार अपने दो साल के कार्यकाल के नजदीक पहुंच रही है। लेकिन कांग्रेस और महंत अब तक सरकार को एक भी मामले में घेर नहीं पाये हैं। इसके विपरीत भाजपा महंत को संत बनाने में कामयाब होते दिख रही है।
14 तारीख पर ऐतबार न रहा
मुख्यमंत्री विष्णुदेव जैसे ही दिल्ली जाते हैं राजधानी रायपुर में मंत्रिमंडल विस्तार की खबरें तैरने लगती हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय दिल्ली में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात कर विभिन्न विषयों पर चर्चा की। सीएम दिल्ली रवाना हुए कि राजधानी में 14 तारीख को फिर शपथ की खबरें उडऩे लगी। खबरों में दो-तीन मंत्रियों को हटाने की बात भी सामने आई। लेकिन इस दौरान संभावित मंत्री पद के उम्मीदवारों में न उत्साह दिखा और न हीं जिन्हें हटाने की चर्चा चल रही वहां कोई हतासा दिखी। दरअसल यह 14 तारीख कई बार झूठी साबित हो चुकी है। इसके पहले भी 14 तारीख को शपथ की तैयारी हो चुकी थी। राज्यपाल का दौरा निरस्त हो गया था, नेताओं ने नया कुर्ता तैयार करवा लिया था। लेकिन शपथ नहीं हो सकी। इसलिए अब नेताओं को 14 तारीख पर ऐतबार नहीं रहा।
समय बड़ा बलवान
समय बड़ा बलवान होता है। समय कब, किसे कौन से रास्ते पर लाकर खड़ा कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता। किसी ने ठीक ही कहा है कि सत्ता और समय सदैव किसी का नहीं रहा है। इसलिए समय और सत्ता का गुमान नहीं करना चाहिए। नजारा आप खुद देख सकते हैं। जो अफसर कभी कलेक्टर के रुप में अपराधियों का जिला बदर करते थे, आज वह खुद राज्य से बाहर खदेड़ दिए गए हैं। निलंबित आईएएस रानू साहू, समीर विश्नोई और राज्य प्रशासनिक सेवा की अफसर सौम्या चौरसिया को जमानत तो मिल गई, लेकिन छत्तीसगढ़ में रहने की अनुमति नहीं मिली। यह तीनो राज्य के बाहर चले गए हैं। कुल मिलकार यह कहा जा सकता है कि जो कभी जिला बदर करते थे, खुद राज्य बदर हो गए। समय बड़ा बलवान…………………
निशाने पर कलेक्टर-एसपी
विष्णु सरकार का सुशासन नामक तिहार, बहुत की सरल तरीके से सम्पन्न हो चुका है। जब तक यह अभियान चल रहा था जिला स्तर पर कलेक्टर-एसपी से लेकर सभी अफसरों को बेचैनी थी। वैसे तो सीएम विष्णुदेव साय सरल और शांत स्वभाव के है, लेकिन उन्होंने इस तिहार के दौरान साफ तौर पर कहा था कि अगर गड़बड़ी मिली तो सीधेे सस्पेंड करेंगे। खैर सुशासन तिहार के दौरान जिलों से कोई बड़ी खबर सामने नहीं आई, गड़बड़ी भी नहीं दिखी। कुछ जिलों में छोटी-मोटी कार्रवाई के अलावा बड़ी कार्रवाई मुख्यमंत्री को नहीं करनी पड़ी। नाम के अनुरूप इस अभियान का समापन भी उसी तरीके से हो गया। लेकिन अब प्रत्येक जिलों के परफारमेेंस और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वन का मूल्यांकन किया जा रहा है। मूल्यांकन के बाद कुछ जिलों में बदलाव की संभावना है।
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