(विनय प्रकाश तिर्की)
जब कोई व्यक्ति, समाज या समुदाय किसी मंज़िल की ओर बढ़ता है, तो वह केवल आगे नहीं बढ़ता, बल्कि बहुत कुछ पीछे भी छोड़ आता है। यह खोना कभी स्पष्ट होता है, तो कभी अनजाना और अदृश्य। नौकरी, पद या पहचान जैसी उपलब्धियाँ गर्व का कारण होती हैं, लेकिन वे यह विचार करने से नहीं रोकतीं कि इन उपलब्धियों के साथ क्या-क्या खोया और क्या पाया। शहरों में अच्छा रोजगार मिल जाने या सरकारी नौकरी मिलने के बाद बहुत से लोग एक स्थिर और सुरक्षित जीवन जीते हैं। पर कभी यह सवाल भी उठता है कि इस नौकरी के पीछे क्या-क्या त्याग हुआ? इस दौरान समाज, गाँव, परिवार या देश के लिए कोई सार्थक योगदान हुआ भी या नहीं? या व्यक्ति ऐसे प्रशासनिक तंत्र में फँस गया जहाँ सेवा से ज्यादा ‘सेवा शर्तों’ पर ध्यान केंद्रित किया जाता है? यदि यही सवाल किसी समाज विशेष जैसे उराँव जनजाति से किया जाए, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है इसलिए क्योंकि छोटानागपुर क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों में इसकी बहुलता थी,और इसी जनजाति के कारण इस क्षेत्र में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति भी हुई।
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध विशेषकर 1960 से 1990 का दशक छोटानागपुर की पहाड़ियों में बसे उराँव आदिवासियों के लिए एक सामाजिक और बौद्धिक जागरण का युग था। उस कालखंड में शिक्षा एक नए सूर्य की भाँति उगती है, जिसकी किरणें घने साल को चीरती हुई आदिवासी बच्चों की आँखों में आशा और अभिलाषा का दीप जलाती थीं। इसकी तुलना यूरोप के पुनर्जागरण काल से की जा सकती है जो कि इटली के फ्लोरेंस शहर से चालू हुआ था। यह क्रांति सहज नहीं थी, इसके मूल में ईसाई मिशनरियों का अथक श्रम, समर्पण और दूरदृष्टि थी। इस काल खण्ड में बड़े पैमाने पर इस वर्ग के लोगों ने सरकारी नौकरियाँ भी हासिल की, पर आधुनिकता की दौड़ में इस जनजाति की पढ़ी लिखी आबादी के गाँव छोड़ने के साथ ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों, परंपराओं, भाषाओं और सामूहिक रिश्तों से वे दूर होती चली गयी। क्या केवल विकास के आँकड़ों में खुद को समाहित कर लेने के फेर में आत्मा कहीं पीछे रह गई? किसी संगठन, समाज या व्यक्ति की सच्ची उपलब्धि केवल पद या स्थिति तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें यह भी निहित होता है कि उसने अपने सफ़र में कितनों को जोड़ा, कितना संरक्षित किया और नवीनता का सृजन किया। ये सभी मूल्य सब उपलब्धियों से कहीं बढ़कर है। यह आलेख उराँव जनजाति के उस खोए हुए हिस्से की पड़ताल है, जिसे जानबूझकर नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बहुत से चीज़ों को उन्होंने अनायास ही खो दिया और आज उसे पुनः पहचानने के लिए वे अब संघर्ष भी कर रहे हैं। उराँव जनजाति की यह यात्रा एक गहरे द्वंद्व- विकास की ओर अग्रसर होने की ललक और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की छटपटाहट के बीच से गुजर रही है।
शिक्षा की जो अलख इस समाज में जगी, उसने निश्चित ही कई बंद दरवाज़े खोल दिए। उराँव जनजाति के लोगों ने शिक्षा के माध्यम से कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ तो अर्जित कीं, लेकिन इसके साथ-साथ व्यक्ति, समुदाय और संगठन के स्तर पर कई मूल्यवान चीज़ों को भी खो भी दिया। स्वतंत्रता के बाद विशेष रूप से मिशनरियों के कारण शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय प्रगति की। उस दौर में इस समाज से अनेक डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, प्रशासनिक अधिकारी और शहरी पेशेवर निकले। यह निस्संदेह एक बड़ी उपलब्धि थी, जिसने सामाजिक चेतना और आत्मविश्वास को नई दिशा भी दी, लेकिन इस शैक्षिक उन्नति की क़ीमत पर समाज ने कई ऐसी जीवन-मूल्य आधारित विरासतें भी खो दीं, जो उसकी पहचान और आत्मा हुआ करती थीं। गाँव स्तर पर परस्पर सहयोग की संस्कृति, प्रकृति से गहरा संबंध, तथा संगठनात्मक एकता, अपनी भाषा ये सब धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ते गए।
भारत के विविध आदिवासी समाजों मेंउराँव जनजाति का विशेष और प्रेरणास्पद स्थान है। छोटानागपुर पठार के जंगली क्षेत्रों में फैला यह समुदाय शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कर चुका है, जो अन्य जनजातीय समूहों के लिए आदर्श बन गई। मुझे आज भी वह दृश्य याद है जब गाँव के बच्चे खेत, खलिहान, जंगल और पहाड़ों को पार करते हुए दूरस्थ इलाकों से मिशन स्कूल की ओर पगडंडियों में पैदल ही जाते थे। ऐसा लगता था मानो पूरे गाँव का रुख एक ही दिशा में है। स्कूल के समय में तो जैसे पूरा गाँव वीरान हो जाता था- घर, आँगन और चौपाल सूने पड़ जाते। पगडंडियों पर इतनी भीड़ उमड़ पड़ती कि वह किसी अनुशासित चींटियों की पाँत की तरह प्रतीत होती। शिक्षा के प्रति यह समर्पण मात्र व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामुदायिक संकल्प का हिस्सा था। यदि कोई माता-पिता अपने बच्चे को स्कूल भेजने में कोताही बरतते, तो शाम होते ही गाँव के बुज़ुर्गों की बैठकें होतीं। वहाँ न केवल समझाइश दी जाती, बल्कि कई बार सामाजिक दंड भी दिया जाता, ताकि शिक्षा का यह प्रवाह बाधित न हो। यह उराँव समाज की जागरूकता का परिचायक था कि वे शिक्षा को केवल क़िताबों तक सीमित न रखकर, उसे एक सामाजिक चेतना के रूप में अपनाए हुए थे।
हालाँकि, इस बदलाव को लेकर कुछ वर्गों में उपेक्षा और उपहास भी देखने को मिला। विशेषकर समाज के उन तबकों से, जो स्वयं शिक्षा से वंचित थे या जिनके भीतर जातिगत श्रेष्ठता की भावना अब भी जीवित थी। इन लोगों में कुछ पिछड़े वर्ग के लोग भी थे, जो इन आदिवासी बच्चों की स्कूल जाती टोलियों को देखकर ताने कसते या हँसी उड़ाते। फिर भी, इन आलोचनाओं और अवरोधों के बावजूद, उराँव समुदाय ने शिक्षा को अपने आत्म-सम्मान, जागरूकता और भविष्य की राह को स्वयं गढ़ने के लिए अपना हथियार बनाया। हायर सेकेंडरी शिक्षा के बाद, आर्थिक रूप से विपन्न होने के बावजूद, आदिवासी समुदाय की बड़ी संख्या बिना किसी पूर्व जानकारी या मार्गदर्शन के उच्च शिक्षा की तलाश में बड़े शहरों की ओर बढ़ने लगी। इनमें सागर, भोपाल, जबलपुर, इंदौर जैसे मध्यप्रदेश के प्रमुख शहर शामिल थे। इन शहरों में अध्ययन करना कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड में पढ़ने जैसा अनुभव देता था। यह प्रवृत्ति केवल लड़कों तक सीमित नहीं थी; लड़कियाँ भी समान उत्साह और संकल्प के साथ इस शैक्षिक प्रवास में सहभागी रहीं।
इन शहरों में आदिवासी छात्रों के लिए संचालित सरकारी छात्रावास उनके लिए न केवल आश्रय स्थल बने, बल्कि एक नए जीवन की आधारशिला भी सिद्ध हुए। मुझे स्मरण है कि वर्तमान जशपुर ज़िला, जो उस समय रायगढ़ ज़िले का हिस्सा था, वहाँ से प्रत्येक बड़े शहर में तीन से चार सौ छात्र अध्ययनरत थे।
यह उल्लेखनीय है कि उस दौर में जब छत्तीसगढ़ के रायपुर-बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई जैसे अपेक्षाकृत समृद्ध क्षेत्रों के सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए इन शहरों में पढ़ना एक सपना मात्र था, तब आदिवासी छात्र वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके थे। स्वयं मैंने भोपाल में अध्ययन के दौरान देखा कि केवल मेरे गाँव से ही सत्रह छात्र-छात्राएँ वहाँ शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, जबकि सागर में हमारे गाँव के मेरे साथ सात छात्र अध्ययनरत थे। जब इन छात्रों ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर सरकारी नौकरियों में स्थान पाना शुरू किया, और उनके जीवन स्तर में स्पष्ट सुधार दिखाई देने लगा, तब समाज के अन्य वर्गों, विशेषकर अन्य जनजातियों और पिछड़े वर्गों में एक किस्म की बेचैनी और असंतोष पनपने लगा। उन्हें लगा कि वे पीछे छूट रहे हैं।
धीरे-धीरे यह असंतोष ईर्ष्या का रूप लेने लगा, और उराँव जनजाति के प्रति दुर्भावना उत्पन्न होने लगी। कई जगहों पर यह अफवाहें फैलायी जाने लगीं कि तत्कालीन सरकार केवल उराँव जनजाति के लोगों को ही नौकरी दे रही है, और इसमें भेदभाव हो रहा है। यहाँ तक कहा जाने लगा कि ऐसी पक्षपाती सरकार को वोट नहीं देना चाहिए। असल में यह एक गहरी खीझ थी, जो शिक्षा और अवसरों के क्षेत्र में उराँव समुदाय की प्रगति को देखकर उपजी थी। एक ऐसी खीझ, जो धीरे-धीरे सामाजिक तनाव का कारण बनने लगी।
शिक्षा ने जहाँ एक ओर व्यक्तिगत उन्नति के द्वार खोले, वहीं दूसरी ओर समाज में वर्गभेद, दिखावे की प्रवृत्ति, और परस्पर दूरी भी बढ़ने लगी। युवा पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज़ों और पारंपरिक ज्ञान से कटने लगी। उराँव समाज के भीतर जो ‘आदिवासी चेतना’ एक जीवंत शक्ति थी, वह अब कई स्तरों पर केवल एक पहचान भर बनकर रह गई। प्रश्न यह भी है कि क्या शिक्षा प्रणाली केवल आर्थिक और बौद्धिक विकास को ही बढ़ावा देती है, या फिर अपनी जड़ों को जीवित रखते हुए जीना भी सिखाती है? वर्तमान में यह जनजाति शिक्षा की प्रगति और सांस्कृतिक पतन की द्वंद्वात्मक स्थिति से गुजर रही है।
आधुनिक शिक्षा के माध्यम से उराँव जनजाति ने न केवल अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाया, बल्कि प्रशासन, सेवा, और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बनाई। यह उपलब्धि आदिवासी समाज के लिए गर्व का विषय थी, परंतु शिक्षा की इस प्रगति के साथ एक गंभीर सांस्कृतिक समस्या भी उभरी है। जैसे-जैसे उराँव जनजाति के लोग शहरीकरण और बाहरी दुनिया के संपर्क में आए, उनकी पारंपरिक जीवनशैली, भाषा, बोली, रीति-रिवाज, और सामुदायिक संबंध कमजोर पड़ने लगे। यह सांस्कृतिक पतन धीरे-धीरे उनकी पहचान को खतरे में डालने लगा। उनकी परंपरागत सांस्कृतिक विरासत, जिसमें लोकगीत, लोकनृत्य, त्योहार, और पारंपरिक सामाजिक संरचनाएँ शामिल हैं, शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव से धीरे-धीरे फीकी पड़ती चली गईं। नई पीढ़ी, जो अधिकतर शहरी क्षेत्रों या शहरी शिक्षा संस्थानों में पढ़ाई कर रही है, अपनी मूल भाषा उराँव भाषा का प्रयोग कम करने लगी, इसके परिणामस्वरूप भाषा का संरक्षण संकट में है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह किसी समुदाय की सांस्कृतिक आत्मा और अस्तित्व का आधार होती है। भाषा के लुप्त होने का मतलब है उस समाज की सांस्कृतिक स्मृतियों और ज्ञान का भी नष्ट होना।
शिक्षा के माध्यम से बेहतर रोजगार और जीवन की तलाश में उराँव जनजाति के अनेक लोग अपने पारंपरिक गाँवों और संसाधनों को छोड़कर शहरों और दूर-दराज के इलाकों में पलायन कर गए। यह पलायन सामाजिक रूप से समुदाय के विखंडन का कारण बना। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक सामाजिक बंधन कमजोर हुए, और लोगों की आपसी रिश्तेदारी, मेलजोल कम हो गया। इससे सामुहिकता की भावना कमजोर हुई और कई बार सामाजिक असुरक्षा की स्थिति पैदा हुई, परंतु यह सफलता एकपक्षीय थी। शिक्षा का उद्देश्य जहाँ जीवन की समग्र समझ, सांस्कृतिक सशक्तिकरण और समुदाय की उन्नति होता है, वहीं इस समाज में यह लगभग एकमात्र लक्ष्य तक सिमट गया- सरकारी नौकरी। शिक्षा का बहुपरतीय स्वरूप केवल एक सीढ़ी में सीमित रह गया। नौकरी मिलने के बाद अधिकांश शिक्षित उराँव शहरों की ओर पलायन कर गए। गाँव बस एक स्मृति बनकर पीछे छूट गए।
आज एक-एक उराँव गाँव में 40% तक की आबादी पलायन कर चुकी है। जिन घरों में कभी फूले-फले परिवार बसते थे, वे अब खंडहरों में तब्दील हो गए हैं। खेत वीरान हैं, जिनमें कभी धान की बालियाँ झूमती थीं, अब वे झाड़-झंखाड़ से भरे पड़े हैं। गाँव का जैविक जीवन तिरोहित हो चुका है। ऐसे स्थानों पर अब प्रवासी या बाहरी समूह भी बसने लगे हैं, जिससे जनसांख्यिकी संतुलन पूरी तरह बदल गया है। जहाँ कभीउराँव बहुसंख्यक थे, आज वे सांस्कृतिक रूप से भी और जनसंख्या में भी अल्पसंख्यक हो गए हैं। शहरों में बस चुके उराँव माता-पिता ने अपने बच्चों को अपनी बोली कुड़ुख से दूर ही रखा। शिक्षा के साथ एक भ्रम जुड़ गया कि अपनी भाषा में बोलना पिछड़ेपन का प्रतीक है, परिणामस्वरूप एक पूरी पीढ़ी है जो न तो अपनी भाषा बोल सकती है, न ही अपनी परंपराओं से जुड़ाव महसूस करती है। यह केवल भाषिक नहीं, सांस्कृतिक विस्थापन ही है।
अब स्थिति यह है कि सरकारी नौकरियों में चयन अत्यधिक प्रतिस्पर्धी हो गया है। जो एक समय ‘आरक्षण के सहारे’ सुलभ प्रतीत होता था, वह अब कठिन हो चला है। उराँव समाज के बच्चे अब न तो गाँव में टिके हैं, न ही शहरी प्रतिस्पर्धा में सशक्त हैं। यह एक शून्य की स्थिति है, जिसे समाज शिखर से सीधे ढलान की ओर गिरते हुए अनुभव कर रहा है। शहरों में बस चुके इस जनजातीय समुदाय की अधिकांश नई पीढ़ी शिक्षित तो हो चुकी है, लेकिन वे अभी भी मुख्यतः सरकारी नौकरी की आस में बेरोजगारी झेल रही हैं। दुर्भाग्यवश, उनकी शिक्षा उन्हें वैकल्पिक क्षेत्रों में अवसर तलाशने के लिए प्रेरित नहीं कर पाई है, या कहें कि सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाएँ अब भी सरकारी सेवा को ही सफलता का पर्याय मानती हैं।
सरकारी नौकरियों में सीमित रिक्तियों, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बदलती नीतियों के चलते एक तरह का ‘संतृप्ति बिंदु’ आ चुका है। ऐसे में अब इस जनजाति के किसी भी साधारण युवा का सरकारी सेवा में प्रवेश करना, विशेषकर ऊँचे पदों पर पहुँचना, पहले जितना सरल नहीं रहा। यह स्थिति अब इतनी जटिल और प्रतिस्पर्धात्मक हो चुकी है कि सरकारी नौकरी में अर्श से गिरकर फर्श तक पहुँचने की आशंका कहीं अधिक यथार्थ लगती है, जबकि सफलता अब एक दुर्लभ संभावना बन चुकी है। इस तरह, जिस राह को कभी सामाजिक उन्नति का सीधा मार्ग समझा जाता था, वह अब एक दुर्गम और धुँधली गली में बदल चुकी है, जहाँ उम्मीदें तो हैं, लेकिन मंज़िल अब भी कोसों दूर है।
इसे एक दिशा का भ्रम ही कहा जा सकता है ना कि शिक्षा का दुष्परिणाम। शिक्षा स्वयं कभी घातक नहीं होती, वह तो दीप है। लेकिन जब शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी बन जाए और सामुदायिक चेतना, सांस्कृतिक मूल्य और आत्म-निर्भरता जैसे मूल बिंदु पीछे छूट जाएँ, तब वह एक खोखली इमारत बन जाती है जो पहले या बाद में गिरती ही है।
उराँव समाज के भीतर अब सामाजिक स्तरों पर विभाजन भी स्पष्ट दिखने लगे है- शिक्षित और अशिक्षित, शहरवासी और गाँववासी, ‘आधुनिक’ और ‘परंपरावादी’। शिक्षा तो एक दीपक है, लेकिन यदि वह उस मिट्टी के घर को ही जला दे, जिसमें वह जलता है, तो फिर उजाला किसके लिए? उराँव समाज की यह उलझन विकास और विरासत के बीच केवल उनकी नहीं, बल्कि हर उस समुदाय की है जो आधुनिकता की राह पर पारंपरिक आत्मा के साथ चलना चाहता है। अब प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी दूर तक पहुँचे, बल्कि यह है कि वहाँ पहुँचकर हमने अपने भीतर कितना बचा लिया। सिर्फ शिक्षा की डिग्रियाँ पाना सफलता का अंतिम प्रतिमान नहीं है; असली सफलता तब सँवरती है जब व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, अपनी भाषा, लोक परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों को संजोए। ऐसा विकास जो समाज को केवल जीवित नहीं, बल्कि जीवंत भी बनाए रखे। इस वर्ग के बुद्धिजीवियों को यह समझना होगा कि खोई हुई विरासत आसानी से नहीं लौटती, बल्कि हर रीत पुनः रचनी पड़ती है।
(रचनाकार किताब ‘तलाश’ तथा ‘द सिविल सरपेंट्स’ के लेखक हैं)