ए.एन. द्विवेदी रायपुर
बृजमोहन अग्रवाल छत्तीसगढ़ भाजपा का वह चेहरा है जो अपनी जीत तो सुनिश्चित करते ही रहे हैं। इसके अलावा पार्टी ने उन्हें जिन चुनावों की जिम्मेदारी दी उसमें शत-प्रतिशत वह सफल रहे। यह दौर वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के पूर्व तक था। वर्ष 2018 में सत्ता खोने के बाद ऐसा क्या हुआ कि साढ़े तीन सालों के अन्तराल में जिन- जिन चुनाव अथवा उपचुनाव की कमान उनको दी गई वहां भाजपा को पराजय मिलती रही, फिर वह नगरीय निकाय चुनाव ही क्यों न हो। इससे यह लगता है कि बृजमोहन अग्रवाल के चुनावी प्रबंधन की महारथ में क्षरण आ चुका है। यह केवल बृजमोहन ही नहीं अपितु भाजपा के लिए भी चिंतनीय और चिंतन का विषय है। दरअसल बृजमोहन अग्रवाल न सिर्फ नेता अपितु सत्ता और संगठन में भाजपा के लिए प्रापर्टी से कम नहीं है। अब उनके प्रबंधन में क्षरण आना भाजपा के लिए कहीं खतरे की घंटी तो नहीं। यह बात इसलिए कही जा रही है कि पार्टी को बृजमोहन के अलावा किसी और को उनका सानिध्य लेने का मौका ही नहीं दिया। जहां तक बृजमोहन अग्रवाल के राजनीतिक आरंम्भ की बात है वह बेहद उच्च स्तर का रहा है। वह छात्र राजनीति में चाहे चुनाव जीतने का प्रबंधन हो या भाजपा के संघर्ष के दिनों में भाजयुमो के एक सदस्य के रुप में रायपुर में उनकी भूमिका उस समय भी चर्चित रही। बृजमोहन उस समय भी जब छत्तीसगढ़ की राजनीति में विद्याचरण शुक्ल और स्वरुपचंद जैन और न जाने कितने बड़े नेताओं की तूती बोलती थी। तब खुद के चुनावी प्रबंधन कर वर्ष 19८९ में वे कांग्रेस के धाकड़ नेता स्वरुपचंद जैन को २८०० मतों से पराजित किया था। उस समय कांग्रेस ने उन्हें भले ही सहजता से लिया था। लेकिन अविभाजित मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने उन्हें बखूबी पहचान लिया था। इसलिए बृजमोहन को न ही टिकट दी वरण अपने मंत्रीमंडल में स्थान भी दिया था। उसके बाद से लेकर वर्ष 2018 तक चुनावी प्रबंधन के लिहाज से बेहद उज्जवल रहा। इस तरह की उच्च प्रबंधकीय राजनीतिक गुण शायद ही छत्तीसगढ़ में किसी के पास हो। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि वे अपनी चुनावी प्रबंधकीय गुण के चलते संभवत पूरे छत्तीसगढ़ में मात्र एक ऐसे नेता हैं जो अभी तक कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं हारे। इस तरह से देखा जाए तो भाजपा के चुनावी गुरु के रुप में बृजमोहन का चयन गलत नहीं रहा है। हो सकता है इसमें प्रबंधन के अलावा धन की भी बड़ी भूमिका रही हो।
तब भी बृजमोहन के कद को कम नहीं किया जा सकता। वर्ष 2018 में सत्ता खोने व निकाय चुनाव अथवा विधानसभा के उपचुनाव में वह हुनर कहीं परिलक्षित नहीं हुआ। आखिर ऐसा क्या कारण है कि बृजमोहन जैसा चुनावी जादूगर चल नहीं पा रहा है। यह बृजमोहन के साथ भाजपा के लिए भी चिंतन का विषय है। वर्ष 2018 के पहले तक का आलम यह था कि भाजपा बृजमोहन जैसे चुनावी गुरु होने को लेकर इतराती थी अब आखिर बेचारियत की स्थिति क्यों निर्मित हो गई? क्या बृजमोहन चूक गए हैं? क्या पार्टी के प्रति बृजमोहन की मेहनत में कमी आ गई है? क्या पार्टी उनको गंभीरता से नहीं ले रही? या पार्टी के भीतर उन्हें रोकने की कोशिश की जा रही है? इन सवालों का जवाब स्वयं बृजमोहन व भाजपा को खोजना होगा। लेकिन जमीनी सच्चाई यह दिखती है कि वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक लिहाज से बृजमोहन को लगातार डोमिनेट करने की कोशिश की गई। जबकि बृजमोहन अग्रवाल अपनी उड़ान को राज्य के शीर्ष पद तक ले जाने न ही कोशिश की अपितु भाजपा के बड़े नेतृत्व को यह बताने की चेष्ठा भी की। इस पर कभी गौर नहीं किया गया। हो सकता है इसलिए उनके मन में कहीं से कुण्ठा भी हो। चुनावी प्रबंधन में क्षरण का कारण रुपयों का अभाव भी हो सकता है। दरअसल भाजपा के अधिकांश नेता पार्टी से पद व पैसा तो कमाना चाहता है लेकिन जब पार्टी को देने की बारी आती है तो हाथ खीच लेते हैं। सम्भवत: बृजमोहन का चुनावी प्रबंधन विफल होने का यह भी कारण हो सकता है। बहरहाल यह सत्य है कि अब बृजमोहन अग्रवाल भाजपा के किसी भी प्रत्याशी को चुनाव जिताने के मामले में महागुरु नहीं रह गए।