सक्ती– जांजगीर-चांपा जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय में पदस्थ राज्य प्रशासनिक सेवा के ऊर्जावान अधिकारी एवं प्रसिद्ध लेखक डॉ सुमित गर्ग समय-समय पर विभिन्न अवसरों पर अपनी रचनाओं तथा पंक्तियों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं, इसी श्रृंखला में डॉ सुमित गर्ग का आगामी शिक्षक दिवस” 5 सितंबर “पर विशेष आलेख –
संस्कृत का एक प्रसिद्ध श्लोक है-
गुरूर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु ,गुरुर्देवो महेश्वरः,गुरु साक्षात् परब्रह्मा ,तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
अर्थात् गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश है अर्थात गुरु को ‘परब्रह्म ‘की संज्ञा प्रदान की गई है इससे ज्ञात होता है कि प्राचीन काल से ही भारत में गुरु का स्थान माता पिता के पश्चात सर्वोपरि रहा है।
यद्यपि भारत में शिक्षक दिवस की शुरुआत स्वतंत्रता के पश्चात प्रति वर्ष ‘5 सितंबर ‘को भारत के द्वितीय राष्ट्रपति तथा प्रथम उप राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की स्मृति में की गई कि स्वयं बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे,भारत में शिक्षक को आचार्य ,गुरु ,सर इत्यादि विभिन्न नामों से पुकारा जाता है परंतु इससे उसका अर्थ व महत्व परिवर्तित नहीं हो जाता, शिक्षक की तुलना तो एक कुम्हार से की जा सकती है कुम्हार जो कि अनगढ़ मिट्टी के टुकड़े को जिस प्रकार से एक सुंदर मूर्ति का आकार देता है ठीक उसी प्रकार शिक्षक भी अपने विद्यार्थियों के जीवन में मार्गदर्शक की भांति उन्हें सच्चे मार्ग पर प्रशस्त कर उनमें आत्मविश्वास ,लगन,उत्साह इत्यादि पैदा करता है ।शिक्षक एक दीपक की भांति अपने विद्यार्थियों के जीवन को प्रकाशित व आलोकित करने का कार्य संपादित करता है,भारत को प्राचीन काल से ही” विश्व गुरु “की संज्ञा प्रदान की गई है ,भारत रूपी इस धरती ने विश्व को महान शिक्षक एवं गुरु प्रदान किए हैं जिन्होंने अपने ज्ञान से संपूर्ण विश्व की धरा को सींचने का महान कार्य संपादित किया है उदाहरणार्थ -‘महर्षि पतंजलि’ जो कि योग दर्शन के जनक थे ,महर्षि ‘पाणिनि’ जो की महान ‘व्याकरणाचार्य’ थे ,’आर्यभट्ट ‘जिनकी गणना महान गणितज्ञ तथा ‘शून्य के खोजकर्ता’ के रूप में की जाती है ,’भास्कराचार्य’ जो कि ‘लीलावती ग्रंथ’ के जनक थे ,’धन्वंतरी ‘जो कि देवताओं के गुरु व महान चिकित्सक के रूप में प्रसिद्ध थे ,’अर्थशास्त्र’ के जनक चाणक्य जो कि ‘कौटिल्य’ के रूप में भी प्रसिद्ध थे उन्हीं के सानिध्य में चंद्रगुप्त मौर्य ने ‘मौर्य वंश’ की स्थापना की थी,आधुनिक काल में भी यदि दृष्टि डाली जाए तो रविंद्रनाथ टैगोर जिन्होंने ‘रविंद्र स्कूल’ की स्थापना की, जगदीश चंद्र बसु जो कि एक महान पादप विज्ञानी हुए, सर एपीजे अब्दुल कलाम जो कि भूतपूर्व राष्ट्रपति थे तथा ‘मिसाइल मैन ‘के नाम से विख्यात थे इत्यादि जितने नाम गिनाए जाए उतने कम है ।शिक्षकों के सम्मान में भारत सरकार द्वारा “द्रोणाचार्य पुरस्कार “खेलों के क्षेत्र में प्रदान किया जाता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा भी ‘राज्यपाल पुरस्कार’ की घोषणा की जाती है तथा प्रत्येक जिले में ‘शिक्षक सम्मान पुरस्कार ‘का समारोह का आयोजन किया जाता है,इस संबंध में कबीर दास के एक प्रसिद्ध दोहा स्मरणीय है- गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाय,बलिहारी गुरु आपने ,गोविंद दियो मिलाय।।