तीजा में बदलते हालात – मायके की यादें अब ससुराल में ही सँजो रही महिलाएँ

बलौदा बाजार। तीजा पर्व आते ही विवाहित बेटियों का मन मायके की चौखट खटखटाने को आतुर हो उठता है। बचपन से ही मायके में तीजा की तैयारियाँ, माँ की स्नेहिल झप्पी और बहनों के संग गीत–मंगल की स्मृतियाँ हर महिला के दिल को छू जाती हैं।

किन्तु इस बार हालात कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। अब जब बच्चे बड़े होकर परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं, छोटा परिवार होने से दुकान या रोज़मर्रा के काम सँभालने वाला कोई नहीं है

ऐसे में मायके जाकर तीजा मनाना संभव नहीं हो पा रहा।

महिलाएँ स्वीकार करती हैं कि मन तो आज भी मायके की गलियों में भटकता है, परंतु जिम्मेदारियों के आगे भावनाएँ ठहर जाती हैं। यही कारण है कि वे अब ससुराल में ही तीजा का व्रत और पूजन विधिवत कर रही हैं।

फिर भी, ससुराल का आँगन तीजा के गीतों और परंपरागत रस्मों से गुंजायमान हो उठा है। महिलाएँ मायके की यादों को अपने हृदय में सँजोए हुए, ससुराल के परिवार के संग मिलकर तीजा पर्व को उल्लास और श्रद्धा से मना रही हैं।

यह परिवर्तन समाज की बदलती जीवनशैली और जिम्मेदारियों की गवाही देता है, जहाँ परंपरा और आधुनिक परिस्थितियाँ साथ–साथ चल रही हैं।
तीजा पर्व का महिलाओं के जीवन में विशेष महत्व होता है। प्रायः महिलाएँ इस दिन अपने मायके जाकर तीजा मनाना पसंद करती हैं, लेकिन बदलते हालातों और परिस्थितियों ने अब इस परंपरा में भी परिवर्तन ला दिया है।

मायके जाने की आतुर लता साहू ने बताया मैं मायके जाने के लिए आतुर हूं परंतु परिस्थितियों अब बदल गई बच्चों की पढ़ाई व एवं तिमाही टेस्ट परीक्षा छोटे परिवार होने से दुकान या अन्य कार्य पर बैठने वाला कोई नहीं होने जैसी व्यावहारिक वजहों से मैं अपने ससुराल में ही तीजा मना रही हूं।
जिम्मेदारियां के बीच बदल गई तीजा की परंपरा सुमन श्रद्धानंद अग्रवाल ने बताया पहले हर साल में मायके जाती थी परंतु परिस्थितियों बदल गई बच्चे बड़े हो गए हैं जवाबदारी बढ़ गई अब ससुराल में ही रहकर तीज का पर्व में बनाती हूं
संजय श्वेता केसरवानी ने बताया ने बताया कि तीजा में मायके जाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है, परंतु अब जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ जाने से मायके जाना संभव नहीं हो पा रहा। वहीं बच्चों की पढ़ाई और व्यापारिक कार्यों की देखरेख भी प्राथमिकता बन गई है।

अजय संगीता श्रीवास ने बताया विवाह के कुछ साल तक लगातार में मायके जाते रही हूं परंतु पारिवारिक जिम्मेदारी एवं बच्चों की पढ़ाई के कारण अब मायके जाना नहीं हो पता है ससुराल में रहकर पूरे उत्साह व परंपरा के साथ तीजा का व्रत कर रही हूं और परिवार के बीच इस त्योहार की खुशियाँ बाँट रही हूं फिर भी, ससुराल का आँगन तीजा के गीतों और परंपरागत रस्मों से गुंजायमान हो उठा है। महिलाएँ मायके की यादों को अपने हृदय में सँजोए हुए, ससुराल के परिवार के संग मिलकर तीजा पर्व को उल्लास और श्रद्धा से मना रही हैं

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