स्कूली बच्चों को मिलने वाले भोजन को पोषणयुक्त बनाने के लिए बेहतर क्रियान्वयन की जरूरत

कुपोषण भारत समेत तमाम विकासशील देशों के लिए बड़ी समस्या है। देश के कुछ राज्यों में बाल कुपोषण की स्थिति गंभीर है। इसके खात्मे के लिए 1995 में मिड-डे मील योजना की शुरुआत की गई थी। अब इसका नाम बदलकर केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (पीएम-पोषण) कर दिया है। इसके जरिये अगले पांच साल में कुल 1.3 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। इसमें केंद्र सरकार करीब 54 हजार करोड़ रुपये, जबकि राज्य सरकारें 31 हजार करोड़ रुपये का योगदान देंगी। केंद्र सरकार खाद्यान्न पर लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च भी वहन करेगी।
पहले सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले कक्षा एक से आठ तक के बच्चे इस योजना का लाभ उठाने के पात्र थे, पर अब इसमें प्री-प्राइमरी (पहली कक्षा से नीचे) या बालवाटिका में पढ़ने वाले बच्चों को भी शामिल किया गया है। सरकारी स्कूलों में बालवाटिका की शुरुआत पिछले साल की गई थी। इसके तहत छह साल से छोटे बच्चों को भी औपचारिक शिक्षा में शामिल किया गया है। हालांकि आंगनबाड़ी के तहत इन बच्चों को राशन दिया जाता है, पर अब सरकार चाहती है कि इनको भी पका हुआ पोषणयुक्त भोजन दिया जाए।

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