हलचल… मुख्यमंत्री पद को लेकर खिंची तलवारें

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46 से 50 सीटों के साथ बनेगी नई सरकार

छत्तीसगढ़ राज्य में पहली बार मतदान के बाद भी किसी प्रत्याशी के हार जीत का दावा नहीं किया जा सकता। हर एक सीट में मामला नजदीकी बताया जा रहा है। चुनाव आचार संहिता के पूर्व कांग्रेस का राज्य में एकतरफा माहौल रहा। लेकिन आचार संहिता लगते ही भाजपा बगल में आ खड़ी हुई। भाजपा नेता राज्य में 50 से 52 सीटें मिलने का दावा कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस 75 पार की बात कर रही है। फिलहाल अब इस विषय पर जनता जनार्दन से अपना फैसला सुना दिया है, 3 दिसम्बर को जनता का फैसला देश-दुनिया के सामने होगा। पायनियर ने तकरीबन 6 माह पहले हलचल कामल में लिखा था कि दोनों दल की राज्य में 35-35 सीटें लगभग सुरक्षित हैं, लड़ाई सिर्फ 20 सीटों पर हैं। इन 20 सीटों पर जिसकी बढ़त होती है वही राज्य में सरकार बनाएगा। यह बात आज तकरीबन 6 माह बाद सच होते दिख रही। ताजा राजनीतिक तस्वीर कुछ ऐसी ही दिख रही है, जिसमें दोनों दलों को 35-35 सीटें सुऱिक्षत मिलते नजर आ रही हैं। वहीं 20 सीटों पर मामला नजदीकी बताया जा रहा है। ऐसे में जीत -हार का आंकड़ा काफी नजदीकी हो सकता है। कुल मिलाकर जिस भी दल की सरकार बनेगी बहुमत का आकड़ा 46 से 50 के बीच का हो सकता है।

सट्टा बाजार की खबरों ने माहौल कितना बदला?

चुनाव परिणाम पूर्व सट्टा बाजार भी अब बड़ी भूमिका निभाने लगा है। कहते हैं कि सट्टा बाजार की खबरों ने एक दल को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। राज्य में सट्टा बाजार का रुख  किसकी ओर है इसको लेकर जमकर खबरें प्रसारित हुईं। माना जा रहा है कि सट्टा बाजार की खबरों ने आम जन के बीच एक परसेप्सन बनाने का काम किया है। खैर इन बातों पर कितनी सच्चाई है यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन इस बीच एक दल को बड़ा नुकसान होने की बात कही जा रही है।

मुख्यमंत्री पद को लेकर खिंची तलवारें

3 दिसम्बर को चुनाव परिणाम सामने आ जाएंगे, कौन से दल को स्पष्ट बहुमत मिलने जा रहा है यह भी जनता के सामने आ ही जाएगा। इस बीच दोनों ही दलों में मुख्यमंत्री पद को लेकर आंतरिक रुप से तलवारें खिंच चुकी हैं। वर्तमान कार्यकाल के दौरान कांग्रेस में ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री का मसला जाकर उपमुख्यमंत्री में ठहर गया। ढाई का पांच पूरा होते ही सिंहदेव ने चुनाव परिणाम के पहले ही एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जाहिर की है। सिंहदेव ने यह भी कह दिया कि यह मेरा अंतिम चुनाव है, ऐसे में सीएम बनने की इच्छा भला उन्हें क्यों नहीं होगी? अब सिंहदेव की इच्छा पूरी होगी की नहीं फिलहाल यह तो कांग्रेस आलाकमान ही जानेंगे, लेकिन एक बात तो तय है कि ढाई-ढाई साल का विवाद अभी भी खड़ा हुआ है। शायद यही कारण है कि उपमुख्यमंत्री बनने के बाद भी सिंहदेव मुख्यमंत्री पद की दावेदारी करते नजर आते हैं। वहीं हाल भाजपा का है जिस तरह से राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं, उससे यह माना जा रहा है कि बहुमत का आकड़ा काफी नजदीकी हो सकता है। ऐसे में भाजपा को रमन सिंह की ओर एक बार फिर रुक करना पड़ सकता है। कोई नए चेहरे को लाकर भाजपा 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक कोई विवाद नहीं खड़ा करना चाहेगी। रमन सिंह यहां 15 साल मुख्यमंत्री रहे हैं, वह राज्य में भाजपा के स्वीकार्य नेता के रुप में माने जाते रहे हैं। वहीं 2023 के इस चुनाव में रमन समर्थकों की बहुलता भी दिख रही है। हालांकि भाजपा के अन्य नेता भी लगातार दिल्ली दरबार के चक्कर काट रहे हैं। कुल मिलाकर चुनाव परिणाम सामने आने के पहले ही दोनों दलों में मुख्यमंत्री पद को लेकर तलवारें खिंच चुकी हैं।

कांग्रेस के एक महंत मुश्किल में, दूसरे महंत का क्या?

राज्य में इस बार कांग्रेस की ओर से दो महंत चुनावी मैदान में थे। दोनों ही महंत की पकड़ अविभाजित जांजगीर जिले में जादा रही है। लेकिन कांग्रेस ने एक महंत को जांजगीर जिले से सीधा रायपुर शिप्ट कर दिया। जाहिर सी बात है कि दूसरे जिले से आकर राजधानी में चुनाव लडऩा महंत जी के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा। इस दौरान महंत जी यह भी तय नहीं कर पाये कि कौन से नेता की छांव उनके लिए पायदेमंद रहेगी। कांग्रेस के यह महंत फिलहाल मुश्किल में दिख रहे हैं। वहीं कांग्रेस के दूसरे महंत को शिप्ट करने कि बात तो दूर उनके बिना मर्जी के उन्हें हिलाया भी नहीं जा सकता। कबीरा खड़ा बजार में, मांगे सबकी खैर, न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर के सिद्धान्त में राजनीति करने वाले ये महंत विपरीत पस्थितियों में भी चुनाव परिणाम को अपने अनूकूल करते रहे हैं। ऐसे में उनका क्या होगा इस पर जमकर कयास लगाये जा रहे हैं। दरअसल में मंहत जी वर्तमान में जिस कुर्सी में विराजमान हैं उस कुर्सी का इतिहास कुछ ठीक नहीं रहा है। ऐसे में कांग्रेस के दूसरे महंत का क्या होगा इसको लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं।

एक गुरु की हार तो एक गुरु की जीत कैसे?

कहते हैं कि भाजपा ने मतदान के बाद फिर एक गोपनीय सर्वे काराया है जिसके बाद से भाजपा नेताओं की चाल-ढाल बदल गई है। इस सर्वे रिर्पोट के बाद भाजपा नेता अति आत्मविश्वास के साथ राज्य में सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। सर्वे में कितना दम है यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। लेकिन भाजपा कई ऐसी सीटों पर भी जीत का दावा कर रही है, जो वास्तविकता में सबको आश्चर्यचकित करने वाली हैं। कहते हैं कि इस सर्वे में कांग्रेस पार्टी के गुरु को चुनाव हारते हुए, वहीं भाजपा के गुरु को चुनाव जीतते हुए बताया जा रहा है। एक गुरु की हार, तो एक गुरु की जीत कैसे? यह तो भाजपाई ही जानेंगे। वहीं कांग्रेस भाजपा के गुरु को हारते और अपने गुरु का चुनाव जीतते बता रही है। दोनों दलों के द्वारा किए जा रहे दावे को लेकर राज्य की जनता हैरान है, जनता यह समझ नहीं पा रही कि एक गुरु की जीत, तो एक गुरु की हार कैसे हो सकती है?

कार्यालयों में पसरा सन्नाटा

राज्य में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान हो चुके हैं। परिणाम आना शेष हैं। मतदान पूर्व मंत्रालय से लेकर विभागाध्यक्षों के कार्यालयों में सन्नाटा पसरा हुआ है। अधिकारी कर्मचारी छुट्टियों के माहौल में हैं। ऐसे में आमजन के रुटीन काम भी जमकर प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि इसको लेकर लगातार मीडिया में खबरें भी प्रसाारित हुईं, लेकिन वह बेअसर दिखाई दे रहा है। ऐसा लेग रहा है कि यह रौनक अब 3 दिसम्बर के बाद ही लौटने वाली है।

आयातित नेताओं के खिलाफ जमकर आक्रोश

भारतीय जनता पार्टी ने छत्तीसगढ़ में चुनाव के दौरान अप्रत्यक्ष रूप से बाहरी नेताओं को कमान सौंपकर रखा था। मतदान संपन्न होने के बाद यह नेता तीर्थ स्थल के लिए रवाना हो गए हैं। उनके रवाना होते ही पार्टी के अंदर दबे स्वर में गुस्सा उजागर होने लगा है। मीडिया प्रबंधन को लेकर प्रत्याशियों को मुख्यालय से कोई भी सहयोग नहीं मिलने की बात सामने आई है। जिसको लेकर कई लोगों ने विरोध भी दर्ज कराया।

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