Raipur@Thethinkmedia.com
2023 में 2018 का दृश्य
छत्तीसगढ़ कांग्रेस के कद्दावर नेता टीएस सिंहदेव को आखिरी-आखिरी ही सही लेकिन
आलाकमान ने फिर एक बार नम्बर वन की लाईन में लाकर खड़ा कर ही दिया। राजनीतिक मायनों में अब सिर्फ भूपेश बघेल ही नम्बर वन नहीं हैं, उनके समकक्ष सिंहदेव को भी खड़ा कर दिया गया है। सिंहदेव अब मंत्री नहीं बल्कि उपमुख्यमंत्री हैं। भले ही यह माना जा रहा है कि सिंहदेव को यह कुर्सी चुनाव तक के लिए सौंपी गई है। लेकिन राजनीतिक रुप से इसके बड़े मायने हैं। अभी तक धावक के रुप में सिर्फ भूपेश बघेल ही नजर आ रहे थे, पर अब फिर सिंहदेव भी साथ दौडेंग़े। जाहिर सी बात है जब रेस अकेले लगाई जाए जो जीत पक्की मानी जाती है। लेकिन साथ में और भी कोई दौड़े तो उसके आगे निकलने का भय सदैव बना रहता है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में कुछ ऐसा ही होते दिखाई दे रहा। सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद 2023 में भी 2018 का दृश्य दिखाई देने लगा है।
अरण्य भवन ही नहीं, अब फील्ड में भी
जूनियर अफसर सीनियरों को हांकेंगे
ऐसा नहीं हैं कि राज्य में सीनियर आईएफएस अफसरों की कमी है। अफसरों की पर्याप्त उपलब्धता
के बाद भी प्रभारवाद का खेल इन दिनों वन विभाग में खूब फल-फूल रहा है। पहले सात अफसरों को किनारे करके वनबल प्रमुख की कुर्सी में एक जूनियर अफसर (एपीसीसीएफ) को बैठा दिया गया। देश के इतिहास में शायद यह एक अलग किस्म का निर्णय है। कहते हैं कि जब सीनियर अफसरों (पीसीसीएफ स्तर के अफसर को) स्टेनों फोन करके कहता है कि साहब याद कर रहे हैं, तो चारों ओर धुआं उठने लगता है। अब यही नजारा अरण्य भवन के साथ-साथ फील्ड में भी देखने को मिलने वाला है। डीएफओ स्तर के एक आईएफएस को रायपुर जैसे महत्वपूर्ण रेंज का प्रभारी सीसीएफ बना दिया गया है। 2008 बैच के इस अफसर के कारनामों की लंबी-चौड़ी लिस्ट है। भले ही कतिपय कारणों से रायपुर डीएफओ अभी तक सीएफ न बन पाये हों, लेकिन वह प्रभारी सीसीएफ से सीनियर हैं। विश्वेश कुमार 2007 बैच के आईएफएस अफसर हैं। और अब उन्हें नियंत्रण करने वाला अधिकारी यानी की सीसीएफ रायपुर 2008 बैच के अफसर होंगे। ऐसा निर्णय देश के अन्य स्थानों में शायद ही देखने को मिले। खैर अब अरण्य भवन के साथ-साथ फील्ड में भी जूनियर अफसर अपने सीनियरों को हांकते नजर आयेंगे।
अंगूर खट्टे हैं
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का दो साल का कार्यकाल बीतते ही राज्य में सीएम पद को लेकर विवाद खडा हो चुका था। टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल के बीच कुर्सी की खींचतान लगातार जारी है। भले ही इस बीच सिंहदेव और भूपेश राजनीतिक औपचारिकताएं निभाते रहे हों, लेकिन इन दोनो नेताओं की आपसी लड़ाई जगजाहिर हो चुकी है। कई बार सिंहदेव के ऊपर उनके ही विधायकों ने गंभीर आरोप लगाए, तो कई बार सिंहदेव नें अपने ही सरकार को आड़े हाथ लिया। आपसी लड़ाई के बीच भाजपा पिछले 2 साल से सिंहदेव की राह टकटकी लगाए देख रही थी। भाजपा नेताओं को यह आस थी कि पड़ोसी राज्य की तरह देर-सबेर वह सिंहदेव को तोडऩे में कामयाब हो जाएंगे। सिंहदेव ने भी कई नेताओं और पार्टियों से चर्चा की बात को इनकार नहीं किया था। इस बीच परिस्थितियों को भांपते हुए कांग्रेस अलाकमान ने बड़ा दांव खेला और टीएस सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बना दिया गया। भाजपा नेताओं की आस धरी की धरी रह गई। कुल मिलाकर कहा जा सकता है अंगूर खट्टे हैं।
सीनियर विधायकों और मंत्रियों की कटेगी टिकट
कांग्रेस की दिल्ली में हुई बैठक में यह बात छनकर सामने आई है कि पार्टी सीनियर विधायकों और मंत्रियों को लोकसभा चुनाव लड़ाने पर विचार कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ हुई बैठक में इस बात पर मंथन किया गया है। यदि ऐसा हुआ तो 2023 के इस विधानसभा चुनाव में आधा से अधिक मंत्रियों को टिकट शायद ही मिल पाये। इनको सम्भवत: लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनाये जाने पर विचार किया जा सकता है। वहीं जानकारों का मानना है कि इस फार्मूला के तहत हार के मुहाने में खड़े मंत्रियों को लोकसभा की दिलासा दी जा सकती है।
चौथेपन में ठग लिए गए साय?
भारतीय जनता पार्टी ने नन्दकुमार साय को क्या-क्या नहीं दिया। वे अविभाजित मध्यप्रदेश में भाजपा
के प्रदेश अध्यक्ष रहे। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद उन्हें प्रथम नेता प्रतिपक्ष बनने का गौरव मिला। वह जिस वर्ग से आते हैं, केन्द्र सरकार में उसी वर्ग के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। राज्यसभा सांसद रहे। अति वरिष्ठतम नेता का तबका उन्हें मिला हुआ था। इतने पदों पर आसीन रहने के बाद भी वह अपने आप को क्यों उपेक्षित समझते रहे यह तो स्वयं साय ही जानेंगे। लेकिन इस बीच चौथेपन में साय ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। कांग्रेस में जाने से पहले साय की बहुत सारी आकांक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं रही होंगी। लेकिन उस पर फिलहाल पानी फिरते दिख रहा है। कहते हैं कि साय एक बार फिर विधानसभा की दौड़ लगाना चाहते हैं। लेकिन कांग्रेस ने बड़ा दांव खेलते हुए साय के पैरों में रस्सी बांध दी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि साय को कांग्रेस में जाने की राजनीतिक कीमत दी जा चुकी है। अब शायद ही वह विधानसभा के लिए दौड़ लगा सकेंगे। वर्तमान हालातों को देखकर यह कहा जा सकता है चौथेपन में ठग लिए गए साय।
अफसरों का दिल्ली जाने का सिलसिला जारी
छत्तीसगढ़ में अफसरों का दिल्ली जाने का सिलसिला लगातार जारी है। खबर है कि बस्तर पुलिस अधीक्षक जितेंद्र सिंह मीणा को प्रतिनियुक्ति में जाने की मंजूरी दे दी गई है। आईपीएस मीणा की आईबी में जाने की चर्चा है। मीणा के साथ डीआईजी स्तर के अफसर राजेंद्र दास और डी श्रवण ने भी प्रतिनियुक्ति में जाने का आवेदन दिया है। इन अफसरों के प्रतिनियुक्ति को मंजूरी मिलने के बाद जल्द ही पुलिस महकमे में एक और फेरबदल होने की संभावना है।
कर्नाटक चुनाव परिणाम नें राज्य के सीनियर भाजपा नेताओं की पूछ-परख बढ़ाई
कर्नाटक चुनाव परिणाम ने छत्तीसगढ़ के सीनियर भाजपा नेताओं की एकबार फिर पूछ-परख बढ़ा दी है। 2018 के विधानसभा चुनाव में निराशाजनक परिणाम के बाद भाजपा के स्थानीय बड़े नेताओं की पूछ-परख कम हो गई थी। केंद्रीय नेतृत्व ने 2019 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान 7 बार के सांसद रहे रमेश बैस समेत सभी सांसदों की टिकट एक झटके में काट दी थी। उसके बाद से यह कयाश लगाए जा रहे थे कि 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सभी 90 सीटों में नए प्रत्याशियों को मैदान में उतार सकती है। लेकिन इस बीच कर्नाटक चुनाव परिणाम ने भाजपा की रणनीति को बदलने पर विवश कर दिया है। अब छत्तीसगढ़ में एकबार फिर सीनियर नेताओं की पूछ-परख बढ़ गई है।
editor.pioneerraipur@gmail.com