जैन कवि संगम कर्नाटक की मासिक संगोष्ठी हुई सम्पन्न

सक्ती-जैन कवि संगम-कर्नाटक की मासिक काव्य गोष्ठी रविवार सायं बसवनगुडी स्थित कुशलस् परिसर में सम्पन्न हुई, गोष्ठी के पूर्व में मुख्य अतिथि राष्ट्र गौरव डॉ. इंदुजी जैन-नई दिल्ली का स्वागत माला के द्वारा श्रीमती संगीता गुलेच्छा एवम् पुष्पगुच्छ के द्वारा श्रीमती बिंदु रायसोनी ने किया। गोष्ठी की अध्यक्षता राजेंद्र गुलेच्छा ने एवं संचालन सुनील तरुण ने अपने जाने पहचाने अन्दाज़ में किया

गोष्ठी की शुरुआत बिंदु रायसोनी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वन्दना से हुई। युवा कवि अरिहंत जैन ने “मैं ज़िंदगी के हर हुनर को सीखता ही जा रहा हूँ” कविता प्रस्तुत की। पितृ दिवस के उपलक्ष में बिंदु रायसोनी ने “आसमान से ऊँचा पिता का साया” के माध्यम से पिता के गुणों को प्रस्तुत किया,उषा जैन केडिया ने “याद आता है आज भी गुजरा ज़माना” एवं नवोदित रचनाकार रवि सामरा ने मैं भक्त हूँ इंसान का सुनाकर सबको मोहित कर दिया

जोशीले कवि हंसराज मुणोत ने “मैं भटक रहा हूँ धरती पर स्वर्ग की तलाश में” सुनाकर आज के नफ़रत भरे वातावरण पर एक चिंतन प्रस्तुत किया। नेहा जैन ने “आपसे मिलकर जिंदगी का एक पहलू ये भी जाना” के माध्यम से जीवनसाथी के बारे में अपनी भावनाएँ व्यक्त की

आशीष कोठारी की कविता का यही सार था का खुश रहकर ही खुशी पायी जाती है।हास्यकवि सुनील तरुण ने अपनेचिरपरिचित अन्दाज़ में “कितने अच्छे दिन थे जब हम छोटे बच्चे थे” सुनाकर सबकी भरपूर वाहीवाही लूटी। जैन राजेंद्र गुलेच्छा “राज” ने “हम नाप आते थे सारे गाँव की ज़मीन” कविता के माध्यम से उम्र के विभिन्न दौर का सुंदर वर्णन प्रस्तुत किया

मुख्य अतिथि इन्दु जैन ने प्रस्तुत समस्त रचनाओं पर अपनी सारगर्भित समीक्षा देने के साथ ही अपनी रचना “जब जिंदगी में सुलझने का तरीक़ा सीख लेते है, तब उलझने साथ चलना छोड़ देती है” सुनाकर भरपूर तालियाँ बटोरी,अंत में राजेंद्र गुलेच्छा द्वारा धन्यवाद अर्पण एवम् नवकार श्रवण पश्चात गोष्ठी का समापन हुआ

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