हलचल… जंगल में मोर नाचा किसने देखा, सरल होना ही सबसे कठिन है, होर्डिंगबाज नेताओं और सोशल मीडिया स्टंट से क्यों चिढीं स्मृति, मंत्रिमंडल नहीं तो काम छीनने की तैयारी?, इंटेलिजेंस चीफ की कुर्सी पर किसकी नजर?,

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होर्डिंगबाज नेताओं और सोशल मीडिया स्टंट से क्यों चिढ़ीं स्मृति

स्मृति ईरानी अपने पहले दौरे में ही मंत्रियों को राडार पर लिया। वैसे तो स्मृति ने रायपुर पहुंचने से पहले ही सभी मंत्रियों की कुंडली तैयार करवा ली थी। सभी के परफारमेंस और कमियों पर उनकी पैनी नजर है। लेकिन अपने पहले प्रवास के दौरान स्मृति ईरानी सबसे ज्यादा नाराज होर्डिंगबाज नेताओं पर हुई। इसके साथ ही सोशल मीडिया में तरह-तरह के स्टंट करने वाले मंत्रियों तथा नेताओं पर भी स्मृति जमकर भड़कीं। दरअसल सोशल मीडिया में राज्य के कई मंत्रियों और नेताओं के खाने-पीने, नाचने-गाने के साथ ही तरह-तरह की लफ्फाजी के कई वीडियो मौजूद हैं। जिस पर स्मृति ने साफ कह दिया कि सिर्फ सोशल मीडिया से काम नहीं चलेगा, फील्ड में भी सक्रियता बढ़ानी होगी। प्रभार वाले क्षेत्रों का दौरा करना पड़ेगा, वरना प्रभार छीन लिए जाएंगे। वहीं होर्डिंगबाज नेताओं को भी दो टूक कह दिया गया है ‘नो होर्डिंग्स’। खैर स्मृति ईरानी को क्या पता कि यहां एक मंत्री की एक खास होर्डिंग कंपनी से अघोषित पार्टनरशिप है। जिसके चलते मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से भी ज्यादा होर्डिंग मंत्री जी की टांगी जाती है। कहा तो यह भी जाता है कि मंत्री जी अपने विभागों से इस होर्डिंग कंपनी को मनमानी भुगतान भी कराते हैं। खैर जितने मुंह उतनी बातें, लेकिन अब एक बात तो तय है कि अगर होर्डिंगबाज नेताओं और मंत्रियों की फोटों टंगी मिली तो स्मृति का हंटर चलना तय है।

संघ के कंधे पर बंदूक रखकर सुबोध पर निशाना

सरकारी कर्तव्यों के प्रति सदैव जबावदेह रहे आईएएस अफसर सुबोध कुमार सिंह इन दिनों विरोधी अफसरों के निशाने पर हैं। दरअसल सुबोध कुमार सिंह का पीएस टू सीएम बनना कुछ अफसरों को आज भी हजम नहीं हो रहा है। इसकी प्रमुख वजह है जितना पॉवर उतनी लड़ाई। सुबोध सिंह की सीएम सचिवालय में एन्ट्री से कई अफसरों की मनमानी पर लगाम लग गई है। जिसके कारण संघ के कंधे में बंदूक रखकर कुछ अफसर सुबोध सिंह पर निशाना लगाने का प्रयास कर रहे हैं। कहा तो यह भी जाता है कि भाजपा प्रभारी स्मृति ईरानी से भी सुबोध कुमार सिंह की शिकायत करवाई गई है। खैर सुबोध के पास सीएम सचिवालय में काम करने का लंबा अनुभव है, वह अपने विरोधियों का खामोशी से सामना करना जानते हैं।

मंत्रिमंडल नहीं तो काम छीनने की तैयारी?

उपमुख्यमंत्री अरुण साव की भाजपा सरकार में कभी नबंर दो की राजनीतिक हैसियत हुआ करती थी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के बाद अरुण साव का ओहदा था। लेकिन अब वक्त बदलता दिख रहा है, अरुण साव से कहीं उपर वित्त मंत्री ओपी चौधरी का कद हो चुका है। शायद इसीलिए अरुण साव से मंत्रिमंडल तो नहीं छीना गया, लेकिन उनके विभागों से काम छीने जा रहे हंै। दरअसल राज्य में सड़कों, सार्वजनिक भवनों, पुल-पुलिया, खेल परिसर आदि का निर्माण अभी तक पीडब्ल्यूडी विभाग करते रहा है। जाहिर सी बात है, भारी-भरकम बजट वाले पीडब्ल्यूडी विभाग के मंत्री अरुण साव हैं। लेकिन अब सड़क, पुल-पुलिया, सार्वजनिक भवन, खेल परिसर आदि का निर्माण हाउसिंग बोर्ड करेगा। यह ऐलान स्वयं वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने किया है। हाउसिंग बोर्ड आवास एवं पर्यावरण विभाग के आधीन है, जिसके मंत्री स्वयं ओपी चौधरी हैं। निश्चित तौर पर यदि ओपी चौधरी अपने इस योजना में कामयाब होते हैं तो यह अरुण साव से मंत्रिमंडल छीनने जैसा निर्णय माना जाएगा।

इंटेलिजेंस चीफ की कुर्सी पर किसकी नजर?

एडीजी अमित कुमार वर्तमान में राज्य के इंटेलिजेंस चीफ हैं। लेकिन अब उनकी कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा है। दरअसल कुछ दिन पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने आईपीएस अमित कुमार सहित अन्य कुछ अफसरों के खिलाफ एक मामले में गलत तथ्य और साक्ष्य पेश करने के आरोप में शिकायत दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला उस समय का है जब अमित कुमार सीबीआई में पदस्थ थे। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद छत्तीसगढ़ में आईपीएस अफसरों का एक खेमा अमित कुमार के पीछे लग गया है। विरोधी खेमा को यह भली-भांति मालूम है कि यदि अमित कुमार के खिलाफ यह मामला तूल पकड़ लिया तो कुर्सी की राह आसान हो जाएगी।

जंगल में मोर नाचा किसने देखा

जंगल में मोर नाचा किसने देखा, यह कहावत लगता है छत्तीसगढ़ के वन विभाग के लिए ही बनाई गई है। दरअसल बीते कुछ वर्षों में नक्सलवाद कीे आड़ में वन विभाग में जमकर धांधली की गई। इस धांधली के उजागर होने के बाद वन विभाग के वर्तमान अफसर माथा पीट रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में करोड़ों रुपये समेटकर अफसर यहां से रवाना हो गए, लेकिन किसी को भनक तक नहीं लगी। मार्च 2026 के पहले नक्सलियों के भय से लोग इंद्रावती टाइगर रिजर्व न के बराबर जाते थे, लेकिन 2 साल में यहां 100 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च करने का मामला सामने आया है। अब यह राशि कहां खर्च की गई है, यह तो तत्कालीन अफसर ही बता पायेंगें। हद तो यह हो गई कि इसके लिए न ही कोई टेंडर किये गए और न ही किसी को कार्यादेश दिया गया। सीधा मजदूरों के नाम से नगद भुगतान दिखा कर करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे कर दिया गया है।

सरल होना ही सबसे कठिन है

सत्ता का नशा ऐसा होता है, जिसे हर कोई नहीं पचा पाता। दरअसल सत्ता आते ही लोग अपना मूल खो बैठते हैं, वही असली पतन का कारण होता है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और डॉ. रमन सिंह राज्य के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनके ऊपर सत्ता कभी हावी नहीं हुई। सत्ता और आपार राजनीतिक ताकत होने के बाद भी पहले डॉ. रमन सिंह सरल और सहज बने रहे, अब सीएम विष्णुदेव साय इसके सबसे बड़े उदाहरण हंै। किसी राज्य का मुख्यमंत्री भला इतना सरल और सहज कैसे हो सकता है? यह लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहता है। दरअसल आज की राजनीति में सरल होना ही सबसे कठिन काम है। यह कठिन काम पहले डॉ. रमन सिंह ने कर दिखलाया, नतीजन 15 साल वह मुख्यमंत्री बने रहे। नंदकुमार साय, रमेश बैस, सरोज पांडे, बृजमोहन अग्रवाल जैसे धुर विरोधी नेता, रमन सिंह की सहजता के आगे ढ़ेर हो गए। अब बारी विष्णुदेव की है यहां खुला विरोध तो नहीं है, लेकिन कुछ नेताओं में सत्ता की चाह और अतिमहत्वाकांक्षा स्वाभाविक है। लेकिन विष्णुदेव के पास सबसे बड़ा अस्त्र उनकी सहजता है, जो वर्तमान में किसी अन्य नेता के पास नहीं है। शायद यही कारण है कि पहले फ्रंट लाइन में तीन कुर्सियां लगाई जाती थीं, अब सिर्फ एक।

 

न्यायपालिका और कार्यपालिका आमने-सामने

विष्णु सरकार में अभी तक सबसे विवादित कलेक्टरों में आईएएस अजीत वसंत का नाम शामिल हो चुका है। वसंत ईमानदार हो सकते हैं, लेकिन उनके काम नीति संगत नहीं माने जाते। यही कारण है कि उन्हें कोरबा से हटा दिया गया था। कोरबा का मामला ठंडा नहीं हुआ कि वसंत सीधा न्यायपालिका से भिड़ गए हैं। आईएएस अजीत वसंत ननकीराम कंवर से दो-दो हाथ करने के बाद अब सरगुजा डिस्ट्रिक जज से भिड़ गए हैं। दरअसल कलेक्टर अजीत वसंत सरगुजा के रिंगबांध जमीन फर्जीवाडा मामले के मुख्य आरोपी को जमानत दिए जाने से इतने नाराज हुए कि उन्होंने सीधा डिस्ट्रिक जज को पत्र लिख दिया। वसंत का कहना है कि कोर्ट ने बिना सरकारी पक्ष सुने आरोपी को जमानत दे दी है। बसंत के इस पत्र के बाद उनके कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। यदि जमानत गलत तरीके से दी गई है, तो अपील की जा सकती है, हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है, जमानत कैंसल करने की याचिका लगाई जा सकती है। लेकिन न्यायपालिका के निर्णय पर इस तरह कार्यपालिका का भिडऩा कितना उचित है? कुल मिलाकर वसंत ईमानदार हो सकते है, लेकिन उनकी समझदारी पर सवाल उठना लाजमी है।

राज्योत्सव के बाद कलेक्टरों की सूची

तकरीबन आधा दर्जन कलेक्टरों की ट्रांसफर लिस्ट राज्योत्सव के बाद जारी होने की संभावना है। दरअसल यह माना जा रहा था कि कुछ नगर निगमों और नगर पालिकाओं में होने वाले चुनाव के मद्देनजर यह लिस्ट दिसंबर तक रोक दी जाएगी। लेकिन एक बार फिर चर्चा शुरु हो गई है कि इन कलेक्टरों की ट्रांसफर लिस्ट राज्योत्सव के बाद कभी भी जारी की जा सकती है। हालांकि इस बीच दीवाली त्योहार भी है, लेकिन सरकारी कामकाज में त्योहार कोई खास अड़चन नहीं मानी जाती। इसलिए जल्द ही यह लिस्ट जारी की जा सकती हैै।

 

editor.pioneerraipur@gmail.com

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