नई दिल्ली । वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट का अनुमान लगाने के लिए चर्चित अर्थशास्त्री नौरियल रूबिनी ने भारत की आर्थिक विकास दर और रोजगार सृजन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। ‘डॉक्टर डूम’ के नाम से मशहूर रूबिनी का मानना है कि भारत के पास दुनिया की प्रमुख आर्थिक सफलता की कहानी बनने की क्षमता है, लेकिन इसके लिए देश को अपनी आर्थिक वृद्धि की रफ्तार बढ़ाने के साथ युवाओं के लिए पर्याप्त और बेहतर रोजगार के अवसर भी पैदा करने होंगे।
द इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में रूबिनी ने कहा कि भारत के लिए लगभग सात प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर पर्याप्त नहीं है। युवाओं को अच्छी नौकरियां उपलब्ध कराने के लिए देश को आर्थिक विकास दर लगभग नौ प्रतिशत तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।
भारत के पास बड़ी आर्थिक शक्ति बनने का अवसर
रूबिनी के अनुसार, भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, प्रतिभाशाली युवा आबादी और मजबूत आर्थिक आधार जैसी कई खूबियां हैं। इनका सही इस्तेमाल करके देश लंबे समय तक आर्थिक विकास की ऊंची दर हासिल कर सकता है।
हालांकि, उन्होंने यह भी संकेत दिया कि केवल अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ना पर्याप्त नहीं है। विकास का वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा, जब उसके साथ रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और अधिक लोगों को बेहतर आजीविका मिल सकेगी।
भारत के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बढ़ती कामकाजी आबादी के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना है। यदि अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती है, लेकिन रोजगार उसी अनुपात में नहीं बढ़ते, तो देश की युवा आबादी से मिलने वाला आर्थिक लाभ सीमित रह सकता है।
चीन से बाहर जा रही कंपनियां भारत के लिए अवसर
दुनिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरण और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आ रहे बदलाव भारत के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन पर अपनी विनिर्माण निर्भरता कम करने के लिए दूसरे देशों में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के विकल्प तलाश रही हैं।
इस बदलाव का लाभ भारत के साथ वियतनाम जैसे देशों को भी मिल सकता है। भारत का बड़ा उपभोक्ता बाजार, उपलब्ध श्रमशक्ति और औद्योगिक विस्तार की संभावनाएं विदेशी निवेश आकर्षित करने में मददगार हो सकती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन निर्माण और अर्धचालक उद्योग ऐसे क्षेत्र हैं, जहां भारत को विनिर्माण क्षमता बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, इस अवसर को वास्तविक निवेश और रोजगार में बदलने के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे, कुशल श्रमिकों, प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत और अनुकूल कारोबारी माहौल की आवश्यकता होगी।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में रोजगार बड़ी चुनौती
रूबिनी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के बढ़ते प्रभाव के बीच रोजगार सृजन के महत्व पर भी जोर दिया। नई तकनीक कई क्षेत्रों में काम करने के तरीकों को बदल रही है। इससे कुछ कामों की जरूरत कम हो सकती है, जबकि नए कौशल और नए प्रकार की नौकरियों की मांग बढ़ सकती है।
भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह बदलाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यदि पर्याप्त रोजगार नहीं बनते, तो बड़ी कामकाजी आबादी अपने आर्थिक और सामाजिक विकास की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाएगी।
ऐसे में सरकार और उद्योगों के सामने चुनौती केवल आर्थिक वृद्धि बनाए रखने की नहीं, बल्कि ऐसे क्षेत्रों को विकसित करने की भी है, जहां बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल सके।
विनिर्माण क्षेत्र बन सकता है रोजगार का बड़ा माध्यम
रूबिनी के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की क्षमता रखता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा, वाहन और अन्य औद्योगिक उत्पादों के निर्माण से कारखानों में सीधे नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
इसके अलावा, उत्पादन बढ़ने से परिवहन, भंडारण, कच्चे माल की आपूर्ति, पैकेजिंग और वितरण जैसे सहायक क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।
प्रौद्योगिकी और पेशेवर सेवाओं के कई क्षेत्रों में विशेष कौशल की आवश्यकता होती है, जबकि कुछ विनिर्माण उद्योग अलग-अलग शैक्षणिक और कौशल स्तर वाले लोगों को काम देने में सक्षम हैं। इसलिए औद्योगिक विकास रोजगार के अवसरों को व्यापक बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
आर्थिक विकास के साथ रोजगार पर भी देना होगा ध्यान
रूबिनी की टिप्पणी भारत के आर्थिक विकास के सामने मौजूद एक महत्वपूर्ण प्रश्न को रेखांकित करती है—क्या तेज आर्थिक वृद्धि पर्याप्त संख्या में अच्छी नौकरियां भी पैदा कर पाएगी?
भारत को वैश्विक विनिर्माण निवेश आकर्षित करने, युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने, उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने और नई तकनीकों के अनुरूप कार्यबल तैयार करने पर ध्यान देना होगा।
कुल मिलाकर, रूबिनी का आकलन है कि भारत के पास वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति मजबूत करने का बड़ा अवसर है। लेकिन इस क्षमता को वास्तविक सफलता में बदलने के लिए आर्थिक विकास की ऊंची दर के साथ रोजगार सृजन को भी प्राथमिकता देनी होगी। लगभग नौ प्रतिशत विकास दर का उनका सुझाव इसी व्यापक चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करता है।