नई दिल्ली | रूस के साइबेरिया में एक 28 वर्षीय लैब रिसर्चर की मौत के बाद प्लेग को लेकर चिंता बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेलेखोव स्थित एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़ी महिला की मौत के बाद करीब 200 लोगों को निगरानी में रखा गया है। हालांकि, उसकी मौत की आधिकारिक वजह और प्लेग संक्रमण की पुष्टि को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
इस घटना ने एक बार फिर उस बीमारी की याद दिला दी है, जिसे इतिहास में ‘काली मौत’ के नाम से जाना जाता रहा है। भारत भी इस बीमारी का भयावह दौर देख चुका है। 1896 में मुंबई से शुरू हुआ प्लेग का प्रकोप कई दशकों तक देश के अलग-अलग हिस्सों में मौत का कारण बना। बाद के वर्षों में 1994 में सूरत और बीड, 2002 में हिमाचल प्रदेश और 2004 में उत्तराखंड में भी प्लेग के मामले सामने आए।
1896 में मुंबई से शुरू हुआ था बड़ा प्रकोप
भारत में आधुनिक दौर के बड़े प्लेग प्रकोपों में सबसे प्रमुख शुरुआत 1896 में तत्कालीन बॉम्बे यानी आज की मुंबई से हुई थी। उस समय शहर में घनी आबादी, व्यापारिक गतिविधियां और बंदरगाह के कारण संक्रमण फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थीं।
ऐतिहासिक अध्ययनों के मुताबिक, 1898 से 1949 के बीच ब्रिटिश भारत में प्लेग से जुड़ी 1.3 करोड़ से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं। मुंबई भी इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुआ। एक अध्ययन के अनुसार, 1896 में प्लेग पहुंचने के बाद अगले 16 वर्षों में अकेले मुंबई में करीब 1.46 लाख लोगों की मौत हुई।
उस समय बीमारी की वैज्ञानिक समझ सीमित थी। संक्रमण रोकने के लिए घरों की तलाशी, मरीजों को अलग करना और संक्रमित सामान को नष्ट करने जैसे सख्त कदम उठाए गए। इन उपायों के कारण लोगों में बीमारी के साथ-साथ प्रशासन को लेकर भी असंतोष पैदा हुआ।
1994 में सूरत में फिर लौटा प्लेग
कई दशकों तक बड़े प्रकोप के बाद 1994 में प्लेग ने एक बार फिर देश में चिंता पैदा कर दी। महाराष्ट्र के बीड जिले में ब्यूबोनिक प्लेग के मामले सामने आए, जबकि गुजरात के सूरत में न्यूमोनिक प्लेग के मामले मिले।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के रिकॉर्ड के मुताबिक, उस दौरान भारत में 876 चिकित्सकीय रूप से पुष्ट मामले दर्ज किए गए और 52 लोगों की मौत हुई।
सूरत में बीमारी की खबर फैलने के बाद बड़े पैमाने पर अफरातफरी मच गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 5 लाख लोग शहर और आसपास के इलाकों से बाहर चले गए। भारत से आने वाले यात्रियों को लेकर दूसरे देशों में भी चिंता देखी गई।
हालांकि, बाद की जांच में यह भी सामने आया कि बीमारी को लेकर फैली अफवाह और वास्तविक संक्रमण के स्तर में काफी अंतर था। फिर भी 1994 की घटना ने साफ कर दिया कि प्लेग पूरी तरह अतीत की बीमारी नहीं बना है।
2002 में हिमाचल, 2004 में उत्तराखंड में मामले
फरवरी 2002 में हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के हाटकोटी गांव में न्यूमोनिक प्लेग के मामले सामने आए। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इस दौरान 16 मामले और 4 मौतें दर्ज हुईं।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की निगरानी की और संक्रमण को रोकने के लिए जरूरी दवाएं दीं। साथ ही प्रभावित इलाके में चूहों और पिस्सुओं पर नियंत्रण के उपाय किए गए।
इसके करीब दो साल बाद अक्टूबर 2004 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के डांगुड़ गांव में ब्यूबोनिक प्लेग का छोटा प्रकोप सामने आया। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यहां 8 मामले सामने आए और 3 लोगों की मौत हुई। करीब 1,250 लोगों को संक्रमण से बचाव के लिए दवा दी गई और लगभग दो सप्ताह में प्रकोप को नियंत्रित कर लिया गया।
2004 के बाद भारत में मानव प्लेग के किसी बड़े प्रकोप की रिपोर्ट सामने नहीं आई है।
प्लेग क्या है और कैसे फैलता है?
प्लेग एक गंभीर जीवाणु संक्रमण है, जो Yersinia pestis नाम के बैक्टीरिया से होता है। इसका प्राकृतिक चक्र मुख्य रूप से छोटे स्तनधारी जानवरों और उनके शरीर पर मौजूद संक्रमित पिस्सुओं के बीच चलता है।
संक्रमित पिस्सू के काटने से बैक्टीरिया इंसान के शरीर में पहुंच सकता है। संक्रमित जानवर के ऊतक या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में आने से भी संक्रमण हो सकता है।
प्लेग के तीन प्रमुख रूप माने जाते हैं:
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ब्यूबोनिक प्लेग: इसमें तेज बुखार, कमजोरी और लसीका ग्रंथियों में दर्दनाक सूजन हो सकती है।
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न्यूमोनिक प्लेग: यह फेफड़ों को प्रभावित करता है। इसमें खांसी, सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द और तेज बुखार जैसे लक्षण हो सकते हैं। यह संक्रमित व्यक्ति की सांस या खांसी से निकलने वाली बूंदों के जरिए फैल सकता है।
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सेप्टिसेमिक प्लेग: इसमें बैक्टीरिया खून में फैल जाता है और शरीर के कई अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
क्या आज भी प्लेग जानलेवा है?
प्लेग आज भी गंभीर बीमारी है, लेकिन 19वीं सदी जैसी स्थिति नहीं है। आधुनिक एंटीबायोटिक दवाओं, बेहतर स्वच्छता, निगरानी और संक्रमण नियंत्रण व्यवस्था ने इसके इलाज और रोकथाम को काफी बेहतर बनाया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, इलाज न मिलने पर ब्यूबोनिक प्लेग में मृत्यु दर 30 से 60 प्रतिशत तक हो सकती है। वहीं न्यूमोनिक और सेप्टिसेमिक प्लेग इलाज के बिना तेजी से जानलेवा हो सकते हैं।
हालांकि, समय पर बीमारी की पहचान और उचित एंटीबायोटिक उपचार मिलने पर मरीज को बचाया जा सकता है। इसलिए संदिग्ध मामले में इलाज शुरू करने में देरी न करना महत्वपूर्ण है।
प्लेग से बचाव कैसे करें?
प्लेग से बचाव के लिए चूहों और पिस्सुओं के संपर्क को कम करना जरूरी है। घर और आसपास कचरा जमा न होने दें और ऐसी परिस्थितियां न बनने दें जहां चूहे आसानी से पनप सकें।
अगर किसी इलाके में बड़ी संख्या में चूहे या अन्य छोटे जानवर मृत मिलें, तो उन्हें नंगे हाथों से न छुएं और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों को इसकी जानकारी दें।
पालतू कुत्तों और बिल्लियों में पिस्सुओं की रोकथाम भी जरूरी है। इसके लिए पशु चिकित्सक की सलाह ली जा सकती है।
अगर किसी इलाके में न्यूमोनिक प्लेग का संदिग्ध मामला सामने आता है, तो स्वास्थ्य अधिकारियों की सलाह का पालन करना और संक्रमित व्यक्ति के अनावश्यक निकट संपर्क से बचना जरूरी है।
क्या रूस की घटना से भारत को चिंता करनी चाहिए?
रूस में सामने आई मौजूदा घटना को लेकर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। इसलिए अभी इसे प्लेग का पुष्ट प्रकोप मानना जल्दबाजी होगी।
हालांकि, यह घटना याद दिलाती है कि Yersinia pestis बैक्टीरिया दुनिया से पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यह कुछ क्षेत्रों में जानवरों और पिस्सुओं के बीच प्राकृतिक रूप से मौजूद रह सकता है।
भारत का इतिहास भी बताता है कि प्लेग को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन आज देश के पास बीमारी की पहचान, निगरानी, संक्रमण नियंत्रण और उपचार के पहले की तुलना में कहीं बेहतर साधन मौजूद हैं।
इसलिए रूस की घटना को लेकर घबराने के बजाय वैज्ञानिक जानकारी, स्वास्थ्य अधिकारियों की सलाह और समय पर चिकित्सा जांच पर भरोसा करना सबसे जरूरी है।