यूपी 2027 में चिराग पासवान की एंट्री, दलित राजनीति में क्यों बढ़ी हलचल? अयोध्या से मिल्कीपुर तक बदलते समीकरण

लखनऊ । उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी वक्त है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी बीच लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने यूपी के चुनावी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है। 28 सितंबर को प्रयागराज में आयोजित एक कार्यक्रम में चिराग ने कहा कि उनकी पार्टी 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ेगी और संगठन सभी 403 विधानसभा सीटों के लिए तैयारी कर रहा है। हालांकि, चुनाव में पार्टी कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी और उसका गठबंधन किसके साथ होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

चिराग की यूपी एंट्री ऐसे समय हुई है जब राज्य की दलित राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चा तेज है। 2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद का नतीजा, उसके बाद मिल्कीपुर उपचुनाव और अब चिराग पासवान की सक्रियता—इन तीनों घटनाक्रमों ने गैर-जाटव दलित राजनीति को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

यूपी में दलित वोट इतना महत्वपूर्ण क्यों?

2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों की आबादी राज्य की कुल आबादी का करीब 20.7 प्रतिशत थी। लेकिन दलित समुदाय एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है। जाटव, पासी, वाल्मीकि, कोरी, खटीक, धोबी और दूसरे समुदायों की सामाजिक स्थिति और क्षेत्रीय मौजूदगी अलग-अलग है।

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का पारंपरिक सामाजिक आधार मुख्य रूप से जाटव समुदाय से जुड़ा रहा है। वहीं, गैर-जाटव दलित समुदायों का राजनीतिक समर्थन अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों के बीच बंटता रहा है।

यही सामाजिक विविधता यूपी की चुनावी राजनीति में दलित वोट को एक महत्वपूर्ण लेकिन जटिल मुद्दा बनाती है।

2024 में फैजाबाद ने क्यों खींचा ध्यान?

2024 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद सीट से समाजवादी पार्टी के अवधेश प्रसाद ने बीजेपी के लल्लू सिंह को 54,567 वोटों से हराया था। अवधेश प्रसाद को 5,54,289 वोट मिले, जबकि लल्लू सिंह को 4,99,722 वोट हासिल हुए।

फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में अयोध्या भी शामिल है। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के कुछ ही महीनों बाद इस सीट पर बीजेपी की हार ने राजनीतिक विश्लेषण में खास चर्चा पैदा की।

अवधेश प्रसाद पासी समुदाय से आते हैं। चुनाव के बाद कई राजनीतिक विश्लेषणों में पासी मतदाताओं की भूमिका पर चर्चा हुई, लेकिन किसी एक समुदाय के मतदान व्यवहार का आधिकारिक जातिवार आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने के कारण इन दावों को पूरे समुदाय के वोटिंग पैटर्न का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

मिल्कीपुर में आया अलग नतीजा

फैजाबाद लोकसभा क्षेत्र में आने वाली मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर फरवरी 2025 में उपचुनाव हुआ। बीजेपी ने चंद्रभानु पासवान को उम्मीदवार बनाया, जबकि समाजवादी पार्टी ने अजीत प्रसाद को मैदान में उतारा।

चंद्रभानु पासवान ने जीत दर्ज की। इस नतीजे ने यह जरूर दिखाया कि अयोध्या क्षेत्र में एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच स्थानीय उम्मीदवार और राजनीतिक परिस्थितियां तस्वीर बदल सकती हैं।

इसलिए 2024 के फैजाबाद लोकसभा परिणाम और 2025 के मिल्कीपुर उपचुनाव को एक ही सामाजिक वोटिंग ट्रेंड का सीधा प्रमाण मानना सावधानी की मांग करता है।

अब चिराग पासवान की एंट्री क्यों महत्वपूर्ण है?

चिराग पासवान की पार्टी का पारंपरिक आधार बिहार में पासवान यानी दुसाध समुदाय के बीच रहा है। अब एलजेपी (रामविलास) उत्तर प्रदेश में संगठन विस्तार की तैयारी कर रही है।

प्रयागराज में चिराग ने कहा कि उनकी पार्टी 2027 में यूपी विधानसभा चुनाव लड़ेगी। उन्होंने सभी 403 सीटों के लिए तैयारी की बात कही और यह भी स्पष्ट किया कि गठबंधन होने पर पार्टी गठबंधन के तहत और गठबंधन नहीं होने पर अपने दम पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है।

इस घोषणा के बाद यूपी की दलित राजनीति में चिराग की संभावित भूमिका को लेकर चर्चा बढ़ गई है।

पासी और पासवान एक नहीं हैं

चिराग की एंट्री को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखना जरूरी है। उत्तर प्रदेश का पासी समुदाय और पासवान यानी दुसाध समुदाय अलग सामाजिक समुदाय हैं।

इसलिए बिहार में पासवान समुदाय के बीच चिराग पासवान की राजनीतिक पहचान को सीधे उत्तर प्रदेश के पासी या दूसरे गैर-जाटव दलित समुदायों के समर्थन के बराबर नहीं माना जा सकता।

चिराग के सामने यूपी में संगठन खड़ा करने, स्थानीय नेतृत्व विकसित करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच राजनीतिक आधार बनाने की चुनौती भी होगी।

सिर्फ दलित राजनीति नहीं, युवाओं पर भी फोकस

प्रयागराज के कार्यक्रम में चिराग पासवान ने युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाने पर भी जोर दिया। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और राजनीति में युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे उठाए।

उन्होंने युवाओं की समस्याओं के लिए एक पोर्टल बनाने और राष्ट्रीय युवा आयोग की दिशा में पहल करने की बात भी कही।

इससे संकेत मिलता है कि यूपी में पार्टी की रणनीति को केवल जातीय पहचान तक सीमित रखने के बजाय युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश भी की जा रही है।

बीजेपी के लिए क्या मायने रखती है चिराग की एंट्री?

एलजेपी (रामविलास) का यूपी में उतरना बीजेपी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम है क्योंकि पार्टी एनडीए का हिस्सा है। हालांकि, चिराग की पार्टी का चुनाव लड़ना अपने आप में बीजेपी के लिए किसी निश्चित वोट ट्रांसफर या चुनावी परिणाम का संकेत नहीं है।

इसके अलावा एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर भी आने वाले समय में बातचीत महत्वपूर्ण होगी। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, यूपी 2027 से पहले बीजेपी के सहयोगी दल भी विधानसभा सीटों को लेकर अपनी मांगें रख रहे हैं और चिराग की पार्टी भी संभावित सीट हिस्सेदारी चाहती है।

विपक्षी खेमे में भी सीटों को लेकर हलचल

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच भी 2027 के लिए सीट बंटवारे को लेकर चर्चा जारी है। कांग्रेस ने कम से कम 150 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से ज्यादा सीटों पर तैयारी के संकेत सामने आए हैं।

यानी यूपी का अगला विधानसभा चुनाव सिर्फ बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले तक सीमित नहीं रहने वाला है। छोटे दलों, सहयोगी पार्टियों और अलग-अलग सामाजिक समूहों की राजनीतिक रणनीतियां भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती हैं।

क्या चिराग बनेंगे बीजेपी के ‘ब्रह्मास्त्र’?

चिराग पासवान को बीजेपी के लिए ‘ब्रह्मास्त्र’ बताना फिलहाल एक राजनीतिक आकलन होगा, स्थापित तथ्य नहीं। उनकी पार्टी पहली बार यूपी में व्यापक स्तर पर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है और उसका वास्तविक प्रभाव उम्मीदवारों, संगठन, गठबंधन और सीटों के चयन के बाद ही ज्यादा स्पष्ट होगा।

फिलहाल इतना जरूर है कि चिराग पासवान की एंट्री ने यूपी की दलित राजनीति में एक नया राजनीतिक दावेदार जोड़ दिया है। 2024 के फैजाबाद नतीजे और 2025 के मिल्कीपुर उपचुनाव ने अयोध्या क्षेत्र में दलित राजनीति को लेकर अलग-अलग संकेत दिए हैं। अब 2027 से पहले यह देखना अहम होगा कि बीजेपी, समाजवादी पार्टी, बसपा और नए राजनीतिक दावेदार इन सामाजिक समूहों तक किस तरह पहुंच बनाते हैं।

चुनाव अभी दूर है। इसलिए चिराग पासवान की पार्टी कितनी सीटों पर लड़ेगी, किसके साथ गठबंधन करेगी और उसे कितना समर्थन मिलेगा—इन सवालों का जवाब फिलहाल भविष्य की राजनीतिक गतिविधियों पर निर्भर करेगा।

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