नई दिल्ली | देश के महानगरों के साथ-साथ अब छोटे शहरों में भी मध्यम वर्ग (मिडिल क्लास) के लिए कम बजट में घर खरीदना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। रियल एस्टेट बाजार में 50 से 70 लाख रुपये तक के बजट वाले नए घरों के विकल्प तेजी से कम हो रहे हैं, और डेवलपर्स का पूरा ध्यान प्रीमियम व लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर शिफ्ट हो गया है।
प्रमुख बिंदु:
-
किफायती घरों की भारी कमी: रियल एस्टेट कंसल्टेंसी नाइट फ्रैंक के आंकड़ों के अनुसार, देश के आठ बड़े शहरों में साल 2018 में किफायती घरों (अफोर्डेबल हाउसिंग) की हिस्सेदारी लगभग 52% थी, जो वर्ष 2026 तक घटकर मात्र 15% रह गई है। इसके उलट 1 करोड़ रुपये या उससे महंगे घरों की हिस्सेदारी 14% से बढ़कर 62% से अधिक हो गई है।
-
बढ़ती मांग और आबादी का दबाव: भारत की शहरी आबादी में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और आज करीब 37% भारतीय शहरी क्षेत्रों में रह रहे हैं, जिसके 2030 तक बढ़कर 40% होने का अनुमान है। हालांकि, इस बढ़ती मांग के मुकाबले किफायती घरों की आपूर्ति बेहद कम है।
-
क्यों गायब हो रहे हैं बजट वाले घर?
-
जमीन की बढ़ती लागत: डेवलपर्स को बाजार भाव पर महंगी जमीन खरीदनी पड़ रही है, जिससे लागत काफी बढ़ गई है।
-
निर्माण खर्च में इजाफा: महामारी और भू-राजनीतिक तनावों (जैसे रूस-यूक्रेन व ईरान युद्ध) के कारण सीमेंट, स्टील और श्रम की लागत में 25-30% की बढ़ोतरी हुई है।
-
मुनाफे का अंतर: प्राइवेट बिल्डर प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स पर 25-30% तक का मुनाफा कमाते हैं, जबकि किफायती आवासों में यह प्रॉफिट मार्जिन केवल 10-12% ही रह जाता है।
-
रेगुलेटरी बाधाएं: जमीन के उपयोग में बदलाव (Land Use Conversion) और विभिन्न सरकारी मंजूरियों में लगने वाला लंबा समय भी प्रोजेक्ट्स की लागत को बढ़ा देता है।
-
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार मध्यम आय वर्ग के लिए रियायती दरों पर जमीन उपलब्ध कराए और प्रक्रिया को सरल बनाए, तो मिडिल क्लास के लिए अपने घर का सपना फिर से साकार हो सकता है।