महाराष्ट्र | महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (UCC) के नियमों का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति से एक बड़ी खबर सामने आई है। बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरसी चव्हाण ने कमिटी के काम करने के तौर-तरीकों से असंतुष्ट होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने समिति की अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस रंजना देसाई को अपना इस्तीफा ईमेल के जरिए भेज दिया है।
बैठकों में जल्दबाजी और ‘बाहरी’ व्यक्ति पर सवाल
जुलाई 2026 में महाराष्ट्र सरकार ने UCC के लिए 7 सदस्यीय समिति का गठन किया था, जिसमें जस्टिस चव्हाण भी शामिल थे। अपने इस्तीफे में उन्होंने आरोप लगाया है कि समिति की बैठकों में महत्वपूर्ण मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा किए बिना ही उन्हें जल्दबाजी में खत्म कर दिया जाता था।
इसके साथ ही उन्होंने एक बैठक के दौरान समिति के दायरे से बाहर के किसी व्यक्ति की उपस्थिति पर भी गंभीर आपत्ति जताई। कटाक्ष करते हुए उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि उस व्यक्ति को समिति में शामिल करना ही है, तो उनके इस्तीफे से खाली हुई जगह पर सरकार उसकी नियुक्ति कर सकती है।
‘हां या ना’ वाले क्वेश्चनेयर पर असंतोष
जस्टिस चव्हाण ने समिति द्वारा तैयार की गई प्रश्नावली (Questionnaire) पर भी असहमति जताई। उनके मुताबिक, समिति के कुछ सदस्यों ने प्रश्नों के स्वरूप में सुधार और प्रोफेशनल रिव्यू का सुझाव दिया था, ताकि जनता से विवाह, परिवार और उत्तराधिकार जैसे संवेदनशील मुद्दों पर विस्तृत राय मिल सके।
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लेकिन चेयरपर्सन द्वारा जो प्रश्नावली लाई गई, उसमें उत्तरों को केवल ‘हां या ना’ (Yes or No) तक सीमित कर दिया गया था।
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जस्टिस चव्हाण का मानना था कि इससे उन नागरिकों के लिए कोई गुنجाइश नहीं बचती, जो इन जटिल विषयों पर विस्तार से अपने विचार रखना चाहते थे। इन्हीं सब बातों से नाराज होकर वह बैठक से बाहर आ गए थे।
उनके अनुसार कैसा होना चाहिए UCC?
इस्तीफे के बाद पूर्व जज जस्टिस चव्हाण ने साझा किया कि उनके दृष्टिकोण से एक आदर्श UCC का ड्राफ्ट कैसा होना चाहिए:
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जेंडर न्यूट्रल कानून: कानून महिला और पुरुष दोनों के लिए समान होना चाहिए, जिसमें ‘पति-पत्नी’ या ‘बेटा-बेटी’ की जगह ‘जीवनसाथी’ (Spouses) और ‘बच्चे’ (Children) जैसे शब्दों का प्रयोग हो।
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धर्म से निरपेक्ष: UCC को किसी भी धर्म के निजी तौर-तरीकों में अनावश्यक दखल देने से बचना चाहिए।
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समान संपत्ति अधिकार: संपत्ति और विरासत में सभी वारिसों को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार मिलने चाहिए।
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स्वैच्छिक समझौते का अधिकार: बालिग और अपनी मर्जी से रिश्ता बनाने वाले लोगों को आपसी सहमति से अपने रिश्तों की शर्तें, सेपरेशन और बच्चों की जिम्मेदारी तय करने की छूट मिलनी चाहिए।
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बच्चों के अधिकार: हर बच्चे को वैध माना जाना चाहिए और 18 साल की उम्र तक माता-पिता (या गोद लेने वाले) को उनके पालन-पोषण का खर्च उठाना अनिवार्य होना चाहिए।
जस्टिस चव्हाण ने स्पष्ट किया कि अब समिति से अलग होने के बाद वह एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में इस राष्ट्रीय मुद्दे पर खुलकर अपने विचार रख सकेंगे।