सोनम वांगचुक ने केंद्र को दी चेतावनी, लद्दाख की मांगों पर बोले- ‘अब आंदोलन का रास्ता खुलेगा’

नई दिल्ली |  लद्दाख की राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को लेकर केंद्र सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच 9 सितंबर को दिल्ली में अहम बैठक हुई. बातचीत से समाधान की उम्मीद थी, लेकिन बैठक के बाद पर्यावरणविद और लद्दाख की मांगों के प्रमुख चेहरों में शामिल सोनम वांगचुक ने निराशा जाहिर की.

बैठक के बाद वांगचुक ने तंज कसते हुए कहा, “चाय अच्छी थी, लेकिन आगे कुछ नहीं बढ़ा.” उन्होंने दावा किया कि बैठक में जिन मुद्दों पर चर्चा हुई, उनमें से ज्यादातर पहले भी उठाए जा चुके हैं और कोई ठोस प्रगति नहीं हुई.

क्या चाहते हैं लद्दाख के प्रतिनिधि?

लद्दाख के प्रतिनिधि लंबे समय से चार प्रमुख मांगें उठा रहे हैं—

  • लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए.
  • संविधान की छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा मिले.
  • लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीटें और लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं की व्यवस्था हो.
  • स्थानीय लोगों को राजनीतिक अधिकार और अपने क्षेत्र से जुड़े फैसले लेने में ज्यादा भूमिका मिले.

बैठक में क्या हुआ?

वांगचुक के मुताबिक, पिछली बैठक में केंद्र की ओर से एक ड्राफ्ट तैयार करने की बात कही गई थी. लद्दाख के प्रतिनिधियों ने उस ड्राफ्ट में शामिल किए जाने वाले जरूरी मुद्दों की सूची भी दी थी. लेकिन 9 सितंबर की बैठक में ऐसा कोई ठोस ड्राफ्ट सामने नहीं आया.

वांगचुक ने कहा कि बैठक के लिए लद्दाख के प्रतिनिधियों ने अपनी प्रस्तावित पदयात्रा को फिलहाल टाल दिया था. उनका कहना है कि अगर बातचीत के जरिए समाधान निकलता है तो आंदोलन की जरूरत नहीं होगी, लेकिन मौजूदा स्थिति से वे संतुष्ट नहीं हैं.

केंद्र ने रखा Article 371(K) का प्रस्ताव

बैठक में केंद्र सरकार की ओर से लद्दाख के लिए संविधान में एक नया प्रावधान Article 371(K) जोड़ने का प्रस्ताव सामने आने की बात कही गई है. प्रस्ताव के तहत लद्दाख में सीधे चुनी जाने वाली एक UT-स्तरीय संस्था को कुछ विधायी अधिकार देने की चर्चा है.

इन अधिकारों में जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों को शामिल किए जाने की बात है.

हालांकि, लद्दाख के प्रतिनिधियों की मुख्य चिंता इस बात को लेकर है कि प्रस्तावित संस्था के पास वास्तविक अधिकार कितने होंगे. उनका जोर सिर्फ कागजी अधिकारों पर नहीं, बल्कि कार्यकारी, बजटीय और प्लानिंग से जुड़े अधिकारों पर भी है.

पुलिस और कानून-व्यवस्था पर भी सवाल

सोनम वांगचुक का कहना है कि चुनी हुई संस्था के पास अधिकारियों से ज्यादा अधिकार होने चाहिए. वह पुलिस और कानून-व्यवस्था जैसे अहम विषयों पर भी स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका चाहते हैं.

केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच इन मुद्दों पर अभी सहमति नहीं बनी है. बताया जा रहा है कि प्रस्तावित संवैधानिक प्रावधान के ड्राफ्ट पर अक्टूबर के पहले सप्ताह में आगे चर्चा हो सकती है.

एक हफ्ते में स्पष्टता की उम्मीद

वांगचुक ने संकेत दिया है कि अगर सरकार की तरफ से जल्द कोई ठोस प्रस्ताव या स्पष्टता नहीं आती है, तो लद्दाख में फिर से आंदोलन और पदयात्रा का रास्ता अपनाया जा सकता है.

उन्होंने 19 से 24 सितंबर के बीच प्रस्तावित पदयात्रा का भी जिक्र किया और लोगों से समर्थन की अपील की.

2019 के बाद से जारी है विवाद

अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था. हालांकि, लद्दाख को विधानसभा नहीं दी गई. इसके बाद से ही स्थानीय संगठन राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक सुरक्षा और अधिक स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं.

फिलहाल केंद्र की ओर से Article 371(K) का प्रस्ताव एक संभावित संवैधानिक मॉडल के तौर पर सामने आया है, लेकिन लद्दाख के प्रतिनिधि इसकी शक्तियों और अधिकारों को लेकर स्पष्टता चाहते हैं.

अक्टूबर में होने वाली अगली बातचीत इस पूरे मामले में अहम मानी जा रही है. अब नजर इस बात पर होगी कि प्रस्तावित ड्राफ्ट में लद्दाख की मांगों को कितनी जगह मिलती है और क्या केंद्र और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच किसी ठोस समाधान पर सहमति बन पाती है.

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