सरहुल-करमा की थाप पर झूमा लोकरंग पर्व, सरगुजा-जशपुर की आदिवासी संस्कृति ने मोहा मन

रायपुर। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं, लोककलाओं और सांस्कृतिक विरासत को मंच देने वाले तीन दिवसीय ‘लोकरंग पर्व’ का मंगलवार को रंगारंग समापन हुआ। पर्व का अंतिम दिन सरगुजा-जशपुर अंचल की आदिवासी लोकसंस्कृति के नाम रहा। पहली बार लोकरंग पर्व के मंच पर जशपुर अंचल के सरहुल और करमा नृत्य की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

पारंपरिक वेशभूषा, लोकधुनों की मधुरता और कलाकारों के ऊर्जावान नृत्य ने पूरे माहौल को उत्साह और उमंग से भर दिया। प्रकृति, आदिवासी जीवन और सामुदायिक परंपराओं से जुड़े इन लोकनृत्यों के जरिए दर्शकों को जनजातीय अंचलों की सांस्कृतिक विविधता से रूबरू होने का अवसर मिला।

सरहुल-करमा ने बिखेरा आदिवासी संस्कृति का रंग

जशपुर के विजय कुमार भगत के दल ने सरहुल और करमा नृत्य की प्रस्तुति दी। कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति, पारंपरिक लय और आकर्षक वेशभूषा ने दर्शकों का खूब ध्यान खींचा।

इसके अलावा रायपुर के डॉ. रामनारायण नेताम ने आदिवासी लोकगीत एवं नृत्य प्रस्तुत किया। दुर्ग के नवलदास मानिकपुरी ने लोकगीत-संगीत से माहौल को सुरमय बनाया। भिलाई की आरती बारले ने पंथी नृत्य की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति देकर जमकर तालियां बटोरीं।

रायपुर की रमादत्त जोशी की नाचा-गम्मत प्रस्तुति ने हास्य, मनोरंजन और लोकनाट्य के रंगों से समापन समारोह को और जीवंत बना दिया।

‘लोककलाओं को मंच देना सांस्कृतिक जिम्मेदारी’

समापन अवसर पर संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने कहा कि छत्तीसगढ़ के सुदूर जनजातीय अंचलों सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए स्थानीय कलाकारों ने अपनी लोककलाओं की शानदार प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन कलाकारों को प्रतिभा प्रदर्शित करने के साथ प्रोत्साहन और सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने कहा कि लोकरंग पर्व जैसे आयोजन छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम हैं। लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य और पारंपरिक कलाओं के माध्यम से युवा अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ते हैं। ऐसे आयोजनों से विलुप्त होती लोकविधाओं के संरक्षण और संवर्धन को भी बढ़ावा मिलता है।

तीन दिनों में दिखी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता

तीन दिनों तक चले लोकरंग पर्व में प्रदेश के विभिन्न अंचलों की लोकसंस्कृति, लोकगायन और लोकनृत्य की विविध परंपराओं को मंच मिला। अंतिम दिन सरहुल, करमा, आदिवासी लोकगीत, पंथी और नाचा-गम्मत जैसी प्रस्तुतियों ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता की शानदार तस्वीर पेश की।

समापन कार्यक्रम में संस्कृति एवं पुरातत्व संचालक डॉ. संजय कन्नौजे, कवि मीर अली मीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं छायाकार दीपेंद्र दीवान, साहित्यकार विजय मिश्रा, फिल्म बोर्ड की सदस्य प्रसन्ना अवस्थी और समाजसेवी उदयभान चौहान सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

लोकरंग पर्व का अंतिम दिन दर्शकों के लिए छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को करीब से अनुभव करने का अवसर बना। कलाकारों की प्रस्तुतियों पर दर्शकों ने तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया। आयोजन ने लोककलाकारों को मंच देने के साथ प्रदेश की लोकपरंपराओं को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संदेश दिया।

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