नई दिल्ली । 14 वर्ष तक के बच्चों को दी जाने वाली सेक्युलर और धार्मिक शिक्षा से जुड़े संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता, निगरानी और मॉनिटरिंग की मांग को लेकर दायर याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान जस्टिस अरविंद कुमार ने याचिकाकर्ता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय को मौजूदा मामले में उचित कानूनी उपाय अपनाने की सलाह दी।
‘अच्छे केस को खराब मत करो’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि इस मामले में नई रिट याचिका दायर करने के बजाय अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करना उचित होगा। अदालत ने बताया कि याचिकाकर्ता पहले भी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुके हैं और कोर्ट संबंधित अधिकारियों को उनकी शिकायत पर दो महीने के भीतर विचार करने का निर्देश दे चुकी है।
अश्विनी उपाध्याय ने अदालत को बताया कि आदेश के बावजूद करीब तीन महीने बीत गए, लेकिन अधिकारियों ने उनकी अर्जी पर कोई निर्णय नहीं लिया। इसी आधार पर उन्होंने नई रिट याचिका दाखिल की थी।
‘यह रिट एक मिनट भी नहीं टिकेगी’
जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि जब अदालत पहले ही संबंधित अधिकारियों को कार्रवाई के निर्देश दे चुकी है और उसका पालन नहीं हुआ है, तो अवमानना याचिका के जरिए अदालत के सामने आदेश के अनुपालन का मुद्दा उठाना उचित कानूनी रास्ता है।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि ऐसी स्थिति में नई रिट याचिका शुरुआती स्तर पर ही खारिज हो सकती है। जस्टिस कुमार ने याचिकाकर्ता को सलाह देते हुए कहा कि अपने अच्छे मामले को अनावश्यक कदम उठाकर कमजोर नहीं करना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की, “आपको कभी भी सेल्फ-गोल नहीं करना चाहिए।”
TET और अल्पसंख्यक संस्थानों का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान अश्विनी उपाध्याय ने संविधान के अनुच्छेद 26 और 30 तथा अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) लागू करने जैसे व्यापक मुद्दे उठाने की कोशिश की। हालांकि, अदालत ने कहा कि इन मुद्दों का वर्तमान मामले से सीधा संबंध नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पक्ष में पहले से आदेश मौजूद है और फिलहाल आवश्यकता उस आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित कराने की है।
याचिका वापस लेने की मिली अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने अश्विनी उपाध्याय को मौजूदा याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। साथ ही उन्हें कानून के तहत उचित उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी गई। अदालत के आदेश में भी दर्ज किया गया कि याचिका वापस लेने की अनुमति के साथ याचिकाकर्ता उपलब्ध कानूनी उपाय अपना सकता है।