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शालिनी रैना का प्रस्ताव खारिज, मायने क्या?
अरण्य भवन में इन दिनों कुर्सी को लेकर जमकर जोड़-तोड़ जारी है। राज्य में कांग्रेस की सरकार रहते हुए भाजपा विधायकों ने विधानसभा और सांसदों ने लोकसभा में कई बार वनबल प्रमुख व्ही श्रीनिवास राव की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल खड़े किये, कई गंभीर आरोप भी लगाए गए। पुरानी सरकार ही नहीं बल्कि सुशासन वाली विष्णु सरकार में भी राव कटघरे में हैं। सरकार ने राज्य के युवाओं को रोजगार देने वनरक्षकों की भर्ती निकाली, जिसे आज तक मूर्त रुप नहीं दिया जा सका। इस भर्ती में नियमों को अनदेखा किया गया, जिसको लेकर व्ही श्रीनिवास राव पर गंभीर आरोप लगे हैं। नतीजन आज भी राज्य के युवा सरकारी नौकरी के लिए चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन कहते हैं कि जिससे साधते बने वो सब साध लेता है, संभवत: श्रीनिवास राव ने यहां भी साध लिया। इस बीच अपने प्रतिद्वंदी पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ अरुण पांडे की पकड़ कमजोर करने के लिए श्रीनिवास राव ने आईपीएस आनंद छाबडा की पत्नी एपीसीसीएफ शालिनी रैना को बजट की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव शासन को भेजा, लेकिन सरकार ने उसे खारिज कर दिया। फिलहाल इसके मायने क्या हैं? इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन यह जरुर कहा जा सकता है कि सरकार ने नए हेड ऑफ फॉरेस्ट की तलाश शुरु कर दी है।
महंत की केमिस्ट्री
वैसे तो डॉ. चरणदास महंत की केमिस्ट्री भाजपा के ज्यादातर नेताओं से जमती है। लेकिन इस बार बजट सत्र में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह की अनुउपस्थिति में सभापति का दायित्व संभाल रहे भाजपा विधायक धरमलाल कौशिक और डॉ महंत की केमिस्ट्री की खूब चर्चे हो रहे हैं। दरअसल सत्र के दौरान एक दिन नेता प्रतिपक्ष डॉ चरणदास महंत ने सभापति धरमलाल कौशिक को कहा कि आप सदन में आते हैं, तो हमारे तरफ नजरें इनायत ही नहीं करते। जिस पर सभापति कौशिक ने तपाक से जवाब दिया कि ऐसा बिलकुल नहीं है, मैं आपकी तरफ देखते और प्रणाम करते हुए आता हूं। वहीं इस बीच भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष और सभापति जी दोनो मैचिंग ड्रेस पहने हुए हैं, उसके बाद भी नजरें इनायत नहीं? तब महंत ने साफ कर दिया कि हम पहले भी मिलते-जुलते रहे हैं। खैर इसे व्यंग्य समझा जाए या गंभीर राजनीतिक अर्थ निकाले जाएं? फिलहाल महंत ने इस फैसले को जनता पर छोड़ दिया है। लेकिन महंत के व्यंग्य बताते हैं कि भाजपा के ज्यादातर नेताओं से उनकी केमिस्ट्री आज भी बढिय़ा है।
फिर आक्रामक राजनीति की ओर भूपेश?
बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष डॉ चरणदास महंत से ज्यादा सक्रिय पूर्व सीएम भूपेश बघेल नजर आ रहे हैं। सत्ताधारी दल के विधायक सदन में भूपेश बघेल को यह कहते नजर भी आये कि आपने नेता प्रतिपक्ष के दायित्वों को हाईजेक कर लिया है। खैर इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच पूर्व सीएम भूपेश बघेल का कान्फीडेंस लेवल काफी बढ़ा हुआ नजर आ रहा है। उन्होनें सरकार को घेरने के साथ-साथ पत्रकारों को भी घेरने में कोताही नहीं बरती। दरअसल इन दिनों पुलिस ने कई जिलों से अवैध अफीम की खेती का भांडाफोड़ किया है, उसमें से एक भाजपा नेता का भी नाम सामने आया है। जिस पर भूपेश बघेल ने मीडिया के सामने खुलकर कहा कि आप लोग अब यह क्यों नहीं छापते कि वह अफीम का खेती करने वाला नेता किसका करीबी है? भूपेश यहीं नहीं रुके उन्होंने यह भी कहा कि मेरे मुख्यमंत्री रहते हुए भी मीडिया में खबरें छपती थीं, कि अमुक व्यक्ति मेरा करीबी हैं, अब आप लोग क्यों साहस नहीं जुटा पा रहे हैं? खैर भूपेश बघेल के हर एक शब्द के पीछे राजनीति छिपी होती है, यहां उनकी मंशा क्या है? फिलहाल कुछ कहना उचित नहीं है। लेकिन भूपेश बघेल इन दिनों एक बार फिर आक्रामक राजनीति करते नजर आ रहे हैं।
जंबूरी में हेराफेरी और जेम पोर्टल
विगत कुछ माह पहले राज्य में आयोजित जंबूरी का मामला विधानसभा में जमकर गूंजा। वहीं विभागीय मंत्री के जवाब ने अघोषित रुप से जेम पोर्टल पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं। दलअसल स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने विधानसभा में बताया कि जेम पोर्टल के माध्यम से जंबूरी के लिए टेंडर किया गया था और जेम पोर्टल में किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं हो सकता। हालांकि अभी तक आम लोगों की धारणा भी यही रही है कि जेम पोर्टल में किसी भी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं हो सकता। लेकिन जंबूरी की हेराफेरी और आयोजन के दौरान प्रकाशित खबरों, तथ्यों और मंत्री के वक्तव्य ने जेम पोर्टल पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां जेम पोर्टल को भी भ्रष्टाचार का माध्यम बना दिया गया है। वरना टेंडर से पहले ही कोई ठेकेदार भला कैसे काम प्रारम्भ कर देगा? खैर सच क्या है? यह तो जांच का विषय है, लेकिन जंबूरी की हेराफेरी ने जेम पोर्टल को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है।
धर्मांतरण पर कानून
छत्तीसगढ विधानसभा का बजट सत्र संभवत: 18 मार्च को समाप्त हो जाएगा। इसी दिन राज्य सरकार धर्मांतरण पर विधेयक पेश कर सकती है। इसके लिए कैबिनेट में प्रारुप को भी मंजूरी मिल चुकी है। दरअसल राज्य में धर्मांतरण एक बड़ा विषय बनकर सामने आया है, जिसको लेकर लगातार कठोर कानून की मांग की जाती रही है, जिस पर मुहर लगने के संकेत है। कहा जा रहा है कि प्रारुप में धर्मांतरण को लेकर कठोर सजा का प्रावधान है। जिससे इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।
मंत्री ने नहीं दी रकम
वैसे तो इसके पहले पयर्टन मंत्री राजेश अग्रवाल पर रकम न देने के आरोप कभी नहीं लगे। राजनीति में कुछ माह पहले तक अक्सर उनके द्वारा रकम ज्यादा देने के चर्चे होते रहे हैं। पर अभी उन पर एक कथावाचक ने रकम न देने का आरोप लगाते हुए आत्मदाह करने की धमकी दी है। दरअसल कथा वाचक ने यह आरोप लगाया है कि उनके द्वारा श्रीमद् भागवत का वाचन किया गया था जिसके लिए 15 लाख रुपये उन्हें नहीं दिए गए हैं। खैर मंत्री राजेश अग्रवाल के लिए 15 और 25 अंक काफी शुभ बताया जाता है। लेकिन अब वह 15 से परहेज क्यों कर रहे हैं? फिलहाल इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता। कथावाचक के आरोप सच हैं या झूठ? यह भी जांच का विषय है। दरअसल बताया जा रहा है कि कथावचक ने संस्कृति विभाग से 15 लाख रुपये अनुदान देने का लिखित आग्रह किया था। लेकिन मंत्री ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि इस तरह के आयोजन के लिए अनुदान का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि वक्त-वक्त की बात है कभी एक कद्दावर नेता के संस्कृति मंत्री रहते हुए हनुमान पाठ के लिए भी भुगतान के चर्चे होते रहे हैं।
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