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राजनीति की अफीम
राज्य में नशाखोरी किस हद तक सर चढ़कर बोल रहा है कि एक भाजपा नेता ही इस कारोबार में कूद गए हैं। अभी तक ड्रग्स और अफीम की अवैध स्मगलिंग और सप्लाई के कारनामे उजागर होते रहे हैं। लेकिन यह कारनामा अब काफी आगे बढ़ चुका है। अवैध नशाखोरी के कारोबार के पूरे रिकार्ड ध्वस्त हो गए हैं। यहां अवैध सप्लाई और स्मगलिंग का झंझट ही नहीं, सीधा अवैध उत्पादन शुरु कर दिया गया। पुलिस ने जो खुलासे किए है वह हैरान और परेशान करने वाले हैं। भाजपा नेता के फार्म हाउस में तकरीबन 9 एकड़ में अफीम की खेती की जा रही है। समाचार पत्रों में लहलहाती अफीम की खेती की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह अफीम की खेती रातों-रात लहलहा गई? आखिर इसके बीज कब और किसने रोपे? अफीम की खेती का असली रखवाला कौन है? राज्य को बर्बाद करने वाली यह खेती क्या राजनीति की खेती बनकर रह जाएगी? या फिर इस खेती को खाद-पानी देने वाले असली गुनाहगारों तक पुलिस पहुंचेगी? बहरहाल इसका खुलासा निकट भविष्य में हो जएगा।
ड्रग्स की राजनीति
ड्रग्स की बात सामने आये और उसमें राजनीति न हो ऐसा संभव नहीं है। छत्तीसगढ़ में कुछ माह पहले नव्या मलिक नाम की लड़की अवैध ड्रग्स को लेकर चर्चे में रही। नव्या मलिक को ड्रग्स क्वीन का तबका दे दिया गया। खैर वह क्वीन है या फिर दलाल यह जांच का विषय है। लेकिन इन दिनों अफीम की राजनीति के साथ ही ड्रग्स की राजनीति भी देखने और सुनने को मिल रही है। नव्या मलिक और उससे जुड़े लोगों की खोज में पुलिस की दिलचस्पी हो या न हो, लेकिन विपक्ष नव्या को खोजते-खोजते विधानसभा तक पहुंच गया है। विधानसभा में भी नव्या मलिक के कारनामे गंूजते रहे। हालांकि जवाब और उस दरम्यान मीडिया में प्रकाशित खबरों में काफी भिन्नताएं सुनने को मिलीं, जिस पर विपक्ष ने आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए। लेकिन इन तमाम आरोपों और राजनीति के बीच यह सवाल आज भी खड़ा है कि कथित ड्रग्स दलाल नव्या मलिक के संपर्क में आये उन 850 लोगों से पूछताछ हुई क्या? ड्रग्स रैकेट के पीछे होटल, पब और क्लब संचालकों की भूमिका क्या है? इसका खुलासा हुआ क्या? दिल्ली, मुंबई और पंजाब कनेक्शन का खुलासा हुआ क्या? आखिर इस ड्रग्स और अफीम की राजनीति का सच क्या है?
साव के विभाग में साय का असंतोष

डिप्टी सीएम अरुण साव के पास अहम विभाग पीडब्ल्यूडी को लेकर इस समय मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय काफी असंतोष व्यक्त कर रहे हैं। समीक्षा बैठक के दौरान सीएम का यह असंतोष मीडिया और पब्लिक तक भी तेजी से पहुंच चुका है। सीएम के इस असंतोष के बाद डिप्टी सीएम साव के विभागों पर उंगली उठने लगी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव यह खुले तौर पर मान रहे हैं कि सड़क और निर्माण कार्य के चलते सरकार की छवि खराब हो रही है। वास्तव में राज्य में निर्माण और सड़कों की स्थिति काफी खराब है और यह जनता को सीधा प्रभावित करने वाले विषय भी हैं। इसलिए निश्चित ही सीएम विष्णुदेव साय की चिंता वाजिव है। लेकिन क्या उनके मंशा अनुरुप इस विभाग में सुधार हो पायेगा, फिलहाल यह तो आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जाएगा। हालांकि नगरीय निकाय को और पीएचई भी लगातार कटघरे में हैं। जल-जीवन मिशन में विवादों का नाता थमने का नाम नहीं ले रहा। प्रधानमंत्री की घर-घर तक जल पहुंचाने की योजना छत्तीसगढ़ में किस तरह चल रही है यह किसी से छिपी नहीं है। वहीं निकायों में अफसरों की मनमानी को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहते हैं। खैर डिप्टी सीएम होने के बाद भी यदि अरुण साव के विभागों में सीएम को असंतोष व्यक्त करना पड़ रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? इस पर मंथन और चिंतन की जरुरत है।
भाजपा ने फिर दिया संदेश
भाजपा ने राज्यसभा सीट और निर्वाचन के बीच फिर चौकाने वाला लेकिन साफ संदेश दिया है। दरअसल छत्तीसगढ़ से राज्यसभा के लिए कई दिग्गज नेताओं का नाम सुर्खियों में रहा। जिसमें दो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष प्रेमप्रकाश पांडे और गौरीशंकर अग्रवाल समेत भाजपा नेत्री सरोज पांडे का नाम प्रमुख रुप से उभरकर सामने आया था। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने राज्य मंत्रिमण्डल की तरह यहां भी चौंकाने वाला निर्णय लिया और राज्यससभा के लिए नए प्रत्याशी लक्ष्मी वर्मा के नाम का ऐलान कर दिया। दरअसल यह सिर्फ राज्यसभा का निर्वाचन नहीं है, यह पार्टी द्वारा दिया गया साफ तौर पर संदेश है कि अब ज्यादातर मंच में नए कार्यकर्ताओं को ही अवसर प्रदान किए जाएंगे, ताकि आने वाले दौर में भी भाजपा सशक्त बनी रहे।
कांग्रेस फिर गुटबाजी की ओर

छत्तीसगढ़ कांग्रेस का गुटबाजी से पुराना नाता है, जिसके आगे भी बरकरार रहने के आसार हैं। दरअसल बीते कुछ वर्षों में राज्य कांग्रेस में दो धड़ा उभरकर सामने आया है। जिसमें प्रमुख रुप से पूर्व सीएम भूपेश बघेल और दूसरा प्रमुख नाम पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव का है। हालांकि सिंहदेव खेमा भूपेश बघेल के मुख्यमंत्री रहते हुए काफी कमजोर हुआ है। खैर अब भूपेश न ही सीएम हैं और सिंहदेव न ही कमजोर। दरअसल इस गुटबाजी को समाप्त करने का एक अवसर पार्टी के पास था उसे कांग्रेस ने गवां दिया। राज्यसभा के लिए भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, मोहन मरकाम और दीपक बैज के नाम प्रमुख रुप से सामने आ रहे थे। लेकिन अंत में एक बार फिर उच्च सदन में कांग्रेस की महिला सदस्यों की कमी के कारण फूलोदेवी नेताम पर मुहर लगा दी गई। दरअसल पूर्व सीएम भूपेश बघेल ने राज्यसभा जाने के लिए पहले ही मना कर दिए थे। वहीं सिंहदेव ने भी दिल्ली की राजनीति में ही रुचि दिखाई है। ऐसे में एक बार फिर कांग्रेस चुनावी साल में गुटबाजी और खेमेबाजी की राजनीति करते नजर आ सकती है। वहीं फूलोदेवी नेताम अब दूसरी महिला नेत्री बन गई हैं जो दूसरी बार राज्यसभा जा रही है। इसके पूर्व मोहसिना किदवई दो बार राज्यसभा सांसद रह चुकी हैं।
डॉ. रमन की कमी खलती नजर आ रही
छततीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र चल रहा है, लेकिन स्वास्थगत कारणों से इस बार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह अध्यक्षीय आसन में विराजमान नहीं दिख रहे। हालांकि स्पाइन सर्जरी के बाद डॉ. रमन सिंह राजधानी वापस आ गए है, लेकिन फिलहाल वह सत्र में अभी भी नजर नहीं आयेंगे। चिकित्सकों की सलाह पर अभी वह आराम करेंगे। वहीं डॉ. रमन सिंह की अनुपस्थिति में सभापति के रुप में भाजपा विधायक धरमजीत सिंह और धरमलाल कौशिक सत्र का संचालन करते नजर आते हैं। लेकिन सत्र में विधायकों को कहीं न कहीं डॉ. रमन सिंह की कमी खलती नजर आ रही है। डॉ. रमन सिंह सदन में नए सदस्यों का अक्सर संरक्षण करते नजर आते थे। गंभीर विषयों पर सत्ता पक्ष हो या विपक्ष दोनों में संतुलन बनाकर जनहित की बात को प्राथमिकता देने में भी डॉ. रमन परहेज नहीं करते। संभवत: यही कारण है कि उनकी अनुपस्थिति कहीं न कहीं इस बार विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के सदस्यों को भी खल रही है।
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