हलचल… अब डाकुओं को भी सुरक्षा

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जवाबदार कौन?

जवानों के लिए उनके सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं होता। लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि जवानों की वीरता और साहस के लिए दिए जाने वाला पुलिस वीरता पदक छत्तीसगढ़ को नहीं मिला। यहां का कोटा शून्य रहा। जबकि बीते साल में सेना और पुलिस के जवानों ने अदम्य साहस दिखाकर खूंखार से खूंखार नक्सलियों को धराशयी कर दिया। जवानों ने तकरीबन 286 नक्सलियों को मार गिराया। जवानों ने कई बड़े आपरेशन किए, जिसमें नक्सलवाद के खिलाफ बड़ी सफलता मिली है। लेकिन यहां किसी भी जवान को पदक नहीं मिला। आखिर इसका कारण क्या है? आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? ऐसे तमाम सवाल इन दिनों आम जनता के जेहन में घूम रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि जिले से पुलिस अधीक्षकों ने समय रहते बहादुर जवानों की सूची बनाकर पुलिस वीरता पदक के लिए फाइल पीएचक्यू भेज दी थी। वहीं पीएचक्यू से यह फाइल गृह विभाग भेजी गई। इसके बाद इसे केन्द्रीय गृह मंत्रालय भेजना था पर समय पर नहीं भेजा गया। संभवत: इसलिए यहां के जवान इस पदक से वंचित रह गए। खैर वास्तविक कारण क्या है? यह तो जांच का विषय है। लेकिन इसका असली जवाबदार कौन है? इसका खुलासा होना चाहिए।

अब डाकुओं को भी सुरक्षा

आम तौर पर छत्तीसगढ़ राज्य एक शांतप्रिय राज्य है। यहां डाकुओं को कभी कोई स्थान नहीं दिया गया और न ही किसी ने अब तक डाकुओं की सुरक्षा का ठेका लिया। लेकिन अब राज्य सरकार के पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने डाकुओं को भी सुरक्षा प्रदान करने की बात कही है, या यूं कहें कि वह डाकुओं की सुरक्षा का भी अब ख्याल रखेंगे। क्या यह वाजिब है? राज्य सरकार के एक जवाबदार मंत्री के बयान का समाज में क्या असर होगा? क्या किसी ने इसकी कल्पना की है? खैर मंत्री जी नए हैं यहां तक ठीक है, लेकिन मंत्री जी गैर-जवाबदार हैं यह कतई उचित नहीं। दरअसल सोशल मीडिया में वायरल हो रहे एक बयान में मंत्री राजेश अग्रवाल यह कहते नजर आ रहे हैं कि हमारे गृह मंत्री बाबाओं को पलकों में बिठाते हैं। पलकों में बिठाना तो समझ आता है। लेकिन डाकुओं को सुरक्षा प्रदान करना यह हजम नहीं हो रहा। और यह बयान जब राज्य का एक जवाबदार मंत्री दे तो विषय गंभीर हो जाता है। खैर मंत्री राजेश अग्रवाल कौन-कौन से डाकुओं को सुरक्षा प्रदान कर रहे यह वहीं जाने, लेकिन उनके इस बयान के बाद सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है। दरअसल डाकू वह होता है जो गैर-कानूनी ढंग से किसी अन्य व्यक्ति का धन, माल, जान, पशुधन या अन्य वस्तु छीन लेता है। हिंसा के माध्यम से कारोबार और व्यवसाय को लूट लेता है। अब मंत्री जी को यह बताना चाहिए क्या ऐसे व्यक्ति को वह सुरक्षा प्रदान करेंगे?

बृजमोहन ही नहीं महंत भी शतरंज के बड़े खिलाड़ी

इन दिनों रायपुर सांसद और पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल लगातार राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने का काम कर रहे हैं। वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? फिलहाल यह वही जानेंगे। लेकिन इस बीच नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत ने मीडिया के समक्ष बृजमोहन अग्रवाल की बड़ी सफाई से कपड़े उतारने का काम किया। दरअसल महंत ने मीडिया के समक्ष कहा कि बृजमोहन अग्रवाल के संबंध इधर-भी ठीक हैं उधर भी। वह संबंधों को निभाते हैं, हालांकि महंत ने यह नहीं बताया कि इन दिनों बृजमोहन अग्रवाल किधर संबंध निभा रहे हैं। डॉ. महंत ने यह भी कहा कि वह शतरंज के बड़े खिलाड़ी हैं, कब किसे मात देना है, वह भली-भांति जानते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर बृजमोहन अग्रवाल किसे मात देना चाहते हैं? उनके निशाने में कौन हैं? वैसे तो डॉ. चरण दास महंत का भी भाजपा नेताओं के साथ बड़े मधुर संबंध है। क्या महंत भी अपनी चाल चल रहे हैं? उनके निशाने में आखिर कौन है? भाजपा नेता या फिर उनके ही दल का कोई बड़ा नेता? खैर बृजमोहन अग्रवाल और डॉ. चरण दास महंत दोनों ही मझे हुए राजनेता हैं और शतरंज के बड़े खिलाड़ी भी। इनके संबंध वास्तव में दोनों दलों से हैं। अब यह दोनों नेता अगली चाल में किसे मात देने जा रहे इसका खुलासा निकट भविष्य में हो जाएगा।

शिक्षा मंत्री की यह कैसी शिक्षा?

शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव इन दिनों जमकर चर्चा में हैं। जम्बूरी विवाद को कुछ दिनों बीते नहीं हुआ कि शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव द्वारा दी जा रही शिक्षा को लेकर विवाद खड़ा हो गया। दरअसल सड़क सुरक्षा सप्ताह में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और सांसद समेत तमाम नेता हेलमेट लगाकर बाइक चलाने की शिक्षा देते नजर आये। वहीं शिक्षा मंत्री आम लोगों को गलत शिक्षा देते दिखाई दिए। स्कूल शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव सड़क सुरक्षा सप्ताह के दौरान बिना हेलमेट लगाकर बाइक चलाते दिखे। अब शिक्षा मंत्री के द्वारा आम लोगों को यह कैसी शिक्षा दी जा रही है? इसको लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आकड़ों की बात करें तो बीते वर्ष राज्य में सड़क दुर्घटनाओं में कुल 6752 लोगों की जान चली गई, जिसमें से 4200 से अधिक वह लोग थे जिन्होंने हेलमेट नहीं लगाया था। सरकार लगातार इसको लेकर लोगों को जागरुक कर रही है। स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय हेलमेट लगाकर दुपहिया वाहन चलाने की शिक्षा दे रहे हैं। दूसरी ओर शिक्षा मंत्री मंत्री लोगों को कैसी शिक्षा दे रहे इसको लेकर सवाल उठना लाजमी है।

76 साल का रिकार्ड टूटा

किसी राज्य के विकास के लिए राजस्व का संकलन अत्यंत आवश्यक है। लेकिन जब मदिरापान राजस्व संकलन का प्रमुख माध्यम बन जाए तो एक स्वच्छ और अच्छे समाज की परिकल्पना कैसे की जाएगी? दरअसल यह बात हम इसलिए कह रहे हैं कि क्योंकि हर वर्ष 30 जनवरी महात्मा गांधी की पुण्य तिथि के रुप में मनाई जाती है। इस दिवस को शहीद दिवस के रुप में भी मनाया जाता है। विगत 76 वर्ष से इस दिन मदिरा की खुली बिक्री पर प्रतिबंध रहता था, यानि कि ‘ड्राई डे’ घोषित कर दिया जाता था। लेकिन इस वर्ष 30 जनवरी को भी मदिरा की बिक्री होते दिखाई दी, जिसका चारों ओर विरोध हो रहा है। दरअसल हमारा समाज मदिरापान को एक बुराई के रुप में देखता है और आकड़ों की बात करें तो ज्यादातर अपराध नशे की बदौलत हो रहे हैं। उसके बाद भी सरकारों की विवशता देखकर यह माना जा सकता है कि मदिरापान पूर्णत: प्रतिबंध करना कठिन है। लेकिन यदि किसी कारण वश एक दिन भी मदिरा बिक्री पर रोक लगाई जाती है, तो उसमें बुराई क्या है? बीते 76 साल से 30 जनवरी को मदिरा बिक्री बंद रखी जाती थी, तो उसमें बुराई क्या है? एक दिन भी समाजिक कलह पर नियंत्रण रखने और अपराधों को रोकने का प्रयास किया जाता रहा है, तो उसमें बुराई क्या है? आखिर सरकारें कैसे समाज का निर्माण करना चाहती हैं? इस पर चिंतन और मंथन की जरुरत है। क्या किसी सभ्य और अच्छे समाज से ज्यादा महत्वपूर्ण है मदिरा की बिक्री? खैर सरकारों की जो भी मजबूरी हो लेकिन इस साल 30 जनवरी यानि की महात्मा गांधी के पुण्यतिथि में भी मदिरा की बिक्री होते दिखी जो यह दर्शाता है कि समाज से ज्यादा महत्वपूर्ण अब राजस्व है।

सूची बजट सत्र के बाद

आईएएस अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट अब बजट सत्र के बाद ही संभव हो पायेगी। 23 फरवरी से 20 मार्च तक छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र चलेगा। इस बीच कोई भी ट्रांसफर लिस्ट जारी होना संभव नहीं दिख रहा है। दरअसल एक बहुप्रतिक्षित ट्रांसफर लिस्ट की उम्मीद जताई जा रही थी, जो जनवरी माह में प्रस्तावित थी। इस लिस्ट में कुछ जिलों के कलेक्टरों के साथ ही सचिवों के भी प्रभार बदलने के संकेत थे। लेकिन अब फरवरी माह से शुरु होने वाले बजट सत्र के चलते इसको टाला जा सकता है। बजट सत्र के बाद एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल संभावित है।

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